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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य : कोई चहेता कोई उपेक्षित

वेसे तो कायदे की बात यह है कि माता पिता को अपनी सभी संतानों से एक सा बर्ताव करना चाहिए उनमें से किसी को कम नहीं समझना चाहिए सबको समान लाड़ प्यार देना चाहिए। परंतु अक्सर ऐसा होता नहीं है कोई संतान तो माता पिता की चहेती होती है और कोई उपेक्षा की शिकार। जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता फिर भी ऐसा होता है और ऐसा कोई सौतेला नहीं करता बल्कि सगे माँ बाप ही ऐसा करते हैं जिसकी किसी से शिकायत भी नहीं की जा सकती । जैसे किसी के तीन बच्चे हैं जिसमें दो बेटे और एक बेटी बेटी तो पिता की लाड़ली है और एक बेटा माँ का लाड़ला और जो सीधा सरल सबसे सज्जन बेटा है वो दोनों की उपेक्षा का शिकार है। जबकि उसका जब जन्म हुआ तब पूरा घर ख़शियों से भर गया था लेकिन दूसरे बेटे के जन्म के बाद उसे पूरी तरह उपैक्षित कर दिया गया उसे प्रताड़ना भी दी जाने लगी और जो चपल चालाक स्वार्थी है वो माँ का लाड़ला बन गया। जो माँ बाप की उपेक्षा के शिकार होते हैं वे बाहर बड़े लोकप्रिय होते हैं । और,अपने जीवन में सफल भी होते हुए देखे गए हैं। कुछ इसी तरह का हाल रवि का भी हुआ उसके अपने ही भाई मोहित ने उसका हक छीन लिया वो माँ बाप का लाड़ला थ...

व्यंग्य : अंत भला सो भला

जो जीवन में कोई कष्ट उठाना नहीं चाहते न ही संघर्ष करना उन्हें अच्छा लगता है वे जैसे तैसे अपनी जिंदगी बसर करते हैं । इसके विपरीत जो साहसी होते हैं जिनकी कुछ बड़ा करने की इच्छा होती है । जो परिश्रम करने से नहीं घबराते वे हर हाल में अपना लक्ष्य हासिल करने में जुटे रहते हैं। और अंत में वे सफल हो ही जाते हैं इसके बाद वे सफल होकर अपना जीवन गुजारते हैं इसिलिए कहा गया है कि अंत भला सो सब भला। संघर्ष हर क्षेत्र में करना जरूरी होता है जो सफलता एक अण में मिल जाती है उसके पीछे कई वर्षों का संघर्ष होता है। बहुत से लोग ऊँचे लक्ष्य को पाना चाहते हैं शुरू में इसको पाने वालों की भीड़ लगी रहती है जो समय बीतने के बाद छँटती चली जाती है । आखिरी में कोई अकेला ही बचता है जो हर,आँधी तूफान का सामना करते हुए अविचला रहता है ।सफलता उसके ही कदम चूमती है। तखत पुर गाँव का नीरज अपने कठोर परिश्रम और लगन के कारण आज एस डी एम के पद पर कार्यरत था। उसके ऑफिस में चपरासी की जगह खाली थी। उसके लिए आवेदन आए थे। आवेदकों में उसे एक चेहरा जाना पहचाना लगा वो उसके गाँव के सबसे संपन्न व्यक्ति का सबसे छोटा लड़का सोम प्रकाश ...

व्यंग्य : अपनों का दंश

अधिकाँश लोगों का यह अनुभव है कि जो जहर अपनों के दिए दंश में होता है उतना हज़ारों बिच्छुओं में भी नहीं होता यह जहर इंसान को मारता नहीं है बल्कि जिंदगी भर तड़फाता है इसकी पीर कभी भी कम नहीं होती है। कुछ, लोग अपनों का शोषण करते हैं उसके हकों को छीन कर खा जाते हैं। उसे कई तरह से परेशान करते हैं उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं और उसे उस वक्त छोड़ देते हैं जिस वक्त उसे इनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। राजेश की उम्र चौदह साल की रही होगी तब उसका भाई रोहित एक व्र्ष का था तब उसके माता पिता की सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मृत्यु हो गई थी उससे छोटी दो बहन और थीं। राजेश ने आठवीं पास की ही थी और वो नौवी में एडमीशन की तैयारी कर रहा था। पर उसके ऊपर,मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। अंत्येष्टि में बहुत लोग शामिल हुए सब उसके सिर पर हाथ फेरकर यह कहकर गए की हम माँ बाप की कमी का अहसास नहीं होने देंगे। लेकिन तेरहवीं के बाद किसी ने मुड़कर भी नहीं देखा राजेश ने पढ़ाई छोड़कर ढाबे पर काम करना शुरू किया और अपने बहन भाईयों की परवरिश करने लगा जब भाई स्कूल जाने लायक हुआ। तब उसको एस डी एम साहब ने कं टजेन्सी ...

व्यंग्य : गढ़ा धन

धन कमाने की अंधी दौड़ ने इंसान का पूरी तरह से नैतिक पतन कर दिया है। धन और पद को पाने के लिए लोग किसी भी हद से गुजरने में जरा भी संकोच नहीं करते इसका फायदा वे लोग उठाते हैं जो खुद को बड़ा तांत्रिक होने का दावा करते हैं ये ऐसे धन लोलुप व्यक्ति से संपर्क करते हैं। फिर उस पर अपना प्रभाव जमाते हैं इसके बाद कहते हैं कि मैं रातों रात तुम्हें संसार का सबसे अधिक धनवान व्यक्ति बना सकता हूँ । और फिर किसी खंडहर के पास ले जाकर कहेंगे कि यहाँ इतना खजाना दबा है कि सोने चाँदी हीरे जवाहरत से कई ट्रक भर जाएँ । और फिर पूजा अनुष्ठान के नाम पर वो कथित तात्रिक धन हडपना शुरू कर देता है। जब तक उसे होश आता है तब तक वो बर्बाद हो चुका होता है और यह फिर किसी दूसरे शिकार को पकड़ लेते हैं इस तरह उनकी दुकानदारी चलती रहती है। और लुटा पिटा व्यक्ति कई वर्षों तक सम्हल नहीं पाता।   अनिल और सुनील दोनों बचपन के दोस्त थे अनिल कर्मठ था और सुनील भाग्यवादी अनिल अपनी कर्मठता और जुझारूपन तथा कठोर,परिश्रम से धनवान हो गया और सुनील गढ़े धन को पाने के फेर में कथित तांत्रिकों के फेर,में पड़ गया जिसमें उसकी जमा पूँजी स...

व्यंग्य : भूलने की कला

कुछ समय पहले तक भूलने को बीमारी माना जाता था बीमारी तो यह आज भी है मगर अब भूलना एक कला भी हो गई है। जिसके काम नहीं करना हो या टालना हो तब इस कला का उपयोग किया जाता है । और तब तक इसका उपयोग करना होता है जब तक कुछ भेंट पूजा नहीं हो जाए। शिक्षक रामदास जी की बेटी की शादी थी उन्हें दस लाख रुपये जीपी एफ से निकालने थे। उन्होंने संबंधित बाबू से संपर्क किया तो वे बोले आप प्रकरण प्रस्तुत करें तीन दिन में आपका पैसा निकलवा दूँगा। रामदास जी ने तुरंत, प्रकरण प्रस्तुत कर दिया लेन देन की भी बात हो गई । रामदास जी ने विचार किया कि जब पैसे निकल जाएँगे तब इनको भी कुछ भेंट कर देंगे। यही सोच उनकी गलत थी जिसके कारण पूरे एक महीने तक उन्हे पैसा नहीं मिला बेटी की शादी सिर पर आ गई थी और बाबूजी उनकी फाइल रखकर भूल गए थे। रामदास जी ने कहा दुबारा प्रकरण प्रस्तुत कर दूँ तब बाबूजी ने कहा नहीं उस पर साहब की टीप लगी है। साहब ने बिल पास कर दिया उसकी नोटशीट भी लगी है। तब उनके साथी गौतम सर ने कहा आपने इनकी भेंट पूजा की क्या वे बोले नहीं तो फाइल कैसे मिलीगो। तब रामदास जी ने दस हजार रुपये बाबूजी को अर्पण किए तभी च...

व्यंग्य : मन के गुलाम

वैसे तो सबके लिए अवसरों की समानता है। फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो उपलब्ध अवसरों का लाभ उठा लेते हैं। जिसका लाभ उन्हें जीवन भर मिलता रहता है। और कुछ लोग अवसरों को गँवा देते हैं जिसका पछतावा उन्हैं जिंदगी भर रहता है।अवसर का लाभ वे इसलिए भी नहीं उठा पाते क्योंकि वे मन के गुलाम होते हैं। व्यक्ति जब किसी कार्य की शुरूआत करता है तो इसके पहले उसके मन में विचार उठते हैं । कुछ विचार ऐसे हैं जो आते हैं और बिना कुछ प्रभाव जोड़े चले भी जाते हैं इनकी संख्या सैंकड़ों में हो सकती है। लेकिन कुछ विचार बार बार आते हैं जिनमें तीव्रता होती है। जिनसे विवश होकर व्यक्ति विचार के अनुरूप काम करना शुरू करता है योजना बनाता है लोगों से मिलता है। साधन सुविधा जुटाता है। और कार्य प्रारम्भ करता है तथा सफलता प्राप्त कर जीवन भर इसका लाभ उठाता है।  दिनेश और,राकेश ने एक साथ बी कॉम किया था तब वे बिजनेसमेन बनने के सपने देखा करते थे। दोनों के पिता नौकरी करते थे। पास होने के बाद उनके सामने बेरोजगारी की समस्या थी। दिनेश ने पिता के कहने पर एक प्राइवेट सकूल में नौकरी कर ली थी।मगर राकेश व्यापार करना चाहता था उसके पिताजी...

व्यंग्य: आम आदमी का गणतंत्र दिवस

आम आदमी का देश भक्ति का जज्बा हमारे देश के गणतंत्र के सशक्त होने का परिचायक है । आम आदमी जब गणतंत्र,दिवस समारोह मनाता है तो इसकी उसे कोई छुट्टी नहीं मिलती इसके लिए उसकी एक दिन की दिहाड़ी का नुक्सान होता है। इसके बाद भी अगर वो समारोह मनाता है तो उसके इस जज्बे को सलाम । । गणतंत्र दिवस समारोह में,आम आदममी की भागीदारी बढ़ती जा रही है । इसे देखकर हर देश भक्त खुशी से भर जाता है। गणतंत्र दिवस पर नगर की पिछड़ी बस्ती विकास नगर के लोगों ने आपस में तय कर लिया था कि इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह उत्साह से मनाएँगे। वहाँ के रहवासी ठेकेदार के यहाँ मजदूरी करते थे सबने उस दिन दिहाढ़ी पर जाने से इंकार कर दिया था यह जानकर ठेकेदार गुस्से से लाल पीला हो रहा था। उसका कहना था कि समारोह तो सुब्ह होना है। उसके लिए दिहाड़ी पर नहीं आना ठीक नहीं है। उसके सारे प्रयास विफल हो गए थे सभी ने एक दिन की दिहाड़ी छोड़कर गणतंत्र दिवस हर्ष उल्लास के साथ मनाया था। उनके कार्यक्रम में अचानक विधायक जी भी शामिल हो गए थे। जब उन्हें यह बात मालूम हुई तो उन्होंने बिल्डर को फोन लगाकर छुट्टी की दिहाड़ी देने पर जोर दिया जिस...

व्यंग्य: सुख की चाह में

सुख की चाह किसे नहीं होती ।हर आदमी दुख से उबरकर सुख पाना चाहता है। सुख की इस चाह के कारण  ही साधन और सुविधाओं का विकास हुआ है। इसके बाद भी आज का आदमी सुखी क्यों नहीं निरोगी क्यों नहीं है। यह सोचने वाली बात है आज का परेशान हाल आदमी जब पुराने जमाने की बातें लोगों से सुनता है तो उसे बहुत हैरत होती है । पहले इंसान सीमित साधन होते  हुए भी  बेहद सुखी और संतुषट था   जबकि आज इंसान के पास सुविधाओं के साधनों की भरमार है। लेकिन  आज का इंसान  फिर भी सुखी नहीं न ही खुश हे।  इतने साधन होने के बाद भी उसके पास सुख की कमी है। रात में उसे नींद नहीं आती और दिन में खुद बैचैन रहता है।  उसके दुख में हिस्सा बँटाने वाला कोई नसीं रहता। सुभाष की पढ़ाई लिखाई परवरिश  छोटे से कस्बे  में हुई थी । जहाँ सब लोग एक दूसरे को अच्छी  तरह  से जानते थे दूसरे के सुख दुख में काम आते थे। तथा मदद भी करते थे। वही सुभाष  की नौकरी शहर में लगी थी और वो यहाँ आ गया था। एक रात उसके घर चोर घुसे  कॉलोनी भरी हुई थी सुभाष ने  मदद की जोर जोर से गुहा लगाई वेकिन क...

व्यंग्य: आत्ममुग्धता

आपको ऐसे बहुत से लोग मिल जाएगे जो आत्म मुग्धता से परिपूर्ण रहेंगे ये अपनी प्रशंसा अपने ही मुँह से करेंगे याकि अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनेंगे। अपने सामने ये किसी ओर की प्रशंसा सहन नहीं कर सकेंगे इनकी कोई कितनी भी तारीफ करेगा तब भी इनका मन नहीं भरने वाला ऐसे लोग हद दर्जे के अहंकारी होते हैं। आत्ममुग्ध लोग मीन मेख निकाले बिना रह ही नहीं सकते यह अपने आसपास चापलूस लोगों को देखना पसंद करेःगे जो इनकी खूब चापलूसी करे और इनकी प्रशंसा करे। यह किसी से बात भी करेंगे तो उसे बोलने का मौका ही नहीं देंगे अपनी सारी भड़ास निकालने के बाद उसे बोलने का अवसर दिए बिना ही निकल जाएँगे। खुशामदी लोग इनसे खूब लाभ उठाएँगे। इनको किसी का काम पसंद नहीं आएगा चाहे वो इनके काम से कई गुना बेहतर ही क्यों न रहा हो।इनको तो परिस्थतियाँ ही सुधार सकती हैं। जब यह किसी संकट में घिर जाएँ तो इनकी दशा बड़ी दयनीय हो जाती खुद को मजबूत बतेने के फेर में वे किसी को अपनी कमजोरी कभी नहीं बताते। इसका उन्हे भारी से भारी खामियाजा ही क्यों न उठाना पड़े। सरिता अपने इकलौते बेटे आशीष की खूब तारीफ करती थी उसकी बुराई सुनना जरा भी पसंद नहीं ...

व्यंग्य: अपने काम से मतलब रखने वाले

कुछ खुद्दार टाइप के इंसान किसी की न ख़ुशामद करते हैं न कामचोरी ये सिर्फ अपने काम से मतलब रखते हैं अपना काम ईमानदारी से करते हैं। कार्य कुशल होते हैं और कभी अपने स्वाभिमान पर आँच नहीं आने देते । इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हद दर्जे के काइयाँ मक्कार तथा चालाक होते हैं ये ऐन केन प्रकारण अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं इन्हें मतलब के लिए किसी की चापलूसी करने में जरा भी संकोच नहीं होता । मौका आने पर यह किसी के तलवे भी चाट सकते हैं ऐसे लोग श्रेय लूटने में सबसे आगे रहते हैं और काम करने में सबसे पीछे। बिडंबना है कि ऐसे लोग आजकल महत्वपूर्ण माने जाते हैं अपने आका के चहेते होते हैं अनुचित साधनों से खूब धन कमाते भी हैं तथा खिलाते भी है। रस्तोगी साहब ऐसे ही खुद्दार टाइप के इंसान थे उनकी फील्ड में जॉब थी वे अपना काम अच्छे से करते थे जनता के तो वे चहेते थे पर अधिकारी उनसे खुश नहीं थे। एक बार स्थानीय मेले भें उनकी ड्यूटी लगी थी मेले में बड़े साहब ने अपने सहायक अधिकारी की भी ड्युटी लगाई थी। रस्तोगी साहब सारा काम उनके अधीनस्थ रहकर कर रहे थे । वो तो पूरे दिन कैम्प से बाहर ही नहीं निकले सारा ...

व्यंग्य : ढुलमुल लोग

जो अपनी बात पर कायम नहीं रहते जो किसी के बहकावे में जल्दी आ जाते हैं ऐसे ढुलमुल लोग भरोसे के काबिल नहीं रहते इनकी कभी किसी से गहरी दोस्ती नहीं होती न इनकी दोस्ती स्थाई रहती कोई इनके हितैषी के खिलाफ़ भी इनके कान भर दे तो यह उस हितैषी को भी अपना दुश्मन समझने लगते हैं। ऐसे लोग हमेशा आपको परेशान हाल दिखेंगे ये चिड़चिड़े स्वभाव को होंगे तथा किसी को भी बेइज्जत करने में जरा भी नहीं हिचकिचाएँगे। दिनेश जी को हम ऐसी श्रेणी में रख सकते हैं। उन्होंने जो दस साल पहले मकान बनवाया था उसमें बीस बार तोड़फोड़ करवा चुके हैं फिर भी वे संतुष्ट नहीं है कोई यदि उनसे कह दे यह दीवाल यहाँ हटा से दो इसके कारण घर में परेशानियाँ आ रही हैं तो वे मान जाएँगः। और नुक्सान उठाकर वो दीवाल गिरा भी देंगे लेचिन फिर भी उनकी परेशानियेँ दूर नहीं होंगी तो अंधविश्वास के दल दल में फँसकर%अपना समय और धन बर्बाद करते रहेंगे।लेकिन खुद में कभी सुधार नहीं लाएँगे।हैरत की बात तो यह है कि इतनी ठोकरे खाने के बाद भी उन्होंने आज तक संभलकर चलना नहीं सीखा है। इनका ढुलमुल रवैया इन्हें किसी निर्णय पर भी स्थिर नहीं रहने देता। जिसका सबसे...

व्यंग्य : छिपे दुश्मन

आज के इस दौर में दोहरी मानसिकता वाले लोगों की संख्या ज्यादा होने के कारण खुलकर दुश्मनी करने वालों की संख्या बहुत कम है। छिपकर दुश्मनी करने वाले बहुत मिल जाएँगे जोशम हमारी असावधानी का लाभ उठाकर घात करने में ज़रा भी नहीं हिचकेंगे। इस तरह छिपकर दुश्मनी करने वालों में हमारे खास अपने भी हो सकतः हैं जिनके विषय में हम सपने में भी अनुमान नहीं लगा सकते की हमारे सबसे बड़े दुश्मन तो यही है। राम निवास का एक दोस्त था मुकेश राम निवास उसे सच्चा दोस्त मानता था और वो उसे अपने मन की सारी बातें बता देता था। जबकि मुकेश उसकी उन्नति से जलन रखता था तथा उससे दुश्मनी को छिपाकर रखता था। रामनिवास की बातें सुनकर वो जल भुनकर राख हो जाता था । रामनिवास का एक सगा भाई भी था प्रकाश वो भी रामनिवास से दुश्मनी रखता था। रामनिवास एक पार्टी से ट्रेड डील करने वाला था जिसमें उसे लाखों का लाभ होने वाला था। रामनिवास से चूक यह हो गई कि उसने सारी बातें मुकेश को विस्तार से बता दीं। मुकेश राम निवास के भाई से मिला हुआ था। यह बात भाई तक पहुँ च गई भाई ने वो डील कैंसिल करा दी । इस तरह की घटना जब कई बार घटी तब उसने इसके कारण क...

व्यंग्य: दकियानूसी सोच

कभी कभी ऐसा देखने में आता है कि जो पढ़ लिखे लोग हैं उच्च शिक्षित हैं बड़ी नौकरी कर रहे हैं उनकी सोच भी दकिया नूसी है । उनमें से कुछ जातिवादी मानसिकता वाले भी होते हैं इनके विचारों को सुनकर कोफ्त होती है। ऐसे लोग पाखंडियों के जाल में आसानी से फँस जाते हैं जो पूजा और अनुष्ठान के नाम पर अच्छी खासी रकम इनसे ऐंठ लेते हैं। ऐसे ही एक पाख॔डी रितेश सर से मिला बोला दो दिन से कुछ खाया नहीं है दो सौ रुपये दे दो हमें भोजन कराओगे तो मालामाल हो जाओगे । रितेश वैसे तो ऊँची पोस्ट पर थे लेकिन भीतर से पूरी तरह दकियानूसी पाखंडी ने उन्हें पूरी तरह भाँप लिया था। बोला आजकल बड़ी परेशानी में चल रहे हो सारे काम रुके हुए हैं धन की आवक कम है खर्च ज्यादा है कुछ अपनों ने साथ छोड़ दिया है कुछ ने धोखा दे दिया है। जीवन साथी से भी अनबन चल रही है। रितेश जी इतना सुनते ही उस पाख॔डी को अंतर्यामी समझ बैठे। बोले आप तो बड़े पहुँचे हुए हैं इसका कोई उपाय है । वो बोला बीस हजार रुपये खर्च होंगे। मैं हिमालय से एक बूटी लाया हूँ। इसको घर में रखते ही चमत्कार हो जाएगा तुम्हारी सारी समस्या हल हो जाएँगी। रोहित सर राजी हो गए ए टी एम...

व्यंग्य: कहीं की कसर चहीं निकालने वाले

अक्सर ऐसा होता है कि अगर कोई बलवान किफी की अकारण ही सरेआम बेइज्जती करे तो वो हँसकर सहन कर लेगा जवाब में एक भी शब्द नहीं बोलेगा क्योंकि वो अच्छी तरह से जानता है कि उसने अगर ऐसा किया तो यह अच्छा नहीं होगा। पर उसका मूड जरूर खराब हो जाएगा जब तक वो अपनी भड़ास कहीं निकाल नहीं लेगा तब तक उसे चैन नहीं पड़ेगा। रमेश बाबू को ऑफिस में बड़े साहब ने किसी बात पर बुरी तरह डाँट दिया था उन्हें निकम्मा नकारा तक कह दिया था । वे आहत होकर भी चुप थे यस सर जी सर के अलावा कुछ कह नहीं पा रहे थे। लेकिन उनका मूड खराब हो गया था शाम को जब घर%आए तो किसी से सीधे मुँह बात तक नहीं की उनका बेटा नितिन इस बात से अनभिज्ञ था वो अपने स्कूल के रिपोर्ट कार्ड पर उनके हस्ताक्षर लेने के लिए उनके पास आया। रिपोर्ट कार्ड अच्छा था पर उनका मूड खराब उन्हें अपनी भड़ास निकालना थी तो वे उस पर बरस पड़े दो थप्पड़ भी उसे मार दिए नितिन को पापा से ऐसे बर्ताव की सपने में भी उम्मीद नहीं थी। उसके दिल को गहरी ठेस पहुँची थी वो देर तक रोता रहा था उसे चुप कराने वाला कोई नहीं था वो इस बात से दुखी था कि उसके पापा ने कहा था कि वो उनकी गाढ़ी कमाई को ...

व्यंग्य: मतलबी की तारीफ़

मतलबी इंसान अगर किसी की तारीफ कर रहा तो वो तारीफ अक्सर झूठी ही होती है। अगर वो इंसान ऐसी तारीफ करे तो सुनने वाले को सतर्क हो जाना चाहिए। क्योंकि वो आपकी तारीफों के पुल बाँधकर अपना मतलब तो हल कर लेगा लेकिन आपको गहरी परेशानी में डाल देगा। जो अभिमानी लोग होते हैं वे अपनी तारीफ सुनना खूब पसंद करते हैं वैसे तो अपनी तारीफ़ किसे अच्छी नहीं लगती। मगर अभिमानी आदमी तो हमेशा अपनी तारीफ सुनना ही पसंद करते हैं। ऐसः लोग खुद अपनी भी तारीफ करते हैं। और जो उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं वे उनके कृपापात्र बन जाते हैं। जो उनकी तारीफ नहीं करते उनकी तरफ वे ध्यान नहीं देते। ऑफिस में बड़े साहब वर्मा जी ऐसे ही इंसान थे वे भ्रष्ट थे और चापलंसों से घिरे रहते थे। उसी ऑफिस में मोहन बाबू भी काम करते थे वे अपना काम ईमानदारी से करते थे और किसी की अपने मतलब के लिए वे कभी झूठी तारीफ नहीं करते थे मोहन जी ने देखा कि बड़े साहब रिश्वत के लोभ में तथा चापलंसों के कहने में ऐसा कदम उठाने जा रहे हैं जो उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है। मोहन बाबू ने उन्हें समझाया तो बड़े साहब उनसे ही नाराज होकर। आखिर वो काम उन्होंने किया ज...

व्यंग्य: स्वभाव से कुटिल

हमारे आसपास ऐसे बहुत से लोग मिल जाएँगे जो स्वभाव से कुटिल होते हैं ये कुटिलता उनकी आदत में शामिल हो जाती है इसके लिए उन्हें प्रयास नहीं करना नड़ते न ही कुछ सोचना समझना पड़ता है। इन्हें किसी का भला करना नहीं सुहाता। यह किसी को मिटते हुए देखकर बहुत खुश होते हैं किसी की सफलता इन्हें बिल्कुल हजम नहीं होती। अगर कोई अपनी सफलता की खुशी बाँटने इनके पास मिठाई का डिब्बा लेकर आ जाए तो वो मिठाई उन्हें नीम से भी अधिक कड़वी लगती है।  ऐसे लोग झूठी सहानुभूति दिखाने में बड़े माहिर होते हैं किसी के यहाँ कुछ बुरा हुआ हो तो ये अपनी खुशी दबाकर उसके पास झूठी सहानूभूति जताने पहुँच जाते हैं फिर खोद खोद कर उससे सारी बातें मालूम करके मन ही मन खुश होते हैं। शर्मा जी के लड़के की शादी का रिसेप्शन था केटरर को बारह सौ रुपये थाली के हिसाब से पेमेण्ट करना था। भोजन अच्छा था इंतजाम भी अच्छे थे। लेकिन इससे उनका जीजा दिलीप खुश नहीं था वो कुटिल था जलन के मारे उसका बुरा हाल था उसने तीन चादर फाड़ दिए थे दो कुर्सी तोड़ दी थीं और दस थाली में खाना लेकर उसे डस्ट बिन में फेंक दिया था ।इसके बाद भी उसके मन को संतोष नहीं हुआ...

व्यंग्य: कड़वी बात कहने वाले

कुख बातें ऐसी भी होती हैं जो सुनने में बहुत कड़वी लगती है । लेकिन उनमें हमारा हित निहित रहता है। जबकि जो बाते मीछी होती हैं वो हमारे लिए हानिकारक भी हो सकती हैं। कुछ लोग आदतन कड़वी बात करने वाले होते हैं वे बिना किसी लाग लपेट के कड़वी बात कह देते हैं किसी को बुरा लगे या भला इसकी उन्हें परवाह नहीं होती। उनकी वो बातें तब अच्छी लगने लगती हैं जब उनके परिणाम हमारे सामने आते हैं। एक ऑफिस में कार्यरत रमेश बाबू अपने बचपन के दिनों की बातें करते हुए अक्सर लखन चाचा को जरूर याद करते हैं वो बताते हैं कि आज उनकी बदौलत ही वो इस मुकाम पर हैं अन्यथा वो भी खेतिहर मजदूर बनकर अपना जीवन यापन कर रहे होते। उनके पिताजी मजदूर थे उनके पिताजी ने लखन चाचा के कहने पर ही उनका नाम सरकारी स्कूल में दर्ज कराया था उनके घर के पास ही खूबीलाल ताऊ रहा करते थे वो बड़ा मीठा बोलते थे। जरा सा लोभ दिखाकर बहुत सा काम कराते थे। मैं जब स्कूल जाते तो उन्हें बुरा लगता था वो कहते क्या करेगा स्कूल जाकर । काम तो तुझे खेतों में ही करना है। लखन चाचा और उनकी इस बात को लेकर झड़प हो जाती थी। आठवीं पास करके वे पढ़ाई छोड़ने वाले थ...

व्यंग्य: ज़रा सी बात पर बुरा मानने वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी का अपमान करने में तो ज़रा भी संकोच नहीं करते लेकिन कोई जाने अनजाने उनसे कुख तीखी बात कह दे या थोड़ी तेज आवाज में बोल दे तो तुरंत बुरा मान जाएँगे तथा झगड़ा करने पर उतारू हो जाएँगे यह किसी की जरा सी गलती को भी कभी माफ नहीं करते ये चाहते हैं कि सब उनसे दबकर रहें सब उनकी खूब आव भगत करें खूब पूछ परख करें कोई अगर ऐसा नहीं करता तो यह उससे हमेशा के लिए अपना संबंध तोड़ लेते हैं। इस प्रकार के लोग बड़े चपल चतुर और चालाक होते हैं किसी से इनकी गरज निकल रही हो तो उसकी यह खूब चापलूसी करेंगे उसकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानेंगे तब इनकी सारी ऐंठ अकड़ ढीली पड़ जाएगी । वैसे तो यह अपनी नाक पर मक्खी का बैठना भी बर्दाशास्त नहीं करेंगे बाकी इनसे संबंध रखना अपने आत्म सम्मान को खत्म कर देने के बराबर है । दो लोग अगर आपस में बात कर रहे हों उनमें से कोई इनका परिचित हो और वो इनकी तरफ देखकर जरा सा बँस दे उसको लेकर यह पूरी कहानी गढ़ लेंगे यह मान लेंगे कि यह दोनों हो न हो उनकी बुराई कर रहे हैं। फिर इसके बाद वो उन्हें अपना दुश्मन समझ लेंगे और उससे झगड़ा कर लेंगे वो लाख सफाई दे तब ...

व्यंग्य: फुरसत से परेशान

आज के आपाधापी भरे दौर में एक ओर जहाँ कई लोगों को फुरसत नहीं मिल रही है। दूसरी ओर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनके पास फुरसत ही फुरसत है वे इस फुरसत से परेशान हैं उनका दिन काटे नहीं कटता दिन जैसे तैसे गुजर जाता है तो रात बड़ी लम्बी लगने लगती है। ऐसे में नींद भी आँखों से रूठ जाती है। गुप्ता जी जिस दफ्तर%में काम करते थे वहाँ उन्हें दम भर की भी फुरसत नहीं मिलती थी। छुट्टी का दिन भी दफ्तर का काम करने में निकल जाता था वे काम की अधिकता से परेशान थे जिंदगी का अधिकाँश समय काम करते हुए बीत गया था किसी को फुरसत में देखकर उन्हें बहुत ईर्ष्या होती थी । वे सोचते कब उनकी जिंदगी में वो समय आएगा जब उनके पास फुरसत ही फुरसत होगी । आखिर एक दिन वो समय आ ही गया जब वे सेवानिवृत्त हो गए उस समय वे बड़े खुश थे तरह तरह के मनसूबे उन्होंने बना रखे थे। थोड़े दिनों तक उन्होंने फुरसत का आनंद लिया पर ठल्दी ही उन्हें ऊब होने लगी। बड़ा घर था लड़का अमेरिका में था उसने वहीं शादी कर ली थी। बेटी की भी शादी हो गई थी वो देहरादून में रहकर जॉब कर रही थी । उसे भी फुरसत नहों मिलती थी। इतने बड़े घर में बस वो और उनकी पत्नी ...

व्यंग्य: दूसरों को उपदेश देने वाले

आजकल हर दूसरा आदमी आपको उपदेश देता हुआ नजर आएगा सबकी फिलासफी अलग अलग दिखेगी उपदेश देते हुए वो अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करेगा इनमें अधिकतर%उपदेशक वो होंगे जिनके उपदेश दूसरों के लिए हैं वे उपदेश उनके अपने लिए नहीं ऐसे ही एक उपदेशक दान और त्याग की महिमा बता रहे थे इसके समर्थन में कई प्रकार के उदाहरण दे रहे थे। दृष्टाँतों का भी सहारा ले रहे थे । फिर कहने लगे दान सुपात्र को देना चाहिए फिर बोले यहाँ उनसे बड़ा कोई सुपात्र नहीं है । उनके शिष्यों की बड़ी संख्या थी कार्यकर्ता समर्पित थे। वे लोगों से संपर्क कर उन्हे अधिक से अधिक दान देने के लिए प्रेरित करते थे उनके उपदेश सात दिन चले सातवे दिन उनके शिष्य बनने वालों की भीड़ लग गई सबसे उन्होने दो दो लाख रुपये लिए थे इसके अलावा बहुत सा कीमती सामान था जेवर भी थे मँहगे कपड़े थे। दान पेटियों से इतना रुपया निकला था जिसे गिन पाना मुश्किल हो रहा था । उपदेशक जी का खुद का प्राइवेट जेट था करोड़ों रुपया बैंकों में जमा था । इसके बाद भी उनके धन एकत्रित करने की भूख मिटी नहीं थी। एक दिन उनके पंडाल में एक साधारण सा आदमी आरती की थाली ले...

व्यंग्य: गुदड़ी के लाल

आज के दिखावे के दौर में लोग चमक दमक देखकर नकली को असली समझ बैठते हैं । और फिर धोखा खाकर अफसोस तो कर लेते हैं पर अपने आप को बदलते नहीं है ।बार बार धोखा खाने के बाद भी उनमें सुधार नहीं होता। अक्सर देखने में आता है कि गुदड़ी के लाल पर कोई ध्यान नहीं देता उनकी सोच इस बात को कभी मानने नहीं देती कि गुदडी में भी लाल हो सकता है। यः लोग उस काँच की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं जो सोने की डिबिया में मखमल में लिपटा काँच का टुकड़ा रखा होता है जिसे भरमाने के लिए तिजौरी में रखा जाता है लोग आँख बंद कर बिना कुछ सोचे विचारे उसे असली लाल समझ लेते हैं फिर उसे मँहगे दामों में खरीद कर ठगे जाते हैं। स्कूल के दिनों की बात है एक निर्धन परिवार का लड़का था कोमल दास वो पढ़ने में तेज था पर साधन हीन था सरकारी स्कूल में पढ़ता था। उसी का हम उम्र प्रवीण भी था जो बड़े जमींदार का लड़का था शहर के सबसे मँहगे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहा था कोमलदास साधन हीन होते हुए भी आगे बढ़ता चला गया और आइ ए एस बन गया। प्रवीण की साधन संपन्नता कुछ काम नहीं आई क्योंकि वो सोने की डिबिया में रखा काँच का टुकड़ा था और कोमल दास गु...

व्यंग्य : नए साल का जश्न

कई कड़वी मीठी यादें छोड़कर पच्चीस जा रहा है और अनेक नई उम्मीदें संभावनाओं को लिए नया वर्ष आ रहा आने वाले वर्ष का स्वागत भी लोग उसी जोश और उत्साह के साथ कर रहे हैं जिस उत्साह से उन्होंने जाने वाले वर्ष का गत वर्ष किया था।अब पच्चीस कभी लौटकर नहीं आएगा अब वह अतीत बनने वाला है। नया वर्ष हर वर्ग के लोग मना रहे हैं गरीब से गरीब भी और%अमीर से अमीर भी दिहाड़ी मजदूर धनी राम दो दिन की छुट्टी लेकर आया हैं नए साल का जश्न मनाने के लिए दो दिन की छुट्टी में उसे आठ सौ रुपये का तो दिहाड़ी का नुक्सान होगा और ढाई हजार रुपये जश्न मनाने में खर्च हो जाएँगे । यह रकम चार सौ रुपये रोज कमाने वाले के लिए बड़ी रकम है। जिसकी भरपाई बड़ी मुश्किल से होगी लेकिन धनीराम को इसकी चिंता नहीं धनीराम ने जो कर्ज लिया है उसका ब्याज दे रहा है उसे इसकी भी चिंता नहीं है दूसरी और शहर के प्रसिद्ध रेस्टोरेंट के मालिक अनूप जी रात दिन काम कर रहे हैं । नए वर्ष के लिए उन्होंने अपने रेस्टोरेन्ट में खास इंतजाम किए हैं पिछली बार उन्होंने पूरे सोलह लाख रुपये कमाए थे इस बार बीस लाख रुपये कमाने का लक्ष्य था जिसे पूरा करने के लिए वे रात...