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कहानी: कलाकार

बलराम पुर कस्बे आज फिल्म जगत के मशहूर कलाकार रूपेश कुमार का चैरिटी शो था। वे इतने व्यस्त थे कि अपने बचपन के मित्रों परिजनों से भी ज्यादा देर तक नहीं मिल सके जिनके साथ बैठकर वे घंटों बात करना चाहते थे। उनसे बात करने के लिए उनके चंद मिनट ही मिल सके थे। उनका सगा भाई रमेश भी उनसे सिर्फ पाँच मिनट के लिए मिले थे। कार्यक्रम खत्म होते ही वे तुरंत मुंबई रवाना हो गए थे वहाँ उनकी शूटिंग थी।
दस वर्ष पहले रूपेश कुमार बलरामपुर में ही रहते थे। उनके पिता किशनलाल किसान थे उनका बड़ा भाई पटवारी था तथा छोटा भाई खेती कर रहा था। जब रूपेश बलरामपुर में रहते थे तब वे अपने पिता की नजर में नकारा निकम्मे इंसान थे। उनकी अपने पिता से बिल्कुल भी नहीं बनती थी। उनका कई कई दिनों तक आमना सामना भी नहीं होता था। कभी हो भी जाता था तो उनके बीच खूब तीखी बहस होती थी। रूपेश को तुरंत हटना पड़ता था। उन्हें लगता था कि यदि ज्यादा देर रुके तो पिता के हाथों मार खाने की नौबत भी आ सकती है। उसका कारण यह था कि रूपेश कुमार घर का कोई काम नहीं करते। कक्षा नौ में लगातार तीन साल फेल होने के कारण उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। जबकि उनका बड़ा भाई पढ़ने में तेज था तथा पिताजी के काम में भी हाथ बँटाता था। वो पिताजी का चहेता बेटा था। रूपेश को तो देखते ही उनकी त्यौरियाँ चढ़ जाती थीं। दरअसल रूपेश कलाकार थे बहुत अच्छा अभिनय कर लेते थे। अच्छा गाते थे मिमक्री कर लेते थे कॉमेडी करने में माहिर थे तथा नाटकों में भाग लेते थे। उनके पिता एक दुनियादार इंसान थे उनकी निगाह में रूपेश कुमार के ये हुनर किसी काम के नहीं थे। वे हमेशा ही उन्हें निकम्मा नकारा कहते हुए धरती पर बोझ बताते थे। बलरामपुर में एक नाटक मंडली आई थी रूपेश कुमार ने उस मंडली से घनिष्ठता कर ली थी। उन्हें नाटक में रोल भी मिलने लगे थे। कुछ दिन वो नाटक मंडली कस्बे में रुकी फिर दूसरे गाँव मानपुरा में आ गई थी। मंडली के साथ रूपेश भी आ गए उनके पिताजी ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जबकि बलरामपुर में रूपेश कुमार एक लोकप्रिय शख्सियत थे। पर उनकी तारीफ कोई उनके पिता से नहीं कर सकता था। वे रूपेश को कुल का कलंक समझते थे। मानपुरा में मंडली के नाटक प्रदर्शन के दौरान राजधानी के रंगमंच कलाकार आशीष कुमार ने उनके अभिनय को देखा तो उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह सके। दूसरे दिन उन्होंने रूपेश जी को अपने पास बुलाया तथा कहा कि वे शीघ्र ही एक कॉमेडी नाटक करने जा रहे हैं और तुम में मुझे अपने नाटक का हीरो दिखाई दे रहा है। हमारा ग्रुप बहुत प्रतिष्ठित ग्रुप है। हम पूरे देश में रंगमंच पर नाटक के शो करते हैं। मानपूर टूर के बाद जब मंडली दूसरी जगह जा रही थी तभी आशीष कुमार का ड्राईवर राजू कार लेकर आया और रूपेश को अपने साथ लेकर चला गया रूपेश से आशीष जी मिले और कहा आज आराम कर लो कल से रिहर्सल करना पड़ेगा। बिना घड़ी की सुइयों पर ध्यान दिए रिहर्सल के बाद जब नाटक वाॅच हुआ उसमें रूपेश नायक था। उसका अभिनय कमाल का था। नाटक सुपर हिट रहा था। फिर तो पूरे देश में उस नाटक की धूम ऐसी मची की फिल्म निर्माता उमेश जी ने इस पर फिल्म बनाने का निर्णय ले लिया। रूपेश को उन्होंने हीरो बनाया था। वहाँ से रूपेश सीधे मुँबई पहुँच गए। वहाँ उन्होंने फिल्म की शूटिंग में हिस्सा लिया। वो फिल्म देश विदेश में सुपर हिट साबित हुई। अब बलरामपुर के रूपेश सबसे प्रसिद्ध इंसान थे। इन आठ वर्षों में रूपेश देश की सेलेब्रिटी बन चुके थे। जिन पर बलराम पुर के लोगों पर बड़ा नाज था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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