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कहानी: एकाकी

श्री राम दादा का आज नब्बे वर्ष की आयु में निधन हो गया था वे पिछले बीस वर्षों से गोविंद नगर में एक छोटे से कमरे में रह रहे थे उन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं थी अच्छे भले चलते फिरते इंसान थे । ज्यादा किसी से घुलते मिलते नहीं थे उनके गिने चुने मित्र थे वे अपने में ही खोए रहते उनकी अंतिम यात्रा में बहुत कम लोग शामिल हुए थे वे कौन थे कहाँ से आए थे उनके घर में कौन कौन है ये किसी को नहीं मालूम था जब उनकी अंतिम यात्रा निकल रही थी तब उनके पड़ोस मे सहारनपुर के एक बुजुर्ग दयाशंकर जी अतिथि बनकर आए थे उन्होंने श्रीराम दादा को पहचान लिया था। तब लोगों को पता चला था कि वे सहारनपुर के रहने वाले हैं।
अंतिम संस्कार के बाद लोगों में श्रीराम दादा के विषय में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई तब दयाशंकर जी ने उनके विषय में बताते हुए कहा कि श्रीराम दादा का भरापूरा परिवार था उन्होंने मजदूरी करके पाई पाई जोड़कर कुछ पूँजी इकठ्ठी की थी उससे ठेला खरीदकर उस पर रेहड़ी लगाई थी इसके बाद उन्होंने बाजार में दुकान खोल ली थी। फिर उन्होंने व्यापार में खूब उन्नति की शहर में उनके पाँच मकान थे दस एकड़ जमीन,थी तीन दुकाने थी जिनका संचालन उनके दो बेटे रोहित रोशन करते थे दस एकड़ जमीन थी जो उन्होंने बँटाई पर दे रखी थी दोनों बेटों की शादी कर दी थी । अब उनकी उम्र भी सत्तर वर्ष की होने जा रही थी सोचा था कि सब बेटों को सौंपकर अब घर पर आराम से रहेंगे पर उनके दोनों बेटो और बहुओं ने उनका जीना हराम कर दिया था उनकी पत्नी गोमती भी बेटों और बहुओं के पक्ष में थी वे पूरे घर में अलग थलग पड़ गए थे उनको छोड़कर सबका यही ख्याल था कि सारे मकान बेचकर एक बड़ी आलीशान कोठी बनाई जाए और जमीन तथा तीनों दुकान बेचकर शॉपिंग मॉल खोला जाए। किसी दलाल ने उन्हें एक शॉपिंग मॉल बिकाऊ होने की बात कही थी उसका कहना था कि पचास करोड़ का शॉपिंग मॉल मात्र अठ्ठाइस करोड़ रुपये में बिक रहा है ऐसे मौके बार बार नहीं आते आप चाहो तो इसे खरीद सकते हो यह बात दोनों बेटों को जम गई थी उन्होंने अपनी मम्मी को भी अपने पक्ष में कर लिया था। श्रीराम दादा इसके विरोध में थे उनका कहना था वो शॉपिंग माल लगातार घाटे में चल रहा है इसलिए तो उसका ऑनर उसे बेचना चाह रहा है। उसे खरीदने से कोई लाभ नहीं है मगर,उनकी बात मानने को कोई तैयार नहीं हुआ था उन्होंने सारी प्रापर्टी अपनी पत्नी के नाम खरीदी थी । उनसे सबने बातचीत करना बंद कर दिया था वे सबकी नजर में अपराधी बन गए थे एक दिन उन्हें पता चला कि उनके बेटों ने माँ से मिलकर सारी संपत्ति बेच दी है तथा शॉपिंग मॉल का सौदा कर लिया जिसकी बीस लाख रुपये की दलाली उन्होंने दलाल को दी थी । श्रीराम दादा को लग रहा था कि वे अपनों के बीच अजनबी की तरह रह रहे हैं एक दिन उन्हें अपने गाँव से खबर,मिली की उनके भाई बंधु उन्हें गाँव पर बुला रहे हैं उनकी पैतृक संपत्ति का मामला था वे गाँव गए किसी ने उन्हें रोका टोका तक नहीं गाँव में संपत्ति विवाद सुलझ गए श्रीराम दादा को इसके बदले में तीस लाख रुपये मिले थे । उन्होंने सोचा कि अगर मैं यह रुपये लेकर बेटों के बीच जाता हूँ तो ये सारा रुपया भी वो हड़प लेंगे फिर उनका क्या होगा बुढ़ापा कैसे कटेगा उन्होंने गाँव से ही एक पत्र बेटों के नाम लिखा की अब तुम लोगों को मेरी जरूरत नहीं है इसलिए मैं घर छोड़कर जा रहा हूँ । मुझे मालूम है तुम मुझे ढूँढ़ने की कोशिश नहीं करोगे ठीक है तुम सब अच्छे से रहो मैं तो किसी तरह अपना बाकी जीवन गुजार लूँगा पत्र उनके दोनों बेटों तक पहुँचा मगर उन्सें कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। श्रीराम दादा ने वो पूरे पैसे बैंक में जमा करा दिए थे और उसके ब्याज से अपना गुजारा कर रहे थे। इसके बाद भी उनके बैंक में पैंतालीस लाख रुपये जमा हो गए थे। दयाशंकर जी कह रहे थे कि अगर उनके बेटों को यह पता चल गया तो वे जरूर,आएँगे बैंक में जमा पैसा निकलवाने के लिए इस समय दोनों बेटों की हालत खराब थी वे पैसे पैसे से मोहताज थे उनके पास अब खुद का कोई मकान नहीं था किराये के छोटे से घर में रह रहे हैं। दयाशंकर बोले हमें इससे क्या उनके पिता का रूपया है। वो उसका चाहे जो करें।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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