अस्सी वर्ष के किशनलाल जी अपने पिता के निधन पर इतना नहीं रोये थे जितना अपने दादाजी द्वारा डेढ़ सौ साल पहले लगाए गए आम के पेड़ के काट दिए जाने पर रोए थे। उनके आँसू नहीं थम रहे थे हसनपुर गाँव के उनके हमउम्र उन्हें खूब समझा रहे थे पर उनका दुख कम नहीं हो रहा था। आम का वो पेड़ ऐसा था जिसके आम सबसे मीठे होते थे उसकी केरी की चटनी बहुत अच्छी बनती थी। उस आम की घनी छाया में उनका बचपन जवानी और बुढ़ापे का बहुत सारा समय बीता था। बुढ़ापे में सब उनका साथ छोड़कर चले गए थे मगर ये पेड़ हमेशा उनके साथ रहा था। वे सोचते थे एक दिन वे तो मर जाएँगे मगर ये पेड़ जीवित रहेगा और अपने जीते जी पेड़ की हत्या उनसे सहन नहीं हो रही थी।
किशनलाल पाँच वर्ष पहले तक हसनपुर में ही रहते थे। उनका बड़ा मकान था जिसके आँगन में यह आम का पेड़ लगा हुआ था। उनके दो बेटे थे बड़े का नाम उमेश तथा छोटे का सुरेश था। दोनों भाई बैंग्लोर में अपने परिवार के साथ रहते थे। उमेश और सुरेश का बचपन हसनपुर में ही गुजरा था। उन्होंने पास के गाँव पीपलखेड़ा के स्कूल से हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास की थी। दोनों ने बी ई किया था और इंजीनियर बनकर बैंग्लोर में ही सेटल हो गए थे। गाँव के मकान में किशनलाल और उनकी पत्नी ललिता रह रही थी। उनके पास सोलह एकड़ जमीन थी जो बेटों ने छः करोड़ रुपये में बिकवा दी थी तथा उन पैसों से बैंग्लोर में मकान खरीद लिया था। किशनलाल जी से यह कहा था कि इसके बदले वे उन्हें आजीवन पच्चीस हजार रुपये देते रहेंगे। यह सिलसिला कुछ दिनों तक तो ठीक से चलता रहा फिर वे पैसे भेजने में देर करने लगे। ललिता के बहत्तर वर्ष की आयु में निधन हो जाने पर बेटों ने बारह हज़ार रुपये महीने किशनलाल जी को देना शुरू कर दिए थे। उसमें भी बेटे कभी कभार कटौती कर दिया करते थे। किशनलाल जी एक समय में गाँव के सबसे अधिक संपन्न किसान थे। और अब उनके पास एक मकान और आम के पेड़ के अलावा कुछ नहीं था। एक दिन उनके दोनों बेटे उनके पास आए उन्होंने बड़े प्रेम से कहा कि माँ के चले जाने से जो जेवर घर में रखे हैं वे दे दो हमें, हम उन्हें बैंक के लॉकर में रखवा देते हैं वहाँ सुरक्षित रहेंगे। ललिता के पास पचास लाख के जेवर थे एक दिन दोनों बेटे उन्हें बैंक ले गए वहाँ उनसे कई जगह दस्तखत कराए गए और फिर उन्हें घर लाए। दो दिन बाद वे दोनो भाई बैंग्लोर चले गए।इसके छः महीने बाद दोनों भाईयों ने किशनलाल जी के पुश्तैनी मकान को भी बेच दिया इसके उन्हें पैसठ लाख रुपये मिले थे जो दोनों भाईयों ने आपस में बाँट लिए तथा किशनलाल जी को वृद्धाश्रम में छोड़कर अपने दायित्वों से मुक्त हो गए थे। किशनलाल जी जब अपना मकान छोड़ रहे थे तब वे आम के पेड़ से लिपटकर देर तक रोते रहे थे। उन्होंने मकान के नए मालिक से यही कहा था कि महरबानी कर के यह आम का पेड़ कभी मत काटना। लेकिन उनके जाने के बाद नए मालिक ने वो पेड़ कटवा दिया था। तथा उसकी लकड़ी से फर्नीचर बनवा लिया था। किशनलाल जी को इसका पता तब लगा था जब वे वृद्धाश्रम से हसनपुर गाँव में किसी काम के सिलसिले में आए थे। उनका मकान तुड़वाकर उस पर हवेली बना ली गई थी। इसका उनको कोई मलाल नहीं था दुख तो उन्हें आम के पेड़ के काट दिए जाने पर हुआ था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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