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कहानी: बगीचा

सोनपुर के छोटे से कस्बे में रह रही काशीबाई के घर से लगा एक छोटा सा बगीचा था जिसको आय से काशीबाई की गुजर बसर आराभ से चल रही थी। उनके दो बेटे बहू पोते पोती थे पर उनके साथ कोई भी नहीं रहता था बड़ा बेटा रमेश कलकत्ता में रह रहा था एवं छोटा बेटा दिनेश अहमदाबाद में । दोनों बेटे उनकी कभी सुध नहीं लेते थे न उनकी कभी रुपये पैसे से मदद करते थे । आज काशीबाई को बगीचे से छः सौ रुपये की आय,हुई थी जो उनके लिए पर्याप्त थी।
काशी देवी के पति देवीप्रसाद जी का निधन हुए दस वर्ष हो गए थे । वे जोड़ पर छोटी सी गुमटी लगाकार सामान बेचते थे। इसके पहले वे मंडी में हम्माली का काम करते थे इसके बाद भी उन्होंने अपने दोनों बेटों को खूब पढ़ाया लिखाया मगर दोनों ही उन्हें छोड़कर चले गए । देवी प्रसाद ने बीस साल पहले चालीस डिस्मिल जगह सोहन साहू से पच्चीस हजार रुपये में खरीदी थी आज उसकी कीमत पूरे डेढ़ करोड़ रुपये हो गई थी। देवी प्रसाद जी को बगीचे लगाने का शौक था उन्होंने पहले तो उस पर मकान बनवाया फिर बाउण्ड्री कराकर उसमें आम जामुन अमरूद नींबू और बेर के पैड़ लगाए थे कुछ केले के पेड भी उसमें लगे थे। एक बेल पत्री का पेड़ भी था। देवी प्रसाद जी के निधन के बाद गुमठी बंद करना पड़ी थी काशी देवी ने वो गुमफी मात्र पनद्रह हजार रुपये में बेच दी थी । बुढ़ापे में उनसे कोई काम तो होता नहीं था ऐसे में देवीप्रसाद जी द्वारा लगाया गया बाग उनकी आय का जरिया बना हुआ था। जिसके यहाँ शादी होती वो उनके बगीचे से आम जामुन की टहनियाँ तोडकर ले जाता बदले में उनको नेग के रूप में कम से कम एक सौ एक रुपये देकर जरूर जाता था। पूजन कथा के लिए उनके बाग से कले के पत्तों तथा आम के पत्तों व हवन के लिए आम जामुन की सूखी लकड़ियों की जरूरत पड़ती वो भी काशी देवी के बगीचे से मिल जाती थी जिसकी कीमत उन्हें मिलती थी आम अमरूद और बेर के फल के सीजन में वे ये फल बेचकर अच्छा रुपया कमा लेतीं थी नीबूँ के चार पेड़ थे जिनमें बारहों महीने नीबूँ लगे रहते थे उन्हें बेचकर भी वे अच्छा खासा रुपया कमा लेती थीं कभी कभी उन्हें देवी प्रसाद जी की वो बात याद आती थी कि यह छोटा सा जमीन का टुकड़ा हमारे बुढ़ापे में आमदानी का जरिया बनेगा बेटे हमारे धोखा दे सकते हैं मगर यह धरती का टुकड़ा कभी नहीं उन्होंने बहुत सोच समझकर इसमें पेड़ लगाए थे वे तो दुनिया छोड़कर चले गए मगर उनका लगाया बाग आज भी खूब फल फूल रहा था। काशी देवी यही सोचकर इसे कभी बेचने की बात नहीं करतीं थी दो साल पहले उनका बड़ा बेटा रमेश उनके पास बगीचा बेचने के मकसद से आया था पर उन्होंने बैचने से सख्ती से मना करते हुए कहा था मेरे जीते जी मैं इस बगीचे को कभी नहीं बिकने दूँगी। यह सुनकर रमेश मुँह लटकाए चला गया था। मगर काशी देवी ने इसकी परवाह नहीं की थी अगर वे इसे बेच देतीं तो आज कहाँ रहतीं। दोनों ही बेटे उन्हें अपने पास रखने को तैयार नहीं थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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