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कहानी: अहंकार

शहर के लखन पब्लिक स्कूल के प्राचार्य नवनीत शर्मा पाँच वर्ष पहले तक अहंकार से भरे रहते थे। उन्हें अपने उच्चशिक्षित होने का बहुत घमंड था। छोटे मोटे काम को वे अपने स्तर के अनुरूप नहीं मानते थे ना ही छोटे काम करने वालों को बराबरी का दर्जा देते थे। इसी कारण से उन्होंने छोटी नौकरी पाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया था और बड़ी नौकरी उन्हें मिल न सकी थी।
नवनीत के पिता हरिवंशलाल जिला पंजीयक थे। नवनीत चाहते थे कि वे आइ ए एस अधिकारी बनें बी ए पास करने के बाद उन्होंने दो साल लगातार कोचिंग की, परीक्षा दी मगर असफलता ही हाथ लगी। फिर नवनीत ने अंग्रेजी में एम ए किया और प्रोफेसर बनने के लिए यू जी सी की परीक्षा दी। उसमें भी वे सफल नहीं हुए, हारकर उन्होंने बी एड किया। और सरकारी हायर सेकेण्डरी स्कूल में व्याख्याता बनने के प्रयास भी किए पर उसमें भी असफल रहे। पोस्ट ऑफिस में उन्हें सहायक की नौकरी मिल गई थी। तब उनके पिताजी ने उन्हें बहुत समझाया पर उन्होंने वो नौकरी इसलिए नहीं की क्योंकि वो उनकी गरिमा के अनुरूप नहीं थी। नवनीत जी की उम्र तीस वर्ष हो चुकी थी। पिताजी भी रिटायर हो गए थे। नौकरी, काम धंधा न होने के कारण उनकी शादी भी नहीं हुई थी। एक दिन वे गहरी निराशा में डूबे हुए थे। उन्हें अपना जीना निरर्थक लगने लगा था। उन्होंने ऐसी स्थिति मैं अपने जीवन का अंत करने का निर्णय ले लिया था। और इसके लिए वे घर से निकल भी पड़े थे। शहर से बाहर वे जंगल की ओर जा ही रहे थे कि एक मर्सीडीज उनके पास आकर रुकी उसमें से उनका हमउम्र का एक युवक बाहर निकला और उनसे मुखातिब होकर बोला- पहचाना मुझको? नवनीत जी ने गौर से देखा तो पहचानते हुए बोले कहीं तुम जगदीश तो नहीं हो? वे बोले हाँ वही तुम्हारे स्कूल का सहपाठी। नवनीत जी को याद आया कि जगदीश पढ़ाई में बहुत कमजोर था बाकी और कामों मे वो बहुत होशियार था। जब तक नवनीत हायर सेकेण्डरी पहुँच चुके थे तब तक भी जगदीश आठवीं कक्षा में ही था। हारकर उनके पिता आत्माराम ने उनकी पढ़ाई छुड़वा दी। वे हलवाई थे जगदीश को वे अपने साथ काम पर ले जाने लगे। उनके साथ आठ और लोग थे वे शादी विवाह तथा अन्य आयोजनों में भोजन बनाने का ठेका लेते थे। जगदीश से उनके पिताजी छोटे-मोटे काम करवाते थे। जिसके वो रोज डेढ़ सौ रुपये देते थे। जगदीश को वो काम बहुत अच्छा लगा। देखते-देखते जगदीश हलवाई का काम सीखने लगा। आटा गूँथना, सब्जी काटना, पूड़ी तलना, ये काम करते-करते एक दिन सब्जी बनाने का मौका मिला। सब्जी बनाने वाला उस दिन नहीं आया था। आत्माराम दूसरे जगह के काम में व्यस्त थे। तब जगदीश ने सब्जी बनाई जिसकी तारीफ सभी ने की। आत्माराम जी को पहली बार पता चला कि जगदीश बहुत अच्छा कुक है। एक बार दीपावली के त्यौहार पर जगदीश ने पिताजी से कहा क्यों न हम भी मिठाई की अस्थाई दुकान लगाएँ। आत्माराम बोले अपना जो काम है वही करो दुकाना लगाना सेठों का काम है हमारा काम तो मिठाई तैयार करना है उसी में हमारी भलाई है। मगर जगदीश ने पिताजी की बात नहीं मानी। उन्होंने अपनी सारी जमापूंजी दाँव पर लगा दी। पचास हजार रुपये ब्याज से उधार लिए वो भी झौंक दिए। दिन रात जागकर मिठाइयाँ बनाईं और दिवाली के दो दिन पहले मुख्य बाजार में अपनी दुकान लगा ली। वो दुकान खूब चली। दो दिन तक जगदीश जी को एक पल की भी फुरसत नहीं मिली।चौदह घंटे तक तो वो काउण्टर से एक पल के लिए भी इधर से उधर नहीं हुए। दिवाली के दिन शाम को चार बजे उनकी दुकान की सारी मिठाई बिक चुकी थी। जब जगदीश अपने घर पहुँचे और बैठकर हिसाब लगाया तो खुशी से उछल पड़े। उन्हें सारे खर्च काटकर पूरे सवा दो लाख रुपये का लाभ हुआ था। उनके पिताजी आत्माराम उन्हें बड़ी हैरत से देख रहे थे। चार दिनों में उन्होंने भी मेहनत कम नहीं की थी पर उन्हें अठारह हज़ार रुपये ही मिले थे। वे यही सोचकर खुश थे कि इससे वे दिवाली का त्यौहार मना लेंगे। मगर जगदीश की कमाई देखकर तो उनकी आँखें फटी रह गई थीं। जगदीश को वो अपना मार्ग मिल गया दिवाली के बाद उन्होंने शहर में कई दिनों से बंद पड़ी होटल के मालिक से संपर्क किया और वो होटल किराये से ले ली। होटल मालिक यह सोचकर खुश हो गया कि कम से कम किराया तो मिलेगा। उस होटल ने जगदीश को हलवाई से सेठ बना दिया था। जगदीश के हाथों मे जादू था। उसकी बनाई मिठाई और नमकीन के स्वाद की कोई बराबरी नहीं कर सकता था। जगदीश की वो दुकान ऐसी चली की उसने उस दुकान से लगी चार दुकानें भी खरीद लीं। बैंक से लोन लेकर पाँच हज़ार वर्गफीट के स्पेस में शहर का सबसे शानदार रेस्टोरेन्ट बनवाया। मात्र दो साल में जगदीश शहर का प्रमुख व्यवसायी बन गया था। जबकि अभी जगदीश की उम्र मात्र बाईस वर्ष की ही थी। जगदीश शहर का बड़ा दानदाता भी था। जगदीश ने ही लखन पब्लिक हायर सेकेणडरी स्कूल खोला था। जिसे संचालित हुए आठ वर्ष हो गए थे। स्कूल का शानदार कैंपस था, चौदह एकड़ जमीन में वो स्कूल फैला हुआ था। उसमें बारह सौ विद्यार्थी पढ़ रहे थे। नवनीत जी को जगदीश के विषय में यह सब जानकर बहुत हैरानी हुई। जगदीश के बहुत पूछने पर नवनीत ने अपने बारे में सब कुछ बताया जिसे जानकर जगदीश को बहुत दुख हुआ। वो नवनीत को मर्सीडीज में बिठाकर अपने स्कूल में ले आया और बोला मैं तुम्हारे जितना पढ़ा लिखा तो नहीं हूँ मगर हीरा और काँच को परखने की कला जानता हूँ। आज से इस स्कूल के प्रिन्सीपल तुम हो। नवनीत के भाग्य ऐसे बदल जाएँगे इसकी उन्हें कल्पना तक भी नहीं थी। प्राचार्य का कक्ष देखकर तो उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। स्कूल में पैसठ शिक्षक कार्यरत थे और वह उनका प्रिन्सीपल बन गया था। जगदीश ने नवनीत जी को शुभकामना देते हुए कहा था तुम्हें प्रिन्सीपल बनाकर मैं अब स्कूल की चिंताओं से अपने आपको मुक्त महसूस कर रहा हूँ। नवनीत जी ने पाँच सालों में लखन पब्लिक स्कूल को बुलंदियों पर पहुँचा दिया था। इसके साथ ही उनका अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया था। जिसके कारण वे सबके चहेते बने हुए थे। उनकी शादी भी हो गई थी। उनकी पत्नी डॉ मधुलिका कॉलेज में प्राॅफेसर थी और अब वे एक बेहतरीन जिंदगी जी रहे थे।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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