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कहानी: गृहप्रवेश

आज रवीन्द्र बाबू ने छत्तीस साल सरकारी मकान में बिताने के बाद अपने मकान में गृह प्रवेश किया था इस अवसर पर,दिन में पूजा एवं अनुष्ठान के बाद रात्रि में स्नेह भोज का आयोडन किये गया था अपने मकान में आकर रवीन्द्र बाबू तथा उनका परिवार असीम सुख का अनुभव कर रहे थे।
रवीन्द्र बाबू शिक्षा विभाग में एकाउण्टेन्ट के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने छत्तीस साल तक अपनी सेवाएँ दीं थीं ।गत वर्ष वे अपने पद से सेवानिवृत्त हुए थे उनका शहर में कहीं निजी मकान नहीं था । सरकारी मकान में रहकर उन्होंने पूरी नौकरी की थी दस साल पहले उन्होंने बारह सौ वर्गफुट का एक आवासीय,भूखंड साढ़े चार लाख रुपये में खरीदा था जिसकी वर्तमान में कीमत बीस लाख रुपये थी उसमें उन्होंने थोड़ा सा निर्माण कार्य कराया था। उनका बेटा बेटी बहु तथा दामाद दवाब डाल रहे थे कि वे रिटायरमेन्ट के पहले अपना मकान बनवा लें पर उनकी गुंजाइश इतनी कभी नहीं हुई कि वे मकान बनवा पाते एक दिन उनके बेटे अजय ने कहा कि पापा रिटायर मेन्ट के बाद आपको कितने रुपये मिलेंगे रवीन्द्र बाबू बोले ग्रेच्यूटी कम्यूटेशन जीपी एफ जी आई सी अरन लीव का पैसा मिलाकर यहो कोई पैंतालीस लाख रुपये मिलेंगी सुनकर अजय बोला कि शहर में एक बिल्डर बहुत बढ़िया कॉलोनी बना रहे हैं उसमें जो फोर बी एट के डुप्लेक्स बनाकर,दे रहे हैं उसकी कीमत पिचहत्तर लाख रुपये है क्यों न हम भी वहाँ डुप्लेक्स बुक करा लें सुनकर रवीन्द्र बाबू बोले पिचहत्तर लाख रुपये,आएँगे कहाँ से अजय बोला बीस लाख में प्लॉट बेच देंगे पैंतालीस लाख रुपये आपको मिलेंगे पैंसठ लाख रुपये और दस लाख की आपकी सेविंग है ऐसे पैसे की व्यवस्था हो जाएगी इस पर रवीन्द्र जी ने कहा जब सारे पैसे मकान में लगा देंगे तो बुढ़ापे के लिए पैसा ही नहीं रहेगा तो करेंगे क्या अडय बोला आपको पेंशन भी तो मिलेगी । रवीन्द्र जी ने कहा तुम कितना रुपया दोगे मकान के लिए तो अजय बोला मैं तो प्राइवेट नौकरी कर रहा हूँ मुझे पच्चीस हज़ार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है मेरा ही खर्च पूरा नहीं होता तो आपको पैसे कहाँ से लाकर दूँगा। रवीन्द्र बाबू ने कहा तो फिर सब मुझ पर छोड़ दे अपना प्लॉट अच्छी कॉलोनी मेंहै उसे बना लेंगे यह बात सुनकर अजय नाराज हो गया कौन बनवाएगा मकान किसे इतनी फुरसत है मैं प्राइवेट में नौकरी करता हं मुझे छुट्टी नहीं मिलती रवीन्द्र बाबं बोले उसकी चिंता तू मत कर मैं रिटायर हो रहा हूँ न मैं बनवाऊँगा मकान अजय हँसी उड़ाते हुए बोला बुढ़ापे में हो जाएगा आपसे सब हमें झुग्गी झोपडी नहीं अच्छा मकान चाहिए । रवीन्द्र बाबू बोले जैसा मकान चाहिए उससे अच्छा मकान बनाकर दूँगा और क्या चाहिए तुम्हें अजय बोला आपसे तो कुछ कहना ही बेकार है यह कहकर वो चला गया उसके जाते ही उनकी पत्नी सुशीला उन्से मकान को लेकर उल्टी सीधी बातें करने लगी। रवीन्द्र बाबू सुनकर चुप रहे बोले कुछ नहीं । रिटायर होने के बाद वे पूरी तरह से अपने मकान बनाने की योजना पर विचार करने लगे । रिटायर होते ही रवीन्द्र बाबू ने अपने मकान के निर्माण पर ध्यान केन्द्रित कर लिया था। पंरे साल भर तक वे अपना मकान बनवाने में जुटे रहे मकान बनने के बाद जब रवीन्द्र जी ने वो मकान अपने बेटे अजय को बताया वो इतना खूबसूरत डुप्लेक्स देखकर चौंक गया था। रवीन्र्द्र,बाबू ने कहा इसमें दो बड़े हाल हैं कार पार्किंग की जगह है । माड्यूलर,किचिन है आठ कमरे और सारी सुविधाएँ हैं फिर भी कोई कमी आ रही हो तो बताओ अजय तो मकान देखकर ही खुश था वो क्या बोलता रवीन्द्र बाबू बोले अठ्ठाइस लाख रुपये इसकी लागत आई है और बिल्डर पिचहत्तर लाख रुपये में भी ऐसा मकान नहीं दे रहा है। अजय ने इस पर पहली बार अपनी सहमति जताई थी।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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