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कहानी: निसंतान

दीनदयाल और करूणा निसंतान दंपति होने के बाद भी भरे पूरे घर में रह रहे थे। दीनदयाल की उम्र बहत्तर वर्ष और करुणा की उम्र सत्तर वर्ष हो गई थी। आज सुबह की सैर के समय उनकी तीन वर्ष पुराने मित्र आलोक और उनकी पत्नी नमिता से भेंट हुई थी। उनसे भेंट के बाद वे बहुत व्यथित थे। आलोक उनकी हम उम्र थे फिर भी उनसे अधिक बूढ़े तथा पस्त दिखाई दे रहे थे। आलोक ने बताया की अपनी दो संतान होने के बाद भी हम दोनों अकेले ही रह रहे हैं। इस शहर में हमारा अपना कोई नहीं है।
दीनदयाल आलोक जी की बात सुनकर अत्यंत दुखी हो गए थे। चालीस साल पहले वे कानपुर में उनके पड़ोसी थे। उनके दो बच्चे थे, बेटी का नाम अनीता तथा बेटे का नाम अनिल था। दोनों बच्चे उस समय स्कूल में पढ़ रहे थे। दोनों बच्चे अपनी क्लास के टॉपर स्टूडेन्ट थे। आलोक जी को अपने दोनों बच्चों पर बड़ा नाज था। बच्चे पढ़ लिखकर बड़े हुए थे। आगे पढ़ने के लिए विदेश चले गए थे। पढ़ाई खत्म करने के बाद वे वहीं पर नौकरी भी करने लगे। वहीं उन्होंने अपनी पसंद की शादी भी कर ली तथा वहीं के होकर रह गए। आलोक जी इस बात से बड़े दुखी रहते थे। बेटा-बहू, बेटी-दामाद, नाती-पोते होने के बाद भी वे दोनों इतने बड़े घर में अकेले रह रहे थे। अब तो बच्चे फोन पर भी बात नहीं करते थे। बच्चों को उनकी बिल्कुल याद नहीं आती थी जबकि वे उनकी यादों में ही खोए रहते थे। उनका बुढ़ापा बड़ा दुखद तरीके से कट रहा था। दूसरी और दीनदयाल और करुणा अपने दत्तक पुत्र मोहन व उसकी पत्नी शीला एवं उनके बच्चों के साथ सुखपूर्वक रह रहे थे। मोहन जब साल भर का भी नहीं था तब दीनदयाल जी ने उसे गोद लिया था। मोहन उनके बगल में टीन शेड के मकान में रहने वाले सब्जी विक्रेता दिनेश की नौंवीं संतान था। मोहन के पिता अत्यंत गरीब थे। वे ठेले पर सब्जी रखकर बेचते थे। नौवीं संतान का पालन करना उनके लिए बहुत मुश्किल हो रहा था। मोहन गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था। उसके माता पिता को उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। वैसे उनके पास इलाज के पैसे भी नहीं थे। शाम को जब दीनदयाल जी ऑफिस से घर आए तो देखा करूणा बहुत दुखी है तथा रो रही है। उसने बताया कि मोहन की तबियत अत्यंत खराब है अगर उसका इलाज नहीं कराया गया तो उसकी जान भी जा सकती है। दीनदयाल एक पल का भी समय गँवाए बिना मोहन को अस्पताल ले गए जहाँ मोहन का समय पर इलाज हो गया तथा उसकी तबियत में भी सुधार हो गया था। मोहन के ठीक होने के बाद मोहन की मम्मी और पिताजी ने मोहन को दीनदयालजी को गोद दे दिया। और कहा कि आप आज से इसके माता पिता हैं। हम इसे आपको सौंप रहे हैं। दीनदयाल जी ने इसे मान लिया था।
दीनदयाल जी ने मोहन को खूब पढ़ाने की कोशिश की पर वो छटी से अधिक न पढ़ पाया। दीनदयालजी ने उसे होटल खुलवा दी थी। दस साल से उसकी दुकान शहर की जानी मानी दुकान बन चुकी थी।


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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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