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कहानी: बुढ़ापे के साथी

पिचहत्तर वरूष के मनीष और बहत्तर की मंजू बुढ़ापे में एक दूसरे के जीवन साथी बने थे। उनकी शादी हुए दस वर्ष हुए थे और दोनों पिछले दस वर्षों से सुखपूर्वक रह रहे थे। मंजू की यह पहली शादी थी जबकि मनीष जी की यह दूसरी शादी थी। पहली पत्नी मानसी की मौत मंजू से शादी होने के पाँच वर्ष पूर्व हो गई थी। पत्नी की मौत के बाद मनीष एकदम अकेले रह गए थे। ऐसे में मंजू ने उनका साथ दिया और शादी कर के उनके साथ रहने लगी।
मंजू से मनीष की पहचान कोई नई नहीं थी। यह बात तब की है जब मंजू चौबीस वर्ष की थी और मनीष जी की उम्र सत्ताइस वर्ष की। दोनों एक प्राइवेट स्कूल में टीचर थे। मनीष शादी शुदा थे और मंजू कुँवारी। मंजू देखने में सुंदर थी तथा बहुत समझदार भी थी। मनीष जी का मंजू से ज़्यादा वास्ता नहीं था। वैसे भी मंजू साइंस की टीचर थी और मनीष सर कॉमर्स पढ़ाते थे। मंजू से और भी शिक्षक जो कुँवारे थे निकटता बढ़ाना चाहते थे। मगर मंजू किसी को भाव नहीं देती थी। वो मनीष जी को मन ही मन बहुत चाहती थी पर जाहिर नहीं करती थी। उसकी शादी के लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते आ रहे थे मगर वह सबको नापसंद कर देती थी। एक दिन की बात है मंजू की सहेली प्रियंका ने मनीष जी से मंजू के विषय में बात कही तो मनीष जी को बड़ी हैरत हुई। प्रियंका ने बताया कि मंजू आपको बहुत चाहती है और आपसे शादी करना चाहती है। सुनकर मनीष जी बोले यह असंभव है मैं पहले से ही शादीशुदा हूँ मेरी पत्नी बहुत अच्छी है और मुझे खूब चाहती है मैं भी उसे खूब चाहता हूँ। इस जन्म में तो मैं मंजू से शादी करने की कल्पना भी नहीं कर सकता। प्रियंका बोली फिर भी आप मंजू से इस विषय में बात कर लेना। मनीष जी ने विचार किया कि बात करने में हर्ज ही क्या है। वे मंजू से मिले तथा सीधे पूछा प्रियंका जो कह रही है वो सच है क्या? मंजू ने धीरे से हाँ कहा तो मनीष बोले पागल हो गई हो क्या मैं शादीशुदा हूँ। मंजू ने कहा उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। मनीष बोले मुझे तो पड़ता है। मनीष जी ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि मैं किसी भी सूरत मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता। इस पर मंजू ने अपना फैसला सुनाया। शादी करूँगी तो आपसे वरना आजीवन कुँवारी रहूँगी। अगर पापा ने मेरी जबरदस्ती किसी और से शादी की तो अपनी जीवन लीला समाप्त कर दूँगी। मनीष जी चुप हो गए और वहाँ से चल दिए। यह बात उन तीनों के बीच थी और कोई इस विषय में कुछ नहीं जानता था। एक दिन मंजू को पता चला कि मनीष जी नौकरी छोड़कर जा रहे हैं तो वो मनीष से मिली और बोली मैं अच्छी तरह समझ रही हूँ कि आप मेरे कारण से ये नौकरी छोड़ रहे हैं। यदि ऐसा है तो आप यह नौकरी न छोड़ें मैं खुद ही ये नौकरी छोड़कर आपसे दूर चली जाऊँगी। लेकिन मनीष माने नहीं और नौकरी छोड़कर चले गए। उनका किसी को पता नहीं लगा कि वे कहाँ गए थे। घर किराये का था उसे वे खाली कर गए थे। मकान मालिक को भी यह पता नहीं था कि वे कहाँ गए हैं। मंजू का मन भी अब वहाँ से उचट गया था। तभी मंजू की सरकारी स्कूल में टीचर की नौकरी लग गई थी। और वो भी स्कूल छोड़कर सरकारी स्कूल में चली गई थी। देखते-देखते अड़तीस बरस गुजर गए। मनीष जी के दोनों बेटों की शादी हो गई थी। मनीष जी ने टीचर की नौकरी छोड़ने के बाद एक कंपनी में एकाउण्टेन्ट की नौकरी कर ली थी जिससे वे रिटायर हो गए थे। उनकी पत्नी का देहान्त हुए पाँच वर्ष हो गए थे। उनके दोनों बेटे विदेश में रह रहे थे। दोनों ने मिलकर पिता की संपत्ति बाँट ली थी। मकान माँ के नाम था वो भी बेच दिया था। मनीष जी के पास बैंक में कुछ रुपये थे वे भी दोनों लड़के लेना चाहते थे पर वो उन्होंने नहीं दिए थे। इसके लिए वे लगातार मनीष जी पर दबाव बना रहे थे। मनीष जी किराये के मकान में अकेले रह रहे थे तभी उनकी मंजू से काली मंदिर में भेंट हुई। मंजू उन्हें पहचान गई थी उसी ने उन्हें आवाज लगाई थी मनीष सर जी कहकर। मनीष जी मंजू को अड़तीस वर्ष बाद देख रहे थे। मंजू बोली मुझे पहचाना सर? मनीष जी बोले हाँ हाँ क्यों नहीं तुम मंजू हो न। अपने पति से नहीं मिलवाओगी? मंजू बोली हो तो मिलवाऊँ, मैंने शादी ही नहीं की। मनीष जी को बड़ी हैरत हुई उस दिन मंजू और मनीष जी ने पूरे तीन घंटे तक बात की मंजू ने बताया मेरे रिटायरमेन्ट में एक महीने का समय बाकी है। मैंने आपको अपना नाॅमिनी बनाया है तथा सरकारी रिकार्ड मैं आपसे पूछे बिना पति के रूप में आपका नाम दर्ज कराया है ताकि मेरे मरने के बाद आप मेरी पेंशन के हकदार हों। मनीष जी अपने ही बेटों की धोखाधड़ी के शिकार हुए थे उन्हें विश्वास हो नहीं रहा थे कि कोई कैसे इतने वर्ष तक वफ़ा के साथ एक तरफा रिश्ता निभा सकता है। पहली बार मंजू ने मनीष जी का हाथ थामा था। बोली चलो हम दोनों का संयुक्त फोटो खिंचवाना है। रिटायरमेन्ट के कागजात तैयार हो रहे हैं उसमें इसकी जरूरत है। इसके दूसरे दिन उन्होंने शादी कर ली। मनीष जी के पास अब इंकार की कोई वजह ही नहीं थी। इस बुढ़ापे मैं उन्हें मंजू के सहारे की बड़ी जरूरत थी। शादी के समय मंजू की खुशी का कोई पारावर नहीं था। वो मनीष से कह रही थी देखो हम इस जन्म में ही एक दूसरे के हो गए हैं। आज उनकी शादी के पूरे दस वर्ष हो गए थे। इन दस वर्षों में मनीष जी के दोनों बेटों ने कभी उनसे संपर्क नहीं किया था। उन्हें भी उनकी जरूरत नहीं थी उनके साथ मंजू जो थी। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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