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कहानी: आत्मग्लानि

सरला पिछले दस दिनों की आत्मग्लानि से आज उबर पाई थी जब डॉक्टरों ने उसे बताया कि अब उसकी भतीजी रुचि तथा उसका सद्यजात सतमासा बच्चे की हालत खतरे से बाहर है । अभी बच्चे को विशेष देखरेख में रखा छया था। पर सरला को इसी से बहुत संतोष हो रहा था।
         आज से छः वर्ष पूर्व सरला की बेटी रूबी तथा उसके भाई की बेटी रूचि की शादी एक ही दिन हुई थी । लेकिन रूबी की शादी सफल नहीं हुई थी रूबी को जो ससुराल मिली थी वो अच्छी नहीं थी उसकी सास ननद खराब थी हीं उसका पति सोमेश भी ठीक नहीं था वे सबके सब लोभी लालची थे रूबी को खूब प्रताड़ित करते थे जरा सो बात पर उसे मानसिक प्रताड़ना दी जाती थी दःख की बात तो यह थी कि रूबी का पति भी उसका साथ नहीं देता था रूबी के मन में आत्महत्या करने का विचार आता था पर फिर वो अपने आपको सम्हाल लेती थी। रूबी का कमरा चौथी मंजिल पर था । एक दिन की बात है रूबी की सास उसके ससुर उसकी ननद और उसके पति ने उसे सारी रात प्रताड़ित किया बाद में सभी ने प्लान बनाया कि रूबी को छत से धक्का दे दिया जाए जिससे इसका काम ही तमाम हो जाए यह बात पड़ोसी प्रकाश जी की पोती सिमी ने उन्हें बताई वो रूबी के ससुर की दुकान पर टोस्ट लेने आई थी तब उसने रूबि की सास को यह कहते सुन लिया था कि जब रूबी छत पर कपड़े सुखाने जाएगी तब इसे पीछे से धक्का देकर नीचे गिरा देंगे। यह सुनकर प्रकाश जी घबरा गए उन्होंने इसकी सूचना बिन वक्त गँवाए फोन पर रूबी के पिता किशनलाल जी को दी किशनलाल जी अपनी पत्नी सरला और अपने बेटे मोहित को लेकर तुरंत रूबि की ससुराल पहुँच गए चालीस किलोमीटर की दूरी उन्होंने पच्चीस मिनिट में तय कर ली थी । । किशन लाल जी तो रूबी के ससुर से बात करने लगे लेकिन सरला तुरंत रूबी के कमरे तक पहुँची तो देखा की रूबी कपड़े धोने के बाद उन्हें सुखाने के लिए छत पर ले जा रही थी । वे भी तेजी से सीढ़याँ चढ़ के रुबी के पास पहुँटी तब तक रूबी छत पर आ गई थी। छत पर रूबी की सास और ननद पहले से ही मौजूद थी वे सरला को देखकर सकपका गईं फिर रूबी की बुराई करने लगीं रूबी की सास बोली इसे अपने साथ ले जाओ और ससुराल में कैसे रहा जाता है ये सिखाओ तभी इसे यहाँ भेजना नहीं तो अपने पास ही रखो हमें इसकी कोई जरूरत नहीं है। रूबी सरला से लिपटकर रोने लगी थी सरला ने रूबी की सास से कोई बहस नहीं की और रूबी को विदा कराकर अपने साथ ले जाने लगी तब सोमेस ने कहा जा तो रही है लेकिन अब कभी यहाँ आने की कोशिश मत करना। रूबी रास्ते भर रो रोकर सरला से यही कहती रही मम्मी वो लोग कसाई हैं । उनमें जरा सा भी रहम नहीं है घर आकर जब रूबी ने अपने ऊपर हौए अत्याचार की कहानी सुनाई तो सभी की आँखों में आँसू आ गए इसके बाद सोमेश रूबी को लेने कभी नहीं आया उसने तलाक का नोटिस भिजवा दिया रूबी ने भी इस पर अपनी सहमति दे दी और उनका तलाक हो गया। दूसरी और रूचि का पति नीलेश रूचि को बहुत चाहता था जब रूचि को उसकी माँ और बहन परेशान करने लगीं तो वो रूचि को लेकर अलग रहने लगा था रूचि और नीलेश दोनों नौकरी कर रहे थे। सरला उनको बड़ी हसरत से देखती थी । रूचि शादी के पाँच साल बाद गर्भवती हुई थी वो माँ बनने वाली है जब यह खबर सरला को लगी तो वो खूब रोई उससे अपनी बेटी रूबी का दुख नहीं देखा जा रहा था वो बार बार यही कहती की अगर रूबी को उसके पति ने तलाक नहीं दिया होता तो आज वो भी नानी बन गई होती और रूबी मम्मी ऐसा वो बार बार सोचती और अपने आँसू बहाती रहती किशनलाल जी उसे खूब समझाते फिर भी वह खुद को बहला नहीं पाती थी तभी सरला को खबर लगी की रूचि अस्पताल में भर्ती है उसके पेट में जो बच्चा है वो उलट गया है वो तुरंत अस्पताल पहुँची इसका दोषी वह अपने आपको ठहरा कर आत्मग्लानि से भरी हुई थी उसे ऐसा लग रहा था कि कहीं उसकी हाय तो रूचि को नहीं लग गई रूचि पूरे दस दिन जीवन और मौत से संघर्ष करती रही अंततः डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर रूची की डिलेवरी कराई। जब वो खतरे से बाहर हो गई तब डॉक्टरों ने राहत की साँस ली सबसे ज्यादा सुकून सरला को मिला था उसकी आत्मग्लानि दूर हो चुकी थी। सभी के चेहरों पर संतोष था।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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