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कहानी: पुश्तैनी ज़मीन

आज ओमप्रकाश बहुत खुश था क्योंकि आज उसने 35 साल की अपने गृहग्राम रामाखेड़ी में उसके पिता दीनदयाल से साहूकार लाला रोशन द्वारा हड़पी अपनी आठ एकड़ पुष्तैनी जमीन रोशन की विधवा पत्नी कमला देवी से खरीद ली थी।
आज से पैंतीस साल पहले की बात है तब ओमप्रकाश की उम्र पच्चीस साल की थी। उसकी शादी रामाखेड़ी के ही किसान हरलाल की लड़की ओमवती से हो गई थी।
तथा उसके दो लड़के थे। बड़े का नाम धीरज तथा छोटे का नाम नीरज था। ओमप्रकाश चौथी तक पढ़ा था और पिताजी दीनदयाल जी के साथ खेती करता था। वह यह खेती पाँच सालों से कर रहा था। दीनदयाल जी अनपढ़ थे। उनका लेनदेन गाँव के लाला रोशनलाल से चलता था। ओमप्रकाश को इसकी कोई जानकारी नहीं थी वो तो अचानक उसके पिताजी बीमार पड़ गए उन्हें पीलिया हो गया था उसका इलाज न कराते हुए उन्होंने झाड़फूँक पर विश्वास किया। तीन महीने बाद जब हालत बहुत ज्यादा बिगड़ गई तब उन्हें सरकारी अस्पताल ले जाया गया तब पता चला कि उनका पीलिया बिगड़ गया है। लीवर पूरी तरह खराब हो गया था। डॉक्टरों ने कहा इन्हें घर ले जाओ तथा जब तक जिएँ तब तक इनकी सेवा करो वैसे भी ये कुछ दिनों के ही मेहमान है। ओमप्रकाश उन्हें घर ले आए वे पाँच दिन ही जिन्दा रहे छठवें दिन उन्होंने अंतिम साँस ली। उनकी उत्तर क्रिया करने के बाद ओमप्रकाश लाला रोशनलाल के पास पिताजी के लेनदेन की जानकारी लेने पहुँचा तब कहीं पता चला की लाला उनकी सारी जमीन हड़प चुका था। उसका मकान भी अब उसका नहीं था वो भी लाला के नाम था। ओमप्रकाश अपना सा मुँह लेकर आ गया। अब ओमप्रकाश के पास गाँव में रूकने का कोई बहाना न था यह सोचकर व शहर गंगा नगर आ कर रहने लगा था। शहर में आकर उसने हर तरह के काम किए और रुपये कमाकर अपने परिवार का भरण पोषण करने लगा। शहर में रहकर उसने रोज मिस्त्री का काम सीखा तथा कुछ दिन बाद वो ठेकेदारी करने लगा। इन पैंतीस सालों में ओमप्रकाश ने अपनी गरीबी दूर कर ओम बिल्डर का ब्रान्ड बनाया था। वो गंगानगर का सबसे बड़ा बिल्डर था। ओमप्रकाश को जब पता चला कि लाला रोशनलाल की विधवा पत्नी कमला से अपनी आठ एकड़ साढ़े चार करोड़ रुपये में खरीद ली थी। सेठानी के पास भी यह इकलौती जमीन ही बची थी जो उसने आज खरीद ली थी। ओमप्रकाश जी की उम्र इकसठ वर्ष की हो गई थी। उन्होंने अपना पूरा कारोबार बेटों को सौंप दिया था। उनका इरादा रामाखेड़ी में रहकर खेती करना था और उनकी यह तमन्ना भी अब पूरी होने जा रही थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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