रत्नाखेड़ी गाँव के स्वरूप सिंह पिछले पैंतीस सालों से गाँव से बाहर रहे थे। पाँच वर्ष पहले वे गाँव वापस आ गए थे। इन पाँच वर्षों में उन्होंने गाँव वालों का दिल जीत लिया था। इसके कारण वे हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनाव में गाँव के सरपंच चुने गए थे।
चालीस साल पहले की बात है जब स्वरूप सिंह की उम्र सिर्फ बीस वर्ष की थी तब उनके पिताजी राम भरोसे का लंबी बीमारी से निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन सुनीता की शादी उन्होंने मरने के पहले ही कर दी थी। रामभरोसे जी के पास गाँव से लगी आठ एकड़ जमीन थी। पिताजी की उत्तक्रिया करने के बाद जब स्वरूप सिंह अपने खेत पर पहुँचे तो वहाँ गाँव के साहूकार लाला राजमल के नौकर हेमराज ने आकर उससे कहा कि सेठजी तुम्हें बुला रहे हैं। स्वरूप सिंह जब लाला के घर पहुँचे तो लाला राजमल ने स्वरूप सिंह से कहा खेत पर जाने के पहले मालूम तो कर लेना चाहिए कि वो जमीन तुम्हारी है भी की नहीं। स्वरूप बोले मेरी क्यों नहीं है यह मेरे बाप दादों की जमीन है पिताजी के निधन के बाद अब यह जमीन मेरी है। इस पर लाला ने कहा ये जमीन तुम्हारी नहीं है यह जमीन मेरी है तुम्हारे पिताजी ने ये जमीन मुझे बेच दी थी। क्या तुम्हें उन्होंने मरने से पहले यह नहीं बताया क्या? स्वरूप सिंह ने कहा कि मुझसे उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। तब लाला ने जमीन के कागजात स्वरूप सिंह को बताए जिससे पता चल रहा था कि ये जमीन अब लाला की है। स्वरूप सिंह कुछ नहीं कर सके स्वरूप सिंह जी के पिताजी सीधे सादे अनपढ़ इंसान थे। उन्होंने अपनी बेटी की शादी के समय बारह हजार रुपये का कर्ज लिया था जो उन्होंने पूरा ब्याज सहित अदा कर दिया था। मगर साहूकार बेईमान था। वो इस बात को मानने को तैयार ही नहीं था कि रामभरोसे ने पाई-पाई अदा कर दी है। स्वरूप सिंह बोले ठीक है तो भाई आपकी जमीन सम्हालो मैं तो शहर जा रहा हूँ। राजमल ने उसे शहर जाने से रोकने के हर संभव प्रयास किए खूब सब्जबाग दिखाए मगर स्वरूप सिंह सेठ का बँधुआ मजदूर बनना नहीं चाहता था इसलिए वो शहर आ गया। वह माँ को गाँव में ही छोड़ आया था। यहाँ आकर स्वरूप सिंह ने मजदूरी से अपनी शुरूआत की थी। फिर राज मिस्त्री बना इसके बाद ठेकेदार। माँ ने जीते जी उसकी शादी रामसखी से कर दी थी। स्वरूप सिंह ने पैंतीस सालों में खूब पैसा कमाया था। एक दिन वे अपने आवासीय प्रोजेक्ट के लिए जमीन की खोज कर रहे थे तभी उन्हें पता चला कि रत्नाखेड़ी गाँव में आठ एकड़ जमीन बिकाऊ थी। वे जब जमीन देखने गए तो जमीन उनकी ही निकली। सेठ राजमल के मरने के बाद उनकी परिवार की स्थिति खराब हो गई थी। सब कुछ बिक गया था अब यह जमीन बची थी ये भी बिकने जा रही थी। स्वरूप सिंह ने वह जमीन राजमल के पोते गोविन्द से दो करोड़ रुपये में खरीदी थी। गोविन्द का परिवार शहर में रह रहा था। जमीन खरीदने के बाद स्वरूप सिंह ने अपना कारोबार अपने दोनों बेटों को सौंप दिया और वे साठ वर्ष की उम्र में अपने गाँव रत्नाखेड़ी में आकर बस गए थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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