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कहानी: सुखद आश्चर्य

शिक्षक दीनदयाल जी को रिटायर हुए पूरे आठ माह हो गए थे लेकिन उनकी ग्रेच्यूटी, जी पी एफ सहित अन्य कई क्लेम उन्हें नहीं मिले थे। वे परेशान थे कई बार डी ई ओ ऑफिस के चक्कर काटने के बाद भी कुछ लाभ नहीं हुआ था। परेशान होकर आज वे कलेक्टर से मिलने आए थे लेकिन कलेक्टर से मिलते ही वे सुखद आश्चर्य में डूब गए थे। कलेक्टर उनकी स्टूडेन्ट रही सलोनी मीना थीं। उन्होंने अपने सर को बहुत सम्मान दिया, वे दबंग कलेक्टर थीं जब उन्हें दीन दयाल जी ने अपनी समस्या बताई तब उन्होंने तुरंत डी ई ओ और अन्य संबंधित अधिकारियों को बुलवाया तथा एक हफ्ते में सर के पूरे प्रकरणों को निपटाने के सख्त आदेश दिए और कहा कि यदि काम पूरा नहीं हुआ तो उसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना। कलेक्टर सलोनी ने सर को इतना मान दिया था कि उनके सामने वो कलेक्टर की कुर्सी पर भी नहीं बैठी थीं। कांफ्रेन्स हॉल में बैठकर उनसे बात की थी। सलोनी से मिलकर आज वे बहुत खुश थे।
दीनदयाल जी घर आने के बाद सलोनी के विषय में ही सोच रहे थे। सलोनी के पिता शिवलाल से उनकी बात पन्द्रह साल पहले हुई थी। शिवलाल जी अपने बेटे नितिन का प्राइवेट स्कूल में एडमीशन कराने आए थे। शिवलाल जी सोनपुर कस्बे से आठ किलोमीटर दूर एक गाँव खैरपुर में रहते थे जहाँ प्राइमरी स्कूल था। तब दीनदयाल जी सोनपुर की शासकीय कन्या माध्यमिक शाला के शाला प्रभारी थे। उन्होंने शिवलाल से पूछा आपकी बेटी है? तो उन्होंने कहा हाँ है। कौन सी में पढ़ती है? शिवलाल बोले इसी साल पाँचवी पास की है। उसे आगे पढ़ाने का हमारा कोई इरादा नहीं है। इसलिए उसका कहीं एडमीशन नहीं कराया। बच्चे के एडमीशन में ही बहुत रूपये खर्च हो गए। तीन एकड़ जमीन का छोटा किसान हूं। बेटी की पढ़ाई का खर्च कैसे उठाऊँगा। तब दीनदयाल जी ने समझाया कि हमारे सरकारी स्कूल में भर्ती करा दो एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ेगा। यह सुनकर शिवलाल बोले बेटे की स्कूल बस और पढ़ाई का खर्च दो हजार रुपये प्रतिमाह है। अगर बेटी को पढाऊँगा तो उसकी स्कूल बस का एक हजार रुपये महीना देना पड़ेगा इतने रुपये मैं लाऊँगा कैसे। दीनदयाल बोले आप बिटिया का एडमीशन तो कराओ बाकी समस्या भी सुलझ जाएँगी। शिवलाल बोले मैं बेटी की मम्मी से पूछकर बताऊँगा। दूसरे दिन शिवलाल जी स्कूल में आए और बोले बिटिया की मम्मी को बहुत समझाया तब वो एक शर्त पर तैयार हुई। वो ये कि अगर आप उसे अपनी मोटरसायकिल पर बिठाकर स्कूल ले जाएँ और छुट्टी होने पर फिर घर छोड़ जाएँ। वैसे भी आप मोटरसायकिल से रोज हमारे घर के सामने की सड़क से निकल कर जाते ही हैं। उसकी माँ को आप पर पूरा भरोसा है। दीनदयाल जी बोले ठीक है ऐसा कर लेंगे बिटिया का एडमीशन तो कराओ। इस तरह शिवलाल जी ने अपनी बेटी सलोनी का विद्यालय में एडमीशन कराया। सलोनी की पाँचवी की अंकसूची देखकर उन्हें बड़ी खुशी हुई वो टॉपर थी। पढ़ने में खूब तेज वे पूरे तीन साल तक सलोनी को मोटरसायकिल पर बिठाकर स्कूल लाते रहे। सलोनी ने आठवीं में टॉप किया था। दीनदयाल जी ने सलोनी से प्रतिभा खोज परीक्षा दिलवाई थी। उसमें उसका चयन हो गया था। इससे सलोनी का आगे पढ़ाई का रास्ता क्लीयर हो गया था। दीनदयाल जी का कुछ समय बाद सलोनी से ध्यान हट गया। वे कुछ और मेधावी छात्रों की पढ़ाई पर ध्यान देने लगे थे। उन्हैं अखबारों से पता चला कि सलोनी ने बारहवीं की परीक्षा में जिले में टॉप किया है। सलोनी अठारह वर्ष की हो गई थी। सलोनी की माँ अब किसी भी हाल में सलोनी को आगे पढ़ाना नहीं चाहती थी। वो उसकी जल्दी से जल्दी शादी करा देना चाहती थी। शिवलाल जी को पता चला कि भोपाल में एक लड़का है सोहन उसकी उम्र चौबीस साल है। वो चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट है। वे भोपाल में लड़के के घर गए। सलोनी के रिश्ते की बात कही तो वे बोले हम पहले लड़की देखेंगे। वो जल्दी ही लड़की देखने आ गए। सलोनी को देखते ही उन्होंने पसंद कर लिया। सलोनी ने सोहन से अकेले में जो बात कही वो ये थी कि आप मुझे आगे पढ़ाओगे। सुनकर सोहन बोले क्यों नहीं इतनी टेलेन्टेड लड़की का पढ़ना बेहद जरूरी है। यह सुनकर सलोनी ने शादी के लिए हाँ कह दी। शादी के बाद सोहन ने अपना वादा निभाया। सलोनी का कॉलेज में एडमीशन कराया और उसकी पढ़ाई में सहयोग दिया। सलोनी ने बी एस सी की पढ़ाई के बाद यू पी एस सी की तैयारी करना शुरू कर दी थी। सलोनी प्रतिभाशाली थी पहले प्रयास में ही सलोनी का आइ ए एस के लिए चयन हो गया था। सलोनी के गाँव में खूब खुशियों मनी थीं। दीनदयाल जी इन सबसे बेखबर रहकर अपना काम कर रहे थे। सलोनी को वे भूल गए थे। आज इतने सालों बाद सलोनी को उन्होंने जिले के सबसे बड़े अधिकारी के रूप में देखा था। यही उनकी खुशी का सबसे बड़ा कारण था।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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