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कहानी: बेबस शाला प्रभारी को सहारा

बिसनपुर माध्यमिक शाला के प्रभारी हेमराज जी पिछले छः माह से काफी खुश और संतुष्ट नज़र आ रहे थे। उसका कारण पंचायत की नवनिर्वाचित सरपंच गीता थीं। वे पढ़ी लिखी दलित महिला थीं और दबंग भी। उनके सरपंच चुने जाने के पहले छः शिक्षक के सटॉफ वाले विद्यालय में मात्र दो शिक्षक ही नियमित रूप से स्कूल आते थे। बाकी चार मुफ्त की तनख्वाह ले रहे थे। लेकिन सरपंच गीता जाँगड़े जी ने विशेष रुचि लेकर विद्यालय की व्यवस्था सुधार दी थी। जो चार शिक्षक स्कूल से नदारद थे उन्होंने सख्ती के बाद खुद ही स्वेच्छा से अपना तबादला करा लिया था। उनके स्थान पर जो नए शिक्षक आए थे वे कर्मठ और ईमानदार थे। जिसके कारण छात्रों के स्तर में काफी सुधार आया था। यही हेमराज की खुशी का अहम कारण था।
छः महीने पहले तक एक मेडम सुमन तो कभी स्कूल आती हीं नहीं थीं। वे पहले के सरपंच की रिश्ते में भाभी लगती थीं। दूसरे सर अनिल ने अपना अटेचमेंट डी पी सी कार्यालय में करा रखा था वे भी स्कूल नहीं आते थे। दो मेडम रीना तथा रूचि भी स्कूल बहुत कम आती थीं इससे शाला प्रभारी हेमराज जी काफी परेशान रहते थे। स्कूल उनके तथा उनके जैसे शिक्षक ओमवीर के कारण ही चल रहा था। वे पूरे समय विद्यालय में रहकर बच्चों को पढ़ा रहे थे। सरकारी विद्यालय होने के कारण छात्रों की दर्ज संख्या काफी कम थी। छः महीने पहले जब पंचायत चुनाव हुए तो उसमें गीता जाँगड़े सरपंच चुनी गई। उन्होंने
पद ग्रहण करते ही स्कूल की दशा सुधारने का निर्णय ले लिया था। ओर उन्होंने वो सब करके दिखा भी दिया था। स्कूल से नदारद रहने वाले बच्चो के माता पिता से संपर्क कर उनकी उपस्थिति सुनिश्चित कराई थी।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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