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कहानी: डेढ़ एकड़ जमीन

राम किशोर के दादाजी शिवस्वरूप जी ने सौ वर्ष पूर्व डेढ़ सौ रूपये मे जो डेढ़ एकड़ जमीन खरीदी थी। आज वो पूरे परिवार की आय का मुख्य जरिया थी। बारह लोगों के परिवार के लिए सालभर का गेहूँ उस जमीन से मिलता था। तथा उसकी उपज बेचकर उनके अन्य खर्च चलते थे। आज उस जमीन की कीमत इक्कीस करोड़ रुपये थी। मगर वे उसे किसी भी हाल में बेचना नहीं चाहते थे।
संग्रामपुर गाँव की यह जमीन शहर से दो किलोमीटर दूर थी। उसके आस पास कई आवासीय कॉलोनियाँ बन गई थीं। इस जमीन के ग्राहक भी आने लगे थे लेकिन राम किशोर जी सख्ती से मना कर देते थे।
राम किशोर की उम्र ही पिचहत्तर वर्ष की हो चुकी थी। वे बताते हैं कि जब उनका जन्म हुआ तब उनके पिताजी ओम प्रकाश जी पच्चीस वर्ष के थे और दादाजी शिवस्वरूप जी पचास वर्ष के थे। तब जमीन खरीदे हुए उन्हें पच्चीस वर्ष हो गए थे। दादाजी अपनी शादी के एक साल बाद चैनपुरा गाँव से संग्रामपुर आ गए थे। संग्रामपुर गाँव में उस समय कोई बढ़ई नहीं था। तब गाँव के सेठ दीनदयाल पालीवाल ने शिवस्वरूप जी को अपने गाँव संग्रामपुर में रहने की जगह दी थी तथा मकान बनवाने के पैसे देकर उन्हें बसाया था। उस समय उनका घर गाँव के कोने पर था। शिव स्वरूप जी के यहाँ जब ओमप्रकाश जी का जन्म होने वाला था तब शिवस्वरूप जी ने एक गाय खरीदी थी। वे घर का तथा ग्वाड़े का कचरा सामने खाली पड़ी जगह पर फेंकते थे। वो जगह पालीवाल सेठ की थी जिसकी देख-रेख उनका नौकर रामलाल करता था। एक बार किसी बात पर शिवस्वरूप जी की नौकर रामलाल से कहासुनी हो गई तो उसने उनसे जमीन पर कचरा फैंकने से मना कर दिया। एक दिन पालीवाल सेठ जी उधर से गुजरे तो उन्होंने शिवस्वरूप जी से उनके हाल जाने। तब शिवस्वरूप जी ने सारी बातें बताईं। सुनकर पालीवाल सेठ जी ने कहा कि अगर डेढ़ सौ रूपये जुटा सकते हो तो मैं यह जमीन तुम्हें बेच सकता हूँ। यह सुनकर शिवस्वरूप जी मुश्किल से नब्बे रुपये जुटा पाए तो सेठ ने साठ रूपये उधार कर दिए जिसे शिवस्वरूप जी दो साल में चुका पाए थे। उस जमीन पर शिवस्वरूप जी ने कुआँ खुदवाया था जिसमें भरपूर पानी निकला था। उस डेढ़ एकड़ जमीन पर शिवस्वरूप जी खेती कर एवं उससे फल सब्जी को उत्पन्न कर बेचते थे। इस तरह वो परिवार का भरण पोषण कर रहे थे। वही जमीन सौ वर्ष बीतने के बाद भी शिवस्वरूप के उत्तराधिकारियों की गुजर बसर चला रही थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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