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जुलाई, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: ज़मीन बेचने के बाद

किशन लाल  ने चार साल पहले अपनी जो  खेती की ज़मीन यह कहकर बेच दी थी कि इसमें कोई लाभ नहीं है मजदंरी तक नहीं मिलती उसी ज़मीन पर आज वो मजदूरी कर रहा था।  तधा अब उसके पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं बचा था। किशनलाल की ज़मीन नवीन कुमार ने खरीदी थी उस जमीन से नवीन कुमार ने खूब फायदा उठाया था  और आज वो खुशहाल जीवन जी रहा था जबकि किशनलाल  को जमीन बेचने से जो पचास लाख रुपये मिले थे वो  चार साल में पूरे खर्च हो गए थे हारकर वो वापस शहर से गाँव आ गया था। अपने उस घर को जिसे वो छोड़कर गया था उसी में रह रहा था। किशन लाल को चार साल पहले  शहर का जीवन बहुत अच्छा लगता था शहर के मकान लोगों का रहन सहन  उसे  शहर में रहने के लिए प्रेरित करता था गाँव से शहर वह रोज बीस लीटर दूध एक होटल में बेचता था। होटल मालिक से उसकी बात होती जिससे वो अंदाज लगाता कि होटल के धंधे में बहुत फायदा है होटल भालिक के आलीशान बँगले और मँहगी  कार तथा रहन सहन ने उसे बहुत प्रभावित किया था इधर लगातार तीन साल से उसकी फसल चौपट हो रही थी लागत तक नहीं निकल पा रही थी उसके ऊपर आठ लाख का कर्ज हो ग...

कहानी: गरीब की पढ़ाई

बचपन में पिता का साया सिर से हट जाने के बाद सौतेले पिता के साथ रहकर सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर के रमन लाल आज शहर के माने हुए रईस थे। वहीं उनके बचपन  के दौर में सबसे अमीर पिता का पुत्र संदीप उनके  कारखाने में साधारण श्रमिक की तरह काम कर अपना जीवन यापन कर रहा था। रमनलाल जब तीन वर्ष के थे तब उनके पिता दयाराम को साँप ने डंस लिया था जिससे उनकी मौत हो गई थी उस समय उनकी बहन राखी मात्र छः महीने की थी रमनलाल की माँ सुगन की उम्र मात्र तेइस वर्ष की थी। सुगन ने  जमींदार अवधेश प्रताप सिंह के खेतों में काम करने वाले  सुखलाल से शादी कर ली थी वो अपने साथ अपने दोनों बच्चे भी लाई थी। सुखलाल का जब सुगन से पुत्र पैदा हुआ उस समय रमनलाल की उम्र छः वर्ष थी रमन का नाम सरकारी स्कूल में लिखा दिया गया था। सौतेले भाई के जन्म के बाद सुखलाल का रवैया रमन के प्रति ठीक नहीं था वह उसकी पढ़ाई के भी खिलाफ था पर सुगन के कारण वो उसे पढ़ने से रोक नहीं पा रहा था रमन पढ़ाई मैं बहुत तेज थे जो किताबें सरकारी तौर पर उन्हें मिली थीं  वे उन्होंने छः महीने में ही पूरी पढ़ ली थीं रमन हर साल...

कहानी: आठ कक्षाएँ दो शिक्षक और शोकाज नोटिस

साजन खेड़ी ग्राम की शासकीय माध्यमिक शाला में पाँच शिक्षकों की पदस्थापना थी लेकिन दो ही शिक्षक कार्यरत थे । पिछले दिनों डी पी सी ने स्कूल का निरीक्षण किया था निरीक्षण में जो शिक्षक दूसरी जगह रहकर मजे कर रहे थे उनसे कुछ नहीं कहा कार्यरत दोनों शिक्षकों  को आज शोकॉज नोटिस दे दिया गया था नोटिस में लिखा था संतोषजनक कारण नहीं देने पर निलंबन की कार्यवाही या दो वेतनवृद्धि भी रोकी जा सकती है। नोटिस देखकर शिक्षक शिवप्रसाद तथा  संजय सिंह की हालत खराब हो गई थी शिवप्रसाद जी का तो ब्लडप्रेशर बढ़ गया था।  दोनों शिक्षक ईमानदार और कर्म निष्ठ थे उनका कोई सरपरस्त नहीं था न ही उनकी राजनैतिक पहुँच थी दोनों समय से विद्यालय आते थे  तथा पूरे समय स्कूल में रहकर काम करते थे उनमें शिवप्रशाद जी को ग्रामप्रभारी बना रखा था तथा संजय सिंह बी एल ओ का कार्य भी कर रहे थे  विद्यालय  के प्राथमिक विभाग में पैंसठ छात्र दर्ज थे तथा माध्यमिक विभाग में   अठ्ठावन छात्र पढ़ रहे थे शिवप्रसाद पर मध्यान्ह भोजन तैयार कराने की जवाबदारी थी  संजय सिंह शाला प्रभारी भी थे  दोनों शिक्षकों को...

कहानी: दामाद

हरिमोहन जैसे दामाद के कारण आज ससुराल वाले सभी सुख से रह रहे थे वहीं हरिमोहन की पत्नी रजनी भी इस बात पर अपने पति पर गर्व करती थी हरिमोहन के सहयोग से जो दस एकड़ जमीनी खरीदी गई थी उसने ससुराल की काया पलट दी थी। हरिमोहन की शादी रजनी से पन्द्रह साल पहले हुई थी तब रजनी के दादा राम किशन जीवित थे उनके पास चालीस एकड़ जमीन थी जिससे वे रतनपुर गाँव के संपन्न किसान समझे जाते थे हरिमोहन महुआ खेड़ी गाँव के रहने वाले थे उनकी गाँव में छोटी सी दुकान थी और उनके पिता के पास चार एकड़ जमीन थी हरिमोहन का एक छोटा भाई भी था जिसका नाम जगमोहन था। हरिमोहन के साले का नाम रामकिशोर था। तथा ससुर का नाम रूप नारायण था रूपनारायण एक गैर जिम्मेदार इंसान थे ज्यादतर समय वे दोस्तों में बिता देते थे और अनाप शनाप पैसा खर्च करते थे घर की जिम्मेदारियों का उन्हें कोई अहसास नहीं था हरिमोहन की शादी के एक साल बाद ही रजनी के दादाजी रामकिशन जी का हार्ट उटेक के कारण निधन हो गया था। तब हरिमोहन के साले की उम्र मात्र ग्यारह वर्ष की ही थी। रामकिशन के मरते ही रूपनारायण निरंकुश हो गए थे अब वे पूरी चालीस एकड़ जमीन के मालिक थे। प...

कहानी: बरसात

सात दिनों तक लगातार जारी बरसात के बीच मजदूरी का काम करने पर सुंदरलाल को पूरे पाँच हज़ार रुपये मिले थे जिसमें दो हजार रुपये और मिलाकर उसने समूह से लिए कर्ज की किश्त अदा कर दी थी। इस किश्त को लेकर सुंदरलाल बहुत चिंतित था पिछले दिनों साले की लड़की निशा की शादी में उसके दस हज़ार रुपये खर्च हो गए थे जिससे उसका सारा बैलेन्स गड़बड़ा गया था किश्त की देय तिथि दस दिन बाद आने वाली थी और उसके पास सिर्फ दो हज़ार रुपये ही बचे थे ऐसे में यह काम मिल जाने से उसकी किश्त समय पर अदा हो गई। पिछले सात दिनों से लगातार बारिश हो रही थी नदी नाले उफान में थे बारिश से जन जीवन प्रभावित हो रहा था। सुंदरलाल सोच रहा था ऐसी बरसात में वो काम ढूँढने जाएगा और कौन उसे मजदूरी पर रखेगा तभी उसके मोबाइल पर मिस्त्री जगमोहन का फोन आया मिस्त्री कह रहा था सदर बाजार के पास शारदा कॉलोनी में काम मिल रहा है एक मिस्त्री और दो मजदूर की जरूरत है। दिन भर के साढ़ सात सौ रुपये मिलेंगे अगर करना चाहते हो तो आ जाओ। यह सुनकर सुंदर लाल बोला कि ठीक है मैं आधे घंटे में पहुँच रहा हूँ जगमोहन ने फोन रखते रखते कहा अगर एक और मजदूर मिल जाए तो ...

कहानी: किफायत

दौलतराम जी ने अपने बेटे की शादी बड़ी धूमधाम से की थी पूरे रायनगर में इस शादी की चर्चा थी दौलतराम नगर सेठ थे साथ ही शहर के दानवीर भी वे माने जाते थे। आज वे भले ही मुक्त हस्त से खर्च कर रहे थे पर तीस,वर्ष पूर्व ऐसा नहीं था उस समय वो बहुत गरीब थे मेहनत मजदूरी कर अपना जीवन यापन कर रहे थे। उनके साथ रामकिशन भी मजदूरी करते थे पर रामकिशन आज भी मजदूरी कर रहे थे जबकि दौलतराम कहाँ से कहाँ पहुँच गए थे उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि वे किफायत बरतते थे जहाँ एक रुपये खर्च हो रहे हों वहाँ वो दस रुपये खर्च करना पसंद नहीं करते थे । रामकिशन कर्ज लेकर घी पीने वालों में से थे जितना कमाते उससे अधिक खर्च कर देते और हर वक्त कर्ज का रोना रोते रहते थे। तीस वर्ष पूर्व दौलतराम कुशलपुरा ग्राम से रायनगर में रहने आए थे तब उनके पास कुछ नहीं था तब उनकी नई नई शादी हुई थी। उनके सौतेले पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया था तथा एक फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी शुरू में दौलतराम मजदूरी करते रामकिशन के साथ साइट पर जाते और ठेकेदार के पास काम करते फिर वे इलेक्टूरानिक की दुकान पर काम करने लगे वे दुकान के मैकेनिक के सहयोगी बन काम करन...

कहानी: सख्ती का नतीजा

सुरेश तिवारी जी को दो साल तक मुकद्दमा लड़ने के बाद माननीय अदालत ने आज बरी कर दिया था इसके साथ ही दो साल तक जो उन्होंने मानसिक प्रताड़नाएँ सामाजिक तिरस्कार तथा कदम कदम पर जो अपमान झेला था उससे उन्हें आज मुक्ति मिल गई थी आज वे अपने आपको हल्का महसूस कर रहे थे उनके लिए ये संतोष की बात थी कि रिटायरमेन्ट के नजदीक आते आते वे बरी हो गए थे। सुरेश जी ढाई वर्ष पहले ग्राम बरखेड़ा के हाई स्कूल में प्रिन्सीपल के पद पर पदोन्नत होकर आए थे मन में बहुत कुछ करने की तमन्ना थी वे अंग्रेजी के बहुत अच्छे व्याख्याता थे ईमानदार कर्त्व्यनिष्ठ एवं समय के पाबंद इंसान थे। यहाँ आकर पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने स्टॉफ की मीटिंग ली और अपनी बात उनके सामने रखी जिसमें सभी से समय पर आने समय से जाने तथा बच्चों को अच्छे से पढ़ाने की बात कही गई थी सुरेश जी नकल के सख्त खिलाफ थे मीटिंग में उन्होंने शिक्षकों से जोर देकर कहा था कि आप अच्छे से पढ़ाओगे तो नकल कराने की नौबत ही नहीं आएगी। मीटिंग तो समाप्त हो गई पर पूरा स्टॉफ अंदर से सुरेश जी के प्रति नाराजगी रख रहा था। तिवारी जी दूसरे दिन दस बजे स्कूल पहु...

कहानी: मुफ़लिसी

आज भी राकेश को कोई काम नहीं मिला था वो बड़ी मिन्नत कर के चक्की वाले से आटा उधार लेकर आया था बच्चे सुब्ह से भूखे थे और उसका इंतजार कर रहे थे जब उन्होंने राकेश का हाथ में आटे की थैली देखी तो उन्हें बड़ी खुशी हुई चलो कम से कम आज तो भरपेट खाना मिल जाएगा राकेश की ,पत्नी शा॔ता कहीं से भाजी तोड़ लाई थी वो भाजी उसने चूल्हे पर कड़ाई रखकर उस पर बनने रख दी फिर आटा गूँथा सबने रात के दस बजे तक खाना खाया आज तो गनीमक रही की खाना जल्दी मिल गया कल तो बच्चे भूखे ही सो गए थे कल राकेश साढ़े ग्यारह बजे रात को तो आटा लेकर आया था खाना बनाते खाते रात को एक बज गई थी शांता ने बच्चों को नींद से जगाकर खाना खिलाया था।  परसों राकेश को आटा नहीं मिल सका था उस दिन बच्चे और वह तथा शाँता भूखे ही सो गए थे दोनों बच्चों ने तो दोपहर में स्कूल में मध्यान्ह भोजन कर लिया था पर उस दिन शा॔ता और राकेश को एक निवाला तक हासिल नहीं हुआ था। दरअसल जो आटा चक्की का मालिक रमेश साहू था वो कहीं रिश्तेदारी में चला गया था। चक्की पर उसका भतीजा रोहित था राकेश ने उससे आटा उधार माँगा तो उसने पुरानी उधारी का हवाला देते हुए आटा देने से ...

कहानी: रिटायरमेन्ट के बाद खेती का जुनून

सोहनलाल जो रेल्वे में बुकिंग क्लर्क के पद से तीन साल पहले रिटायर हुए थे खेती करने का शौक रखने के कारण पाँच एकड़ जमीन खरीदने तथा लगातार उसमें नुक्सान उठाने के बाद उसे बेचकर फिर से शहर आ गए थे और आज वो अपने आपको काफी हल्का फुल्का महसूस कर रहे थे। सोहनलाल जी को किसान बनने की बड़ी चाह थी जब वे रेल्वे की नौकरी करते थे तो हरे भरे लहलहाते खेत उन्हें खूब आकर्षित करते थे उन्हें किसान के भाग्य से ईर्ष्या होती थी वो सोचते काश वो भी किसान होते तो कितना अच्छा रहता उनकी पत्नी अनीता भी इसी तरह के ख्याल रखती थी। जब वह रिटायर हुए तो रिटायरमेन्ट के बाद  उन्होंने पाँच एकड़ जमीन शहर से सत्तर किलोमीटर दूर स्थित शेरपुर गाँव से लगी हुई खरीद ली जमीन उन्होंने पचास लाख रुपये में उसी गाँव के किसान रेशम लाल से खरीदी थी। रेशमलाल ने उन रुपयों से शहर में एक डुप्लेक्स खरीद लिया था उसमें वे अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। इधर सोहनलाल जी और उनकी पत्नी अनीता भी जमीन खरीदकर बड़े खुश थे उन्हें अपने सपने साकार करने का अवसर मिल गया था जमीन गाँव के एकदम पास थी उस जमीन में ही मकान भी बन...

कहानी: अटेचमेन्ट

दो साल पहले तक अपने सहकर्मी ज्ञान प्रकाश शिक्षक वरिष्ठ कार्यालय में अटेच रहने से परेशान शिक्षक रमेश चँद्र जी को जबसे उनके स्थान पर आए शिक्षक सतीश  से उन्हें काफी राहत मिली थी स्कूल की पढ़ाई अच्छी होने से छात्र सँख्या बढ़ी थी जिससे एक और मेडम कुसुम वर्मा की पदस्थापना भी हो गई थी वे भी अच्छा पढ़ा रही थीं संग्रामपुर गाँव के ग्रामीण भी स्कूल की व्यवस्थाओं पर खुश थे।  दो साल पहले जो शिक्षक ज्ञान प्रकाश विद्यालय में पदस्थ थे वे कभी स्कूल आते ही नहीं थे कभी डी पी सी तो कभी डी इ ओ, बी इ ओ ऑफिस में ही अटेच रहते थे। इससे रमेशचँद्र जी को बड़ी परेशानी होती थी पहली से पाँचवी तक के पैंसठ बच्चों को पढ़ाने वाले वे एकमात्र शिक्षक थे फिर सरकारी काम करने बैठकों में जाना सर्वे करना ऐसे पचासों काम उन्हें करना पड़ता था। शाला खाली भी नहीं छोड़ सकते थे जनशिक्षक दिनेश भी कोई दूसरे शिक्षक की व्यवस्था करने में असमर्थ थे एक बार जब इस बात को रमेश जी ने आगे तक पहुँचाई तो एक दिन ज्ञान प्रकाश ने उन्हें धमकी देते हुए कहा सर मेरे पीछे मत पड़ो अगर पीछा नहीं छोड़ा तो आपको लेने के देने पड़ जाएँगे।  मेरी...

कहानी: अभिशप्त जीवन

अपनी ईमानदारी के कारण उपेक्षित जीवन जीने वाले  एक सरकारी विभाग के बड़े अधिकारी धीरज वर्मा जी के निधन को पाँच वर्ष पूरे हो गए, आज उनका श्राद्ध था। जिसमें उनके बेटे नीतेश ने इक्कीस ब्राह्मणों को भोजन कराकर खूब दान दक्षिणा दी थी बंधु बाँधवों एवं परिचितों को भी भोजन कराया था उनकी तस्वीर पर गुलाब के फूलों की माला चढ़ाई गई थी। पर कहने वाले कहने से थोड़ी चूकते हैं धीरज बाबू के मित्र मोहन ने कह ही दिया  बेटा यदि पिता का ख्याल पहले ही रखा होता तो उनके श्राद्ध की नौबत नहीं आती वो भी आज हमारे बीच जीवित होते। सुनकर नितेश का चेहरा फीका पड़ गया बोला नहीं अंकल जी ऐसी कोई बात नहीं है हम तो उनका बहुत ख्याल रखते थे पर होनी को कौन टाल सकता था। मोहनलाल जी ने बात आगे नहीं बढ़ाई उससे कोई फायदा भी नहीं था। धीरज जी के हम उम्र जितने भी थे उनके रिटायरमेंट के चार वर्ष बीत गए थे और सब सुखी जीवन जी रहे थे। धीरज वर्मा जी को रिटायरमेंट में जब एक वर्ष का समय रह गया था तब उनका दुर्घटना में निधन हो गया था वे स्कूटर से ऑफिस जा रहे थे तभी एक तेज गति से आ रहे ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी ज...

कहानी: बुल्डोजर

आठ साल पहले अपने लड़के  निशिकाँत की जरा सी शराफत से अपने नवनिर्मित मकान को बुल्डोजर से ध्वस्त होते बाबू उमाकान्त जी ने बेबसी के साथ देखा था और  चार  वर्ष उन्होंने घोर आर्थिक तंगी एवं परेशानियों के साथ गुजारे थे ।इसके बाद के चार वर्षों ने उनकी जिंदगी में खुशहाली ला दी थी आज उन्होंने अपनी पोती शशि का जन्मदिन धूमधाम से मनाया था। उमाकांत जी आज भी आठ वर्ष पूर्व घटी  उस घटना को याद कर काँप जाते हैं। उमाकांत जी राजस्व विभाग में बड़े बाबू के पद पर कार्य करते हुए रिटायर हुए थे राजस्व विभाग जैसे कमाऊ विभाग में उन्होंने ईमानदारी के साथ नौकरी की थी  यही कारण था कि उन्होंने किराये के मकान में ही रहते हुए नौकरी की कभी अपना मकान नहीं बनवा सके थे जब रिटायर मेन्ट में छः महीने का समय बाकी था तब उन्होंने नब्बे प्रतिशत जी पी एफ निकालकर  एक आवासीय भूखंड खरीदा था उसमें उनकी बचत भी लग गई थी। रिटायर भेन्ट पर जो कम्युटेशन ग्रेच्युटी का पैसा मिला उससे उन्होंने उस प्लॉट पर मकान बनवाया था प्लॉट उमाकान्त जी ने अपने बेटे निशिकान्त के नाम खरीदा था  उमाकन्त जी को उस मकान में रहते हुए...

कहानी: गरीब विधवा की बेटी की शादी

रोशनी की शादी हुए आठ वर्ष हो गए इन आठ वर्षों में उसने और उसके पति चैनसिंह ने घोर परिश्रम कर के अपने आपको गरीबी के दलदल से निकाल लिया था अब उनके पास खुद का बड़ा मकान था चार  पहिया वाहन था और घर में सुख सुविधा के सभी साधन मौजूद थे। जब रोशनी की शादी हुई तब उसके पिता नबीलाल के निधन हुए पाँच वर्ष हो गए थे उस समय रोशनी कक्षा 6 में पढ़ रही थी उसके पिता नबीलाल जो मजदूर थे काम करते समय चौथी मंजिल से गिर गए थे जिससे उनका निधन हो गया था उनके निधन के बाद रोशनी की माँ सुखिया पर घर की सारी जिम्मेदारी आ गई थी रोशनी का भाई रवी अभी मात्र छः महीने का था जब सुखिया मजदूरी पर जाती तो रोशनी घर में रहकर  भैया की देखभाल करती इससे उसका स्कूल छूट गया वो छठी से आगे पढ ही  नहीं सकी थी  जब भैया तीन साल का हो गया और नर्सरी में उसका एडमीशन हो गया तब रोशनी भी माँ के साथ मजदूरी पर जाने लगी थी रोशनी जवान हो गई थी सुखिया को उसकी शादी की चिंता लगी रहती थी घर की हालत खराब थी शादी के लिए उनके पास रुपये भी नहीं थे ऐसे में रोशनी ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया  रोशनी को कम उम्र में ही यह पता चल गया था...

कहानी: निलंबन

बीस पूर्व जिन प्रशासनिक अधिकारी संतोष श्रीवास्तव ने रोहित चौहान को निलंबित किया था वे आज नगर निगम के महापौर थे और निलंबित करने वाले श्रीवास्तव जी  निगम के उपायुक्त थे इसे विडंबना कहें या संयोग कि कभी अदना से कर्मचारी के निर्देशों आदेशों का पालन श्रीवास्तवजी को  करना पड़ रहा था दूसरी और रोहित चौहान कई बार यह कह चुके कि अगर श्रीवास्तव जी मुझे उस समय निलंबित नहीं करते तो आज मैं इस ऊँचाई पर कभी नहीं पहुँचता आज जब चौहान जी ने इस बात का एक बैठक में जिक्र किया तो श्रीवास्व जी विनम्रता से बोले माननीय वो मेरी सबसे बड़ी भूल थी आपकी कोई गलती नहीं थी इसका मुझे उम्र भर पछतावा रहेगा आप जब इसका जिक्र करते हैं तो मैं आत्म ग्लानि से भर जाता हूँ। इस पर चौहान जी बोले आपने तो अपनी डयूटी की थी चूक यह हुई कि आप स्थिति को ठीक से समझ नहीं पाए श्रीवास्तव जी बोले इसी बात का तो अफसोस है। चौहान जी अपने बँग्ले पर आकर पुरानी यादें ताजा करने लगे थे उन्हें  बीस वर्ष पूर्व का वो वाकया याद आ गया था जब  वे शासकीय माध्यमिक शाला गवाखेड़ी में शिक्षक थे रोड किनारे का गाँव था  उस दिन प्रधानाध्यापक हरि...

कहानी: सादगी

राधेलाल जी के पुत्र संदीप जिसने एम बी ए किया था। कि  शादी हुए पाँच वर्ष बीत गए थे संदीप की अपनी कंपनी थी जिसके कारण उसकी धनवानों में गिनती होती थी संदीप की पत्नी सुरेखा  कंपनी की सेक्रेटरी का कार्य करती थी तथा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर  में भी शामिल थी।राधेलाल जी ने संदीप की शादी अत्यंत सादगी से की थी तथा जो  रुपये बचे थे उससे तथा और पास की पूँजी मिलाकर ये कंपनी खोली थी जिसने पाँच सालों में उन्हें धन कुबेर बना दिया था आज संदीप ने अपनी बेटी ऋचा का तीसरा जन्म दिन भी सादगी से मनाया था इस अवसर पर चैरिटी अस्पताल को दस लाख के चिकित्सा उपकरण दान किए थे। जन्मदिन के समारोह में फिजूल खर्ची करते तो इससे अधिक रुपये खर्च करने के बाद भी कोई न कोई कमी रह ही जाती। जब संदीप ने एम बी ए किया था तभी उसका एक कंपनी में प्लेसमेंट हो गया था अठारह लाख रुपय सलाना पर दो साल संदीप को उस कंपनी में कार्य करते हो गए थे इस दौरान उसने अच्छी तरह जान लिया था कि कंपनी जितना उन्हें वेतन देती है उससे कई गुना खुद का लाभ उठाती है। राधेलाल जी भी सेवानिवृत हो गए थे और वे संदीप की शादी धूमधाम से ...

कहानी: बाल बाल बचे

पैंतीस साल पहले हिन्दी में प्रथम श्रेणी में एम  ए तथा अंग्रेजी में एम ए की यीग्यता प्राप्त शिक्षक अशोक कुमार के तिरतालीस साल की सेवा करने के बाद आज जारी  प्रमोशन लिस्ट में  नाम नहीं आने पर वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे ।क्योंकि उनके रिटा मेट में सिर्फ छॆ माह का समय बचा था और इस बीच उन्हें बहुत से काम करना था। आज जारी लिस्ट में वे बाल बाल बच गए थे फरवरी चौदह तक के यू डी टी  तो व्याख्याता बन गए थे और वे  सितंबर के थे इसलिए उनका नाम नहीं आया था दोनों ही लिस्ट में ऐसा हुआ था उन्हें ऐसा लगा जैसे ईश्वर ने उन पर सबसे बड़ी कृपा कर दी हो । लिस्ट जारी होने के बाद उनके साथी जो एक ही साथ शिक्षक बने थे उमेश जी मिले वे मुँह लटकाए हुए थे उनका नाम सूची में था  उनके रिटायर होने में भी तीन माह का समय बाकी था। वे दुखी थे कह रहे थे कल काउन्सलिंग है उसमें जाना पड़ेगा लिस्ट में सबसे नीचे हमारा नाम है इसलिए कम से कम चार सौ किलोमीटर से पास की कोई जगह तो मिलने वाली नहीं है प्रमोशन छोड़ने का मन नहीं कर रहा ऐसा लग रहा है कि रिटायर होने के बाद लोगों से यह तो कह सकेंगे कि हम सेवानिवृ...

कहानी: पानी पिला कर दिल जीता

सुरेश गुप्ता की आज जिला समन्वयक के पद पर नियुक्ति हो गई थी। उन्हें बधाई देने वालों का ताँता लगा हुआ था इसके पहले वे ब्लॉक समन्वयक थे। जब डी पीसी मनोज शुक्ला रिटायर हुए तब सुरेश गुप्ता जी को जिला समन्वयक बना दिया गया था एक छोटे से झालकी के छोटे से दुकानदार राधेलाल के बेटे सुरेश गुप्ता जी की ये तरक्की काबिले तारीफ थी। सुरेश गुप्ता जी ने उन्नीस सौ छियानवे में गुरूजी के पद से नौकरी की शुरुआत की थी उन्हें कुल एक हजार रुपये तनख्वाह मिलती थी। उनको जिले के आखिरी छोर के गाँव दर खेड़ा के  प्राथमिक स्कूल में भेजा गया था पाँच साल वे गुमनामी में रहे शहर से उनका कोई संपर्क ही नहीं था वे ऐसा क्षेत्रीय विधायक शंकर सिंह के निर्देश के अनुसार कर रहे थे शंकर सिंह जी ने सतीश गुप्ता के पिताजी की जल सेवा से संतुष्ट होकर उसके बदले में उन्होंने सतीश जी को ई जी एस का गुरुजी बनवा दिया था। असल में क्षेत्रीय विधायक शंकर सिंह जी जब भी झालकी आते थे तब सतीश जी के पिताजी उनसे अपनेपन से मिलते थे तथा पीने के लिए वे  ठंडा प...

कहानी: सर्वे

सरकारी माध्यमिक शाला के शाला प्रभारी आज बहुत उदास थे अपनी बयालीस साल की नौकरी में  इतना अपमान और प्रताड़ना आज पहली बार उन्होंने सहन की थी  पिछले पन्द्रह दिनों से वे रोज सुब्ह छः बजे घर से निकल रहे थे और रात को आठ से नौ बजे के बीच घर पहौँचते उनकी पत्नी शीला वैसे ही उनसे चिढ़ी रहती थी उनकी शराफत को वह उनकी मूर्खता समझती थी और इस बात पर अपने माता पिता को कोसती  की मेरे पिता ने राजस्व विभाग को बाबू को छोड़कर एक शरीफ स्कूल के शिक्षक के शादी कर के मेरी किस्मत फोड़ दी। इसलिए सतीश जी और उनके बीच बहुत कम बातचीत होती थी आज दुखी थे इसलिए उनका खाना खाने का मन भी नहीं हुआ शीला  तो  आराम करने चली गई थी रोज की तरह खाना सतीश जी को ही निकालकर खाना था पर उनका मन नहीं हुआ तो उनके हिस्से का खाना वैसा ही रखा रह गया।  सतीश जी के रिटायर होने में छः महीने बचे थे इसलिए वे सँभलकर नौकरी कर रहे थे स्टॉफ उनको सहयोग नहीं दे रहा था। तब भी वे अपने दिन जैसे तैसे काट रहे थे। जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने निर्देश दिए थे कि उन्हें ग्राम के निरक्षरों का सर्वे करना है उसके अंतिम तीन दिन ब...

कहानी: एक और जन नेता का खत्म होना

निर्दलीय  होकर नगर निगम के महापौर का चुनाव लड़ने वाले  वीरेन्द्र जी  जब चुनाव भारी बहुमतों से जीते थे तब उनकी छवि साफ सुथरे ईमानदार जन नेता की थी पर महापौर बनने के बाद वे अपना जनाधार खो चुके थे किराये के मकान में रहने वाले आज आलीशान कोठी के मालिक थे करोड़ों रुपये की संपत्ति उनके पास थी उनके सारे करीबी रिश्तेदार जो कभी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते थे वे आज शहर के धनी मानी लोगों में गिने जाते अब वीरेन्द्र जी शहर के वी आई पी तो थे पर जननेता नहीं। वीरेन्द्र जी जब महापौर का चुनाव लड़े थे तब वे एक जुझारू नेता थे और जो उस समय महापौर थे जिनका नाम लीलाधर था वो नंबर वन के भ्रष्ट इंसान थे  जनता उन्हें बिल्कुल नहीं चाहती थी वीरेन्द्र तब अपनी हर सभा में कहते रहते थे कि मैं अगर महापौर बन गया तो  लीलाधर जेल में होंगे उनके द्वारा किए भ्रष्टाचार की जाँच कराई जाएगी लीलाधर के खास जो नगर निगम के अधिकारी थे उनको वीरेन्द्र जेल भिजवाने की बात कहते थे। जनता वीरेन्द्र जी पर बहुत भरोसा करती थी जब वीरेन्द्र जी चुनाव लड़े तब उनके पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी जनता ने चंदा देकर उ...

कहानी: अधिकारी की ये कैसी सख्ती

जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी वानखेड़े अपनी सख्ती के लिए विख्यात थे वे कईयों को सस्पेण्ड कर चुके थे कई कर्मचारियों की वेतनवृद्धियाँ उन्होंने रोक दी थीं। वे बुरी तरह डाँटते थे अधीनस्थों को अपमानित करने म उन्हें बड़ा मजा आता था वही सर एक माध्यमिक शाला के शाला प्रभारी देवीसिंह जी के सामने आज नत मस्तक हो रहे थे। दो दिन पहले उन्हें उन्होंने सस्पेणाड करने की धमकी दी थी एक दिन का वेतन काटने के निर्देश भी दिए थे तथा सबके सामने डाँटा था। वही वानखेडे जी आज सर जी गुरूजी चरण स्पर्श जैसी बात उनसे कर रहे थे उनके सामने विनम्रता की मूर्ति बने हुए थे। कह रहे थे सर जी मेरे होते हुए आपको कभी कोई परेशानी नहीं आएगी आप निश्चिंत रहिए। देवीसिंह वानखेड़े जी के बदले हुए व्यवहार से थोड़े चकित थे पर इसका कारण उन्हें मालूम थे लेकिन उसके दो दिन पहले जो घटना घटी वो इस प्रकार है। हुआ यह कि उस दिन देवीहिंह जी के स्कूल में पाठ्यपुस्तक आने वाली थीं संकुल प्राचार्य के सख्त निर्देश थे कि जब पुस्तक लेकर ट्रक आए तब शाला प्रभारी उसे रिसीव करने लिए उपस्थित रहें नहीं तो उनके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी ट्रक सुब्ह नौ बजे...

कहानी: करोड़पति पिता की कंगाल औलाद

मंशाराम सत्तर वर्ष की आयु में घोर गरीबी में अपना जीवन यापन कर रहे थे। हालात ये थे कि बस्ती के घरों से उनके लिए टिफिन में खाना आता था जबकि उनके पिता सेठ धनीराम रतन गढ़ कस्बे के नगर सेठ माने जाते थे उनके पास अकूत धन संपत्ति थी जब वे दुनिया छोड़कर गए तब खूब दौलत अपने बेटे मंशाराम को सौंपकर गए थे। वो दौलत कई पीढ़ियों तक खत्म नहीं होने वाली थी जिसे मंशाराम ने दस वर्षों में पूरी तरह चौपट कर दिया और अब खाने के वावे पड़े हुए थे आज टिफिन जरा देर से आया था मंशाराम का भूख से बुरा हाल हो गया था पर वे देर से टिफिन लाने वाले को कुछ भी नहीं कह सकते थे क्यूंकि वे सब उनकी मुफ्त सेवा कर रहे थे। मंशाराम को अच्छी तरह याद है पचपन वर्ष पहले का वो समय जब उनकी हवेली रतनगढ़ की सबसे बड़ी और पक्की हवेली थी। उनके पास चार सौ एकड़ जमीन थी दो दर्जन यात्री बसे थीं। बहुत सारे मकान थे जो किराये पर दिए हुए थे। उस समय मंशाराम के भी बड़े जलवे थे सब उन्हें छोटे सरकार कहते थे वो भी अपने आपको किसी से कम नहीं समझते थे लेकिन जब बीस वर्ष की आयु होने के बाद भी मंशाराम हायर सेकेण्डरी पास नहीं कर पाए थे तो उनके पिता सेठ धनीराम...

कहानी: कलह या नर्क

रोहित को पैंतीस साल के वैवाहिक जीवन के बाद घर छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा था जिसका सबसे बड़ा कारण उनकी पतनी  चपला थी वह कलह प्रिय थी जबकि रोहित धीर गँभीर और शाँत प्रवृत्ति के इंसान थे यही कारण था कि उन्होंने पूरे पैंतीस वर्ष तक अपनी कलहप्रिय पत्नी के साथ रहकर नर्क से भी बदतर जिंदगी गुजारी थी। पिछले पाँच सालों से वे हरिद्वार में रह रहे थे पूजन सामग्री की बिक्री से वे अपना खर्च चला रहे थे अकेले रहकर वो अपने आपको ज्यादा खुश मानते थे। पैंतीस वर्ष पूर्व जब उनकी चपला से शादी  हुई थी तो वह उसकी सुंदरता देखकर आकर्षित हो गए थे तब उन्हें इसका अहसास नहीं था कि इस सुंदरता के पीछे एक क्रूरता छिपी हुई है चपला एक ईर्षालु महिला थी उसे अपनी थाली के रसगुल्ला देखकर खुशी नहीं होती थी  बल्कि  दूसरे की थाली के बैंगन देखकर  जलन होती थी । और इसकी कसर वो रोहित से निकालती थी पैंतीस सालों में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा था जिसमें चपला ने उससे कलह न की हो रोहित जब शाम को घर की ओर आते तो काँप जाते थे घर उनके लिए सुकून की जगह नहीं थी बल्कि ये वो जगह थी जहाँ वे हर दम झुलसते रहते थे। इसी बीच उनके एक...

कहानी: बचपन के दोस्त बुढ़ापे का सहारा

राजमल जी की अपने बचपन के मित्र हरीश से हरिद्वार  में अचानक  भेंट  पाँच साल पहले हुई थी ।वे पूरे पैंतालीस  साल बाद एक दूसरे से मिल रहे थे । तबसे वे दोनों एक ही घर में रह रहे  थे और एक दूसे के बुढ़ापे का सहारा बने हुए थे दोनों की उम्र इस समय पिचहत्तर वर्ष की थी। आज शाम को जब दोनों मित्र साथ बैठकर बात कर रहे थे राजमल बोले  याद है हरीश पाँच साल पहले आज के दिन हम हरिद्वार में मिले थे हरीश बोले अच्छी तरह याद है  और यह भी याद है कि अगर उस समय तुमने मुझे सहारा न दिया होता तो मैं दर दर का भिखारी होकर रह जाता। राजमल ने कहा  ऐसा हुआ नहीं न ये बड़ी बात है। हरीश बोले जब हम एक साथ पढ़ते थे तब तुम कहते मैं तो सरकारी नौकरी करूँगा और मैं सरकारी नौकरी के खिलाफ था फिर तुम्हारी सरकारी नौकरी लग गई और तम मथुरा चले गए  मैंने इन्दौर में रहकर ही व्यापार शुरू कर दिया। फिर हम तीन साल बाद मिले थे तब मैंने तुमसे पूछा था  कितनी तनख्वाह मिलती है तुम्हें तब तुमने बताया था  आठ सौ रुपये तब मैंने कहा था  मैं व्यापार में बारह हजार रुपये तक एक महीने में शुद्ध मुना...

कहानी: कर्जदार

लगातार पचास लाख का कर्ज सिर पर चढ़ जाने से परेशान  तथा अपनी पाँच एकड़ जमीन कर्ज में गँवा चुके किसान किशनलाल को रत्नपुर गाँव से पलायन किए हुए पूरे आठ साल हो जए थे।उसका किसी को अता पता नहीं चला था। तीन साल फसल बर्बाद होने के  कारण  किशनलाल के ऊपर   साहूकार लालाराम का बीस लाख रूपये का कर्ज था जबकि उसने तीन साल पहले तीन लाख रुपये कर्ज लिया था जो  पाँच प्रतिशत मासिक ब्याज के कारण  बढ़ते बढ़ते बीस लाख  रुपये हो गए थे लालाराम  की किराने की दुकान से   उधार लिए गए सामान का कर्ज पाँच लाख रुपये था जिसपर लाला राम  ने किशनलाल की पाँच एकड़ जमीन हथिया ली। थी इसके बाद भी उसके ऊपर पचास लाख का कर्ज  और बाकी था।जो उसने समय समय पर और लोगों से लिया था  किशनलाल के पास और कोई चारा नहीं था या तो पलायन करे या आत्महत्या किशनलाल ने पलायन का निर्णय लिया और रातोंरात परिवार सहित गाँव से पलायन कर गया था।  किशन लाल ने मध्यप्रदेश  से दूर बंगाल के सुदूर क्षेत्र में बसे गाँव  बलराम पुर  को अपना निवास बना लिया था सरकारी जगह पर झुग्गी बनाक...