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कहानी: अतिक्रमण

मदनपुर ग्राम का शासकीय माध्यमिक स्कूल जो कभी गाँव की सबसे अच्छी लोकेशन में स्थित था आज चारों तरफ से अतिक्रमण से घिरा हुआ था। जब यह स्कूल बना था तब यह दो एकड़ जमीन पर था। और अब इस स्कूल के पास मात्र दो हज़ार वर्ग फुट जमीन बची थी जिसमें शाला भवन भी था और छः सौ फीट का मैदान था जहाँ  रोज प्रार्थना होती थी। स्कूल के फ्रंट पर सिर्फ गेट बचा था जिससे स्कूल में प्रवेश किया जा सकता था। आसपास दुकानें बनी हुई थीं जो अतिक्रमण कर बनाई हुई थीं।
अतिक्रमण की शुरूआत बीस साल पहले हुई थी इसके पहले शाला प्रभारी मोहन लाल थे। उन्होंने स्कूल परिसर को बहुत अच्छा बना दिया था। जब तक वो शाला प्रभारी रहे तब तक कोई भी स्कूल की एक इंच जमीन पर भी कब्जा नहीं कर सका था। मोहनलाल जी का तबादला तत्कालीन सरपंच रामसिंह ने करा दिया था तथा उनके स्थान पर अपने भतीजे घनश्याम की पदस्थापना करा दी थी। घनश्याम सिंह जब शाला प्रभारी बने तभी स्कूल के सामने से पक्की सड़क बनाई गई जो भोपाल रोड को जोड़ रही थी। घनश्याम की नजर स्कूल की जमीन पर थी उन्होंने अपने भाई बंधुँओं से मिलकर सारी जमीन पर कब्जा कर लिया जिसमें एक दर्जन दुकाने तो घनश्याम सिंह की ही थीं। जो सब किराये पर चल रही थीं। जिनका दो लाख रुपये प्रतिमाह किराया उनके पास आ रहा था। वे तो अब रिटायर हो गए थे तथा गाँव में रहकर राजनीति कर रहे थे। वे न तो अच्छे शिक्षक न ही अच्छे इंसान थे। स्कूल के गेट के ऊपर बोर्ड लगा हुआ था। उसे पढ़कर ही पता चलता था कि यहाँ स्कूल है। बाकी और कोई चिन्ह उस स्कूल पर नहीं था। उस अतिक्रमण को हटाने का किसी में भी साहस नहीं था। स्कूल में गरीब और कमजोर तबके के लोगों के बच्चे पढ़ते थे। वे सब दबंगों के खेतों में काम करते थे। थोड़े बहुत लोग मजदूरी करते थे। उनकी कोई राजनैतिक पहुँच नहीं थी न उनका दबदबा था। जिनका दबदबा था उनके बच्चे प्राईवेट स्कूल में पढ़ रहे थे। घनश्याम सिंह का यह प्रयास था कि यह स्कूल यहाँ से हट जाए तो पूरी जमीन पर ही वे कब्जा कर लें और शीघ्र ही उनकी यह कामना भी पूरी होने जा रही थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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