सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: गढ़े धन के फेर में

कंचन लाल अपने पिता हरलाल के स्वभाव से एकदम विपरीत था। हरलाल जहाँ जीवन भर गढ़े धन के फेर में रहे और उनकी मृत्यु भी ऐसी कारण हुई वहीं कंचनलाल एक कर्मठ इंसान कड़ी मेहनत पर विश्वास करते थे। उनके पिता का स्वर्गवास हुए आठ वर्ष हो गए थे। इन आठ वर्षों में कंचन ने अपनी मेहनत से खुद को गरीबी के स्तर से उठाकर धनवान बना लिया था। आज उनका कंचन नमकीन सबसे अधिक बिकने वाला नमकीन था। जिससे उन्हें हर महीने बीस लाख रुपये की आय होती थी। आज कंचन के पिताजी की आठवीं पुण्यतिथि थी। उसकी माँ सरोज कह रही थीं अगर वे गढ़ेधन के फेर में न पड़े होते तो अभी भी जीवित होते।
पिताजी हरलाल जब तांत्रिकों के साथ घर में बैठकर गढ़े धन की चर्चा करते थे तब कंचन भी सुनता था और कहता पिताजी इस फेर में मत पड़ो अपने काम धंधे पर ध्यान दो पर इस बात का उन पर कोई असर नहीं होता था। हरलाल की मेन रोड पर सेव नमकीन की दुकान थी।उनके हाथ के बनाए सेव का स्वाद अनूठा था। वो रोज पचास किलो सेव तैयार करते थे जो उनकी दुकान से तीन घंटे में बिक जाते थे और वे अपनी दुकान बंद कर के ग्यारह बजे रात को घर आ जाते थे। इससे उनके परिवार की गुजर बसर ठीक हो रही थी। दुकान पर ही एक व्यक्ति नंदकिशोर ने उन्हें बताया था शहर के पास पहाड़ी के नीचे गढ़े धन का अकूत ख़जाना है वो जिसे मिल जाए फिर उससे बड़ा धनवान इस शहर में कोई न रहे। हरलाल इसी धन के फेर में पड़ गए कई तांत्रिकों से संपर्क किया तो एक तांत्रिक ने बताया कि तुम्हारी दुकान के नीचे अरबों रुपये की कीमत का धन गढ़ा हुआ है। तो हरलाल की आँखें चमक उठीं। अब रोज रात को हरलाल तथा उसके दो विश्वस्त मजदूर दुकान बंद कर के खुदाई करते थे। यह सिलसिला पंद्रह रातों तक चलता रहा। पंद्रहवीं रात को तीसरे पहर में उन्हें चाय की तलब महसूस हुई। वो   दुकान से जैसे ही बाहर निकले दुकान पूरी भर-भरा कर गिर गई। बहुत तेज आवाज हुई लोग बहुत घबरा गए थे। जब पता चला कि दुकान गिरने से कोई जनहानि नहीं हुई है तो सबने राहत की साँस ली। हरलाल की दुकान तो जमींदोज हो चुकी थी हरलाल ने ठेले पर अपनी नमकीन की दुकान लगा ली थी। पर गढ़ा धन पाने की लालसा अभी भी उनमें बनी हुई थी। एक बार वे कुछ तांत्रिकों के साथ गढ़ा धन निकालने के लिए जंगल चले गए तो पंद्रह दिनों तक नहीं आए। घर में आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया। तब कंचन ने खुद ठैला लगाने का निर्णय लिया और कंचन नमकीन के नाम से ठेले पर दुकान खोल ली। सोलहवें दिन हरलाल को जब उनके साथी घर लाए तब वे रीछ के हमले से बुरी तरह घायल थे। गढ़ा धन फिर भी उन्हें नहीं मिला था। इसके बाद हरलाल कभी ठीक नहीं हुए। उन्हें रात में ही हार्ट अटेक आ गया था जिससे  उनका दुखद अंत हो गया था। उनके मरने के बाद उनके लड़के कंचन ने घर की सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी और अपने आपको गढ़े धन के मोह से दूर रखा था। यही कारण था कि वो आज शहर का प्रतिष्ठित व्यवसायी बना हुआ था।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...