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व्यंग्य : बेहतर की खोज में बेहतर को खो देना

अक्सर ऐसा होता है कि हालात भले ही कितने अच्छे हों फिर भी ज्यादातर लोग उससे संतुष्ट नहीं होते वे इससे बेहतर की खोज में रहते हैं वो जब उन्हें हासिल नहीं होता तब अपने गुजरे हुए बेहतर हालात का आनंद नहीं उठाने का अफ़सोस प्रकट करते हैं। ऐसे लोग उस जुआरी की तरह होते हैं जो अपनी जीती हुई रकम इस आस में दाँव पर लगा देता है कि वो जीतकर मालामाल हो जाएगा और जब हारने लगता है तो और%बढ़चढ़कर दाँव पव दाँव लगाता है । फिर पूरी तरह कंगाल होकर ही दम लेता है। जब किसी का अच्छा समय चल रहा होता है तब उसकी उन्पति के रास्ते खुल जाते हैं। और वो यह मान लेता है कि अब कभी असफलता तो उसके पास आएगी ही नहीं यह सफलता की चकाचौंध उसे अभिमानी और बददिमाग बना देती है जिससे उसे शिखर से शून्य तक आने में देर नहीं लगती इसके बाद वो लाख कोशिशें करता है पर कुछ हासिल नहीं होता तब उसे अपार दुख होता है जिसका सबसे बड़ा कारण वो खुद होता है। इसी तरह हम संबंधों को लेकर भी भूल करते हैं। और अच्छे दोस्त की तलाश में अच्छे दोस्त को खो देते हैं फिर कहीं के नहीं रहते  मंजू के बड़े बेटे की बहू सरला अच्छे स्वभाव की थी सबका ख्याल रखने वाल...

व्यंग्य: दुश्मनी का दिखावा

जिस तरह कुख लोग दोस्ती का दिखावा कर दुश्मनी पाले रहते हैं और अवसर की तलाश करते रहते हैं उसी तरह कुछ ऐसे भी होते हैं । जो दुश्मनी का दिखावा करते हैं जिससे उनकी दोस्ती होती है। उससे जाहिर तौर पर दुश्मन की तरह लड़ते हैं । पर यह बहुत बड़े झाँसे बाज होते हैं। इनकी दोस्ती जिससे होति है उसमें छल कपट छिद्र कूट कूट कर भरा होता है वो खुद भी ऐसे होते हैं धोखा दगा इनकी नस नस में भरा होता है यह जिसका इस्तेमाल कर रहे होते हैं उससे दोस्ती का झूठा दिखावा करते हैं। उसके सामने यह आपस में खूब लड़ते हैं इनमें गर्मागर्म बहस भी होती है कभी कभी तो ऐसे लगता है कि इनमें कहीं खून खराबा न हो जाए अगला बीच बचाव करता है। फिर यह दोनों उससे एक दूसरे की बुराई करते हैं। उसके मन की बात जानते हैं फिर लोग उनके बारे भें क्या सोचते हैं यह मालूम करते हैं। दूसरे दिन शाम को आपस मे एक दूसरे की जान के प्यासे होकर लड़ने वाले गले मे हाथ डालकर घूमते हुए नजर आते हैं। खूब घुट गुटकर बाते करते हैं दोनों की बाते छल कपट भरी होती हैं। इसके बाद यह दोनों मिलकर सबसे ज्यादा क्षति उसे पहुँचाते हैं जिससे यह दोस्ती का दिखावा कर रहे थे। ...

व्यंग्य: हर हाल में संबंधों का निर्वाह जरूरी तो नहीं

कभी कभी रिशते निभाना हमारी गले में अटकी हड़डी की तरह पीड़ा दायक हो जाते हैं फिर भी हम उन्हें निभाते हैं कभी इसकी हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है क्या इस तरह से संबंधों का निर्वाह जरूरी है। कई बार तो इनमें जान दाँव पर लगाने की । नौबत तक आ जाती है। इस संबंध में एक घटना याद आ रही है जिसका उल्लेख करना यहाँ उचित होगा। हरिप्रसाद के साले अनोखी लाल के लड़के का मुंडन समारोह था हरिप्रसाद का उस समय बहुत जरूरी काम पड़ रहा था। साले का व्यवहार भी ठीक नहीं था उसकी इच्छा आयोजन में शामिल होने की नहीं थी पत्नी और बच्चे जा हो रहे थे लेकिन उसकी पत्नी ने ऊँच नीच समझाकर उसे आयोजन में शामिल होने पर विवश कर दिया वो अपना केरियर दाँव पर लगाकर आयोजन में शामिल हुआ वे लोग अच्छे नहीं थे उसकी उन्होंने खास पूछ परख नहीं की। साले का सार्वजनिक नल पर पानी को लेकर एक परिवार से झगड़ा हो गया । झगड़ा इतना बड़ा की साले ने उस महिला के पति पर चाकू से हमला कर दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई । तब हरिप्रसाद वहाँ नही था लेकिन उसका नाम भी हत्या रों के साथ लिखवा दिया गया। उसकी एक नहीं सुनी गई और उसे आजीवन कारावास की सजा हो ...

व्यंग्य: अधूरी खुशियाँ

आधुनिक सुख सुविधाओं से भरे इस दौर ने जहाँ खुशियों की मात्रा घटा दी हैं वहीं खुशियों को भी अधूरा कर दिया है। अभाव में थोड़ी खुशी भी बड़ी लगती है वहीं संपन्नता में बड़ी बड़ी खुशियाँ भी बौनी हो जाती हैं। जैसे सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार अगर साधारण कार भी खरीद ले तो उसके परिवार की खुशियों का ठिकाना नहीं रहता दूसरी अति संपन्न लोग करोड़ों की कार भी खरीद लें तो भी उनको वैसी खुशी नहीं मिलती ऐसे लोगों को नर्म मुलायम बिस्तर पर भी नींद नहीं आती। जो लोग बुरे काम करते है अनीतीपूर्वक धन कमाते हैं दुखी लाचार बेबस को सताते हैं उनका शोषण करते हैं उनकी हर ख़ुशी अधूरी होती है। खुशियों के मापदण्ड ऐसे लोगों की समझ से परे रहते हैं। जीवन सुख पूर्ण हो आनंद से भरा रहे खुशियाँ हर पल मौजूद रहे ऐसा सभी चाहते हैं पर कितने लोग सुखी रह पाते हैं क्षेत्रीय विधायक कौशल जी के पास आज हर प्रकार की सुख सुविधाएँ हैं फिर भी वे खुश नहीं है। उन्हे रह रहकर अपने वै दिन याद आते हैं। जब वे मजदूर थे तब थोड़ी खुशी भी बड़ी लगती थी कोई मोटर सायकिल पर बिठा ले तो बहुत मजा आता था। आज ऐसा नहीं होता। आपधापी दौड़धूप भरी जिंदगी मे...

व्यंग्य: समय की करवट

इस बात से तो सभी सहमत होंगे की समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कभी अच्छा समय होता है तो कभी बुरा और यह कब करवट बदल ले यह कोई जान नहीं सकता। कहते हैं कि समय अच्छा होतो फकीर भी बादशाह बन जाता है और समय अगर खराब हो जाए तो बादशाह को भी फकीर बनते देर नहीं लगती। जरा हम उन लोगों के विषय में सोचें जिनका समय अच्छा चल%रहा है। वे बहुत प्रभाव शाली हैं समाज में उनका रुतबा है मान है पूछ परख है। इससे उनमें अभिमान आ गया है वे खुद को खूब बड़ा समझने लगे हैं लोगों को हिकारत की नजर से देखते हैं किसी की भी बेइज्जती करने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता वे घमंडी हो गए हैं इस घमंड ने उनको यह विश्वास दिला दिया है कि वे हमेशा ही ऐसे रहेंगे। इसी भ्रम में वे जी रहे हैं लेकिन वे यह नहीं जानते जब वक्त करवट लेगा तो उनका क्या होगा हरी भरी बेल भी तो आखिर सूख ही जाती है। बुरे वक्त में उनके अपने भी उनका साथ छोड़ जाएँगे गुमनामी की जिंदगी जीना पड़ेगी और अंत बड़ा खराब होगा। लेकिन इसकी वे कभी कल्पना नहीं करेंगे। वे यह मान लेंगे कि ऐसा उनके साथ कभी नहीं होगा । और जब हो जाएगा तो उसके लिए वे तैयार नहीं होंगे। एक बड़ी क...

व्यंग्य: भाईयों का वैर

एक तरफ जहाँ आपस में भाईचारा रखने की बात होती है दूसरी तरफ सगे भाईयों में भी वैर होता हुआ देखा गया है। इनकी आपस की दुश्मनी देखकर तो दुश्मन भी दंग रह जाते हैं। जमीन जायदाद का बँटवारा तो हो जाता है। लेकिन एक दूसरे की जमीन मकान तो पास पास ही होते हैं कभी खेत की मेढ़ को लेकर तो कभी पालतू पशु द्वारा नुक्सान कर देने पर इनके बीच आए दिन झगड़े होते रहते हैं। यह झगड़े कभी कभी खूनी संघर्ष में बदल जाते है। कभी कभी तो किसी की जान भी चली जाती है। पिछले दिनों अस्पताल जाना हुआ वहाँ रमेश चंद्र जी भर्ती थे जो ठेकेदारी करते थे। उनके सगे भतीजे ने उन पर हमला कर दिया था उनके सिर में बारह टाँके लगे थे अंदरूनी चोट भी लगी थी भतीजे ने उन्हें बेरहमी से पीटा था। उन्हें इस बात का दुख था कि जिसे बड़े लाड़ से पाला था उसी ने बढ़े होकर उन पर जानलेवा हमला कर दिया था। इससे ज्यादा दुख की बात तो यह थी कि उनका सगा भाई भी अपने बेटे का पक्ष ले रहा था । उनकी भाभी जिसका घर उजड़ने से उन्होंने बचाया था उसी के कहने पर उसके बैटे ने रमेश पर जानलेवा हमला किया था। सबसे ज्यादा दुखी तो माँ थी वो रो भी नहीं सकती थी। इस घटना के बाद ...

व्यंग्य: खोटीं की चमक

अक्सर खरे से खोटे ज्यादा चमकदार होते हैं वे अपनी चमक से लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं और उनकी चमक से प्रभावित होकर लोग खरे को छोड़कर खोटे को अपना लेते हैं। खरे खोटे की परख तो पारखी ही कर सकता है। और पारखियों की तो वैसे ही कमी बनी रहती है इसिलिए हीरे तो धूल में पड़े रहते हैं और काँच के टुकड़े हीरे मान लिए जाते हैं। यह खोटे लोग खरे को आगे नहीं बढ़ने देते उनके सारे अवसरों को झटक लेते हैं जहाँ पर खरों को होना चाहिए वहाँ ये खोटे नजर आते हैं। सारे सम्मान ये हड़प लेते हैं खरों को जो पदवी मिलना चाहिए ये उसे हासिल कर लेते हैं। एक पत्रिका के संपादक इस बात से दुखी थे कि रचनाओं का स्तर दिनों दिन गिरता जा रहा है। अच्छे कवि लेखकों की बड़ी कमी है हमने उनसे कहा कि आप कितने रचनाकार की रचनाएँ छापते हैं वे बोवे मुश्किल से आठ की इसके अलावा कोई स्तरीय मिलता ही नहीं है हमने कहा आप खोज ही नहीं करते। जो आपको सहज उपलब्ध हो गए उनको महत्व दे रहे हैं उनके बारे में जरा छानबीन तो करो वे बोले इतना समय किस के पास है हमारे पास और भी काम है। ये आठ लोग वे थे जिनका ग्रुप बना हुआ था उस ग्रुप में पत...

व्यंग्य: भलमनसाहत की कीमत

प्रायः अनेकों लोग यह कहते हुए मिल जाएँगे कि आज के ज़माने में भलमनसाहत की भी कीमत चुकानी पड़ती है। बहुत सारे अहसान फरामोश ऐसे मिल जाएँगे जो आपके अहसानों का बदला चुकाने की तो दूर की बात है। आपको धन्यवाद देना तक उचित नहीं समझेंगे। कुंजीलाल भले आदमी थे अनोखीलाल उनके दोस्त थे कुंजी लाल संपन्न थे । अनोखीलाल गरीब कुँजीलाल जी ने अनोखीलाल जी पर खूब अहसान किए थे। जिनकी कोई गिनती नहीं। उनका मिलना जब होता था जब अनोखीलाल जी को पैसे की जरूरत पढ़ती थी। अनोखी लाल जी को थोड़ा थोड़ा करते हुए वे अब तक दस लाख रुपये कर्ज में दे चुके थे। आजकल अनोखीलाल का लड़का भी कमाने लगा था। घर में पैसे की आवक हो रही थी मगर%अनोखीलाल जी ने कु॔जीलाल जी का एक भी रुपये का कर्ज अदा नहीं किया था बल्कि उनसे मिलना जुलना ही बंद कर दिया था। अनोखीलाल जी की नीयत में खोट आ गई थी। एक दिन कुँजीलाल जी बहुत दुखी थे कह रहे थे जो मेरा दस लाख रुपये का कर्ज खा कर बैठा है वो लोगों से कह रहा है कि उसने कुँजीलाल पर बहुत अहसान किए हैं कुंजीलाल आज जो कुछ हैं वो उनकी बथौलत है। इस बात से वे दुखी थे उन्होंने अपना पैसा जब अनोखीलाल से वापस म...

व्यंग्य: कोरी दिलासाएँ

दिलासा देने के नाम पर ज़ख्मों पर नमक छिड़कने वाले बहुत मिल जाएँगे ऐसे लोगों में छल कपट रखने वालों की संख्या सबसे ज्यादा होगी ।वहीं कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो आपसे जलते हैं लेकिन जाहिर नहीं होने देते ये मन ही मन आपका बुरा चाहते हैं। जब आपका बुरा होजाए तो इन्हें बहुत खुशी होती है। ये लोग अपनी खुशी को छिपाकर उसको दिलासा देने के बहाने उसके जख्मों को कुरेदने पहुँच जाते हैं उससे झूठा अपनापन दिखाकर सारी बातें जान लेते हैं वो इन्हें हमदर्द समझकर अपने मन की सारी बातें इन्हें बता देते जिसे सुनकर यह भीतर ही भीतर गदगद हो जाते हैं और ऊपरी तौर पर कहते हैं अरे यह तो बुरा हुआ ऐसा नहीं होना चाहिए । और मन ही मन कहते हैं अच्छा हुआ ऐसा ही होना चाहिए।  ऑफिस के सहयोगी वर्मा जी की पत्नी का असामयिक निधन हो गया था वर्मा जी बहुत दुखी थे किसी तरह अपने आँसुओं चो रोके हुए थे। उनके घर मातमपुर्सी करने उनके ही ऑफिस के दिनेश जी आए और उन्हें तसल्ली देने लगे वर्मा जी बड़े सँभलकर उनसे बात कर रहे थे पर दिनेश जी तो कुछ ओर चाहते थे इसलिए वे उनकी भावनाओं को भडकाते हुए बोले आपकी तो दुनिया ही उजड़ गई ।आपके जीवन का सूरज...

व्यंग्य: दोस्तों की तलाश

आज की दुनिया में दोस्ती तो है पर दोस्त नहीं हैं। मतलबी हैं अवसरवादी हैं लोभी है लालची हैं धोखेबाज हैं दगाबाज हैं अगर नहीं हैं तो सच्चे दोस्त नहीं है इस भीड़ में दोस्त गुम हो गए हैं । न कोई सच्ची दोस्ती करना चाहता है न दोस्त बनना चाहता। अगर किसी को दोस्त मान भी लो तो वो इसे हमारी कमजोरी समझ लेगा और फिर हमारी कमजोरियों का खूब लाभ उठाएगा। आप किसी से अपनी तरफ से तो सच्ची दोस्ती कर रहे हैं पर वो आपसे दोस्ती कर रहा है इसकी कोई गारंटी नहीं हो सकता है उसका आपसे कोई मतलब निकल रहा हो इसलिए वो दोस्ती का दिखावा कर रहे है और आप उसे सच्चा समझ रहे हों। मनीष और%नवीन दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। मनीष के पास बाईक थी नवीन बस से कॉलेज जाता था जिसके किराये में उसका बहुत सा पैसा खर्च हो रहा था। इसे बचाने के लिए उसने मनीष से दोस्ती कर ली। दोस्ती क्या दोस्ती का दिखावा करना शुरं कर दिया। कुछ दिनों में ही उसने मनीष से घनिष्ठता चर ली। उसकी भावनाओं से कुछ इस तरह से खिलवाड़ किया कि मनीष उसे अपनी बाइक पर बिठाकर कॉलेज ले जाने लगा नवीन ने मनीष से तो ये कहा कि उसके पिता पर कर्ज है इसलिए वो बस का किराया ...
व्यंग्य बुरा करो या भला आपकी मर्जी ****** हम एक वक्त में एक ही काम कर सकते है॔ या तो किसी का भला करें या बुरा या फि अपना स्वार्थ हल कर लें। हम जो भी कर्म करते हैं उसके जिम्मेदार हम ख़ुद होते हैं उसका फल भी हमें ही भुगतना पड़ता है। जैसे भोज में होता है कोई मिठाई खा रहा होता है कोई तेज मिर्च मसाले वाला समोसा एक वक्त में दो अलग अलग काम हो रहें हैं एक को मिठाई में आनंद आ रहा है । दूसरे का तेज मिर्च मसाले से मुँह लाल हो रहा है आँखों से पानी बह रहा है वो सी सी कर रहा है । परेशान है फिर भी उसे  अच्छा लग रहा है क्योंकि समोसा खाना उसकी इच्छा पर निर्भर था वो चाहे तो मिठाई भी खा सकता था दोनों के परिणाम अलग अलग होते है। जीवन में भला बुरा करने के हमेशा विकल्प रहते हैं। लेकिन कभी कोई विकल्प ही नहीं होता  जो करना है वो करना ही पड़ेगे भले ही हमारी इच्छा हो या न हो भले ही काम नीति संगत न हो। पर जीवन में ऐसी नौबत कभी कभार ही आती है। जीवन को यदि मधुर सुखमय आनंदायक बनाना है तो सबसे मेल जोल बनाए रखने में ही भलाई है। लेकिन जो लोग बार बार मनाए जाने पर भी नहीं मानते तो उनसे मेल जोल कैसे करेंगे...

व्यंग्य: यादों की कसक

इंसान के जीवन में कोई भी घटना शाश्वत नहीं रहती समय कभी नहीं थमता समय गुज़र जाता है लेकिन अपने पीछे अनेक खट्टी मिठी यादें छोड़ जाता है। जो अच्छी यादें होती हैं वो मन को बहुत सुकून देती हैं ।जो कड़वी पीड़ादायी यादें होती हैं उनकी कसक मन को व्याकुल किए रहती हैं। कभी कभी ऐसा भी होता है जब हम कुछ लोगों को खास महत्व देते हैं। उनकी आव भगत और पूछ परख के फेर में हम कई लोगों की तरफ ध्यान तक नहीं देते कुछ लोगों की हम घोर उपेक्षा करते हैं। यहाँ तक कि उनका सार्वजनिक रूप से अपमान भी कर देते हैं। लेकिन हम नहीं जानते कि समय से अधिक कोई बलवान नहीं है । कब किसी का समय बिगड़ जाए और कब किसी का समय सुधर जाए यह कोई नहीं जानता। जिनकी हमने अतीत में घोर उपेक्षा की थी जिनको अपमानित किया था । वे जब समर्थ बन जाते हैं। सक्षम बन जाते हैं ।समाज में उनकी खूब मान प्रतिष्ठा हो जाती है। लोग उनकी कृपकाँक्षी हो जाते हैं। तब वे लोग उनसे नजरें मिलाने तक की स्थिति में नहीं रहते जो उनकी कभी घोर उपेक्षा करते थे उन्हें हमेशा उनकी औकात याद दिलाते रहते थे अब वे कहीं के नहीं रहते। लेकिन जिनकी वे उपेक्षा करते थे उनका कद बहुत ...

व्यंग्य: ख़ुद को महान समझने वाले

कुछ दंभी खोखले घटिया दर्जे के लोग खुद को महान समझने की गलतफहमी पाल बैठते हैं यह लोग अपने सामने किसी की भी तारीफ बर्दाश्त नहीं कर सकते ये चाहते हैं कि सब इनकी तारीफ करें इसके लिए ये हर हद सू गुजर जाते हैं ये लोग कुछ खुशामदियों को अपने साथ रखते हैं जो इनकी जी भर कर झूठी तारीफ करते हैं।  ऐसे खुशामदिए लोग इनसे अपना स्वार्थ हल करते रहते हैं इनका उनसे कोई भावनात्मक लगाव नहीं होता जब तक इनका मतलब हल होता रहता है तब तक ये झूठी खुशामद करते रहते हैं। इनका झूठी तारीफ सुनकर दिमाग सातवे आसमान पर पहुँच जाता है ये खुद को महान समझने लगते हैं । पर कोई ऊँट पहाड़ से ऊँचा नहीं होता ऊँट अपने आपको भले सबसे बड़ा समझ ले लेकिन जब वो पहाड़ के नीचे आता है तब उसे अपने कद का अहसास होता है। पर पहाड़ से गुजरने के बाद फिर ये अपने आपको महान समझने लगते हैं। यह लोग झूठ बोलने में माहिर होते हैं अपनी झूफी महानता के किस्से सबको बढ़ चढ़कर सुनाकर दूसरों पर रौब गाँठने में इन्हें खूब मजा आता है। ऐसे लोगों की पीठ फेरते हो लोग इनकी बुराइयों का पुलंदा खोलना शुरू कर देते हैं । दिनेश एक जगह लोगों के बीच में अपनी झूठी महानता...

व्यंग्य: अपमान का घाव

व्यक्ति सब कुछ भूल सकता है हर तरह का घाव भी भर सकता है । पर जो घाव अपमान से दिल को लगता हो वो कभी नहीं भरता उससे जो दर्द होता है वो भी किसी उपाय से बंद नहीं होता।जो अपने अपमान का बदला ले लेते हैं वे भी अपने अपमान को भूल नहीं पाते। किसी का अपमान अगर सार्वजनिक रूप से किया जाए तो वो अत्यंत दुखदायी होता है। जो सबसे ज्यादा दर्द देता हैं । कुछअहंकारी लोग जो अपने सामने सबको कमतर समझते हैं । वे किसी का भी अपमान करने में जरा भी नहीं हिचकते ऐसे लोग तो अपमानित करके भूल जाते हैं लेकिन अपमानित व्यक्ति उस अपमान को कभी नहीं भूलता । जिनका ये अपमान नहीं कर सकते उसे ताने देते हैं या दूसरों को माध्यम बनाकर उनको अप्रत्यक्ष रूप से अपमानित करते हैं। अक्सर ये लोग अपने से छोटे कमजोर दुखी लाचार बेबस का सबसे ज्यादा अपमान करते हैं उसके सामने कभी इज्जत से पेश नहीं आते जो दबा हुआ होता है वो अपना अपमान चुपचाप सह तो लेता है पर उसे कभी भूल नहीं पाता। जो लोग अपमान का बदला नहीं चुका पाते वे बददुआ देते हैं रात दिन कोसते रहते हैं और जब संयोग से कुछ अप्रिय घटित हो जाए तो इसे अपनी बददुआ को फलीभूत मानकर ख़ुश हो लेते हैं।...

व्यंग्य: आखिर कब आएगा अच्छा समय

ज्यादातर लोग इसी उम्मीद में अपनी जिंदगी को जीते रहते हैं कि कभी तो उनका अच्छा समय आएगा। ऐसे लोग वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। कल जो गुजर गया उसको दुहराना नहीं चाहते और भविष्य से उम्मीदें रखे रहते हैं। ऐसा करते करते सारा समय बीत जाता है। जब जिंदगी का आखिर पढ़ाव आ जाता है तब व्यक्ति अपने गुजरे हुए वक्त का आकलन करता है तड उसे पता चलता है कि जो समय गुजर गया उसी में ही अच्छा समय भी था जिसकी हमने कीमत नहीं की और भविष्य में और बेहतर%समय आने की प्रतीक्षा करते रहे जो कभी नहीं आया अब जो समय आ रहा है ये तो पहले से भी खराब है और जो आने वाला है वो और खराब होगा। बुढ़ापे ने अपना शिक॔जा कस लिया शरीर को बीमारियों ने जकड़ लिया है मिठाई खाने के दिन जा चुके हैं अब तो मिठाई से कई गुना ज्यादा मँहगी कड़वी दवाइयाँ खाना पड़ रही हैं यात्रा कर नहीं पा रहे पैसा भी कमा नहीं पा रहे हैं जो पेंशनर हैं उनकी पेंशन का बड़ा भाग गोली दवाओं में खर्च हो रहा है। जिनके पास बुढ़ापे में खूब धन संपदा है वे भी दुखी हैं वे अब उसका भोग नहीं कर पा रहे हैं दो रूखी रोटी और%कम मिर्च तेल मसाले की सब्जी खाकर रहना पड़ रहा है। यह बात...

व्यंग्य: चमकदार खोटे

यह बात तो सभी कहते हैं कि जो खोटा होता है । उसमें खरे से ज्यादा चमक होती है। और जो पारखी नहीं होते वे खोटे को खरा समझ लेते हैं और खरे को खोटा ये उनकी भूल होती है जिसका नुक्सान ही उठाना पड़ता है। उनकी सोच से समझ से न कभी खोटा खरा हो सकता है न खरा खोटा। पारखी इनको अलग अलग कर देता है।  इसी तरह लोग भी होते हैं जो झूठा होता है वो उसे सच्चा साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । जबकि सच्चा कभी अपनी सच्चाई को प्रचारित नहीं करता। जो दुश्मनी को छिपाकर दोस्ती का दिखावा करते हैं। उसकी दोस्ती को लोग सच्ची समझ लेते हैं उनका यह भ्रम जब तक दूर नहीं होता तब तक वे अपनी दुश्मनी निकालने में सफल नहीं हो जाते।  किशोर इसी तरह का फर्जी आदमी था उसकी बोली जितनी मीठी थी उतना ही कड़वा उसमें जहर भरा था। वो सबका लाभ उठा लेता था। पर उसका क ई लाभ नहीं उठा सकता था। लोग उसकी बातों के सम्मोहक जाल में फँसकर छटपटाते रहते थे जिसे देखकर उसे पैशाचिक आनंद की प्राप्ति होती रहती थी। ऐसे लोगों में ईर्ष्या छल कपट लोभ मोह अभिमान कुटिलता कूटकूटकर भरी होती है। इनसे तो सँभलकर रहना ही ठीक है। मगर ऐसा हो नहीं पाता ये लोग ब...

व्यंग्य: हर किसी से राज की बातें मत कहो

कुछ लोग अपने कुछ दोस्तों को बहुत करीबी समझते हैं उनसे कोई बात नहीं छिपाते अपने मन की सारी बातें उन्हें बता देते हैं। जो उनके लिए बहुत नुक्सानदायक साबित होती हैं। जिसका खामियाजा उन्हें जीवन भर भरना पड़ सकता है। कुछ राज की बातें तो ऐसी होती हैं जो किसी भी हाल में किसी भी परिस्थिति में कभी किसी को भी नहीं बताना चाहिए। अपने निकट से निकटतम परिजन को भी नहीं कसम खाकर या कसम देकर राज की बातें बताने वाले भी परेशानी में पड़ते हुए देखे गए हैं। राजेश और सोमेश दोनों गहरे दोस्त थे। राजेश अपने मन की सारी बातें सोमेश को बता देता था । ऐसी कोई राज की बात नहीं थी जो सोमेश को नहीं मालूम हो दोनों रोज शाम को मिलते थे और खूब फातें करते थे दोनों का जी हल्का हो जाता था। राजेश व्यवसायी था और सोमेश सरकारी नौकरी करता था राजेश दौलतमंद था और सोमेश मध्यप वर्गीय। जितना सोमेश को साल भर में वेतन मिलता था उससे अधिक का तो वो इन्कम टेक्स भरता था। फिर भी राजेश सोमेश को बराबरी का दर्जा देता था एक दिन किसी बात पर उनके बीच मतभेद पैदा हो गए। कुछ कहा सुनी भी हुई बात इतनी बिगड़ गई कि दोनों एक दूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए थे त...

व्यंग्य: कसर निकालने वाले

कुछ कपटी कुटिल लोग अपनी दुश्मनी को कुछ इस तरह छिपाकर रखते हैं कि दुश्मन को इसका अहसास जरा भी नहीं हो पाता। ये अपने दुश्मन से दोस्ती का दिखावा करते हैं क्योंकि खुलकर दुश्मनी करना इनकी फितरत नहीं होती ऐसे लोग अपनी कसर निकालने का अवसर तलाशते रहते हैं। और जैसे ही इन्हें मौका मिलता है ये अपना हिसाब बराबर कर लेते हैं। ऐसे लोग बड़े खतर नाक होते हैं साँप और बिच्छू से भी ज्यादा । क्योंकि साँप के तो मुँह में जहर होता है और बिच्छू की पूँछ से साँप से भी बचा जा सकता है और बिच्छू से भी बचा जा सकता है। पर ऐसे कुटिल कपटी दुश्मन से बचना बहुत मुश्किल होता है। क्योंकी इनके तो मुँह में भी जहर होता है तथा पूँछ में। जब पूँछ से डँसते हैं तो जानलेवा तड़फाते हैं और मुँह से डँसते हैं तो काम तमाम ही कर देते हैं। समझदार लोगों को इनकी पहचान होती है वे इनकी फितरत से अच्छी तरह वाकिफ रहते हैं इसलिए वे इनका शिकार नहीं बन पाते । बाकी जो भावुक सीधे सादे दयालु टाइप के इंसान होते हैं वे इनका शिकार आसानी से बन जाते हैं। गाँव के सजनसिंह तथा रजन सिंह दोनों मित्र थे सजन सिंह संपन्न थे सपष्ट वादी थे साफ दिल के थे अच्छी ब...

व्यंग्य: हमेशा तनाव में रहने वाले

जो हमेशा तनाव में रहते वे कभी खुलकर हँस नहीं पाते वे लोग चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं जो उनके संपर्क में आते वे उनके चेहरे की मुस्कान को भी छीन लेते हैं। इनको पूरे ज़माने से शिकायत रहती है। ऐसे लोगों के अनुसार दुनिया निकम्मे कामचोर और लापरवाह मसखरे लोगों से भरी हुई है। यह सबके काम में मीन मेख निकालते हैं जबकि खुद कोई काम ठीक से नहीं कर पाते। ऐसे लोग जब हँसते हैं तो उनकी हँसी में कुटिलता छिपी रहती है। लोग इनसे बचकर रहना पसंद करते हैं क्योंकि यह किसी की भी बेइज्जती सबके सामने करने में जरा भी नहीं हिचकते।  ऐसे ही एक व्यक्ति हैं चतर सिंह आजकल उनकी हालत बड़ी खराब वे एक छोटे शहर में रहते हैं जहाँ एक दूसरे को सब अच्छी तरह से जानते हैं। उनके स्वभाव के कारण शहर के दुकानदारों ने उन्हें सामान देना बंद कर रखा है। उन्हें देखते ही दुकानदार हाथ जोड़कर%खड़े हो जाते हैं और कहते हैं माफ कीजिए आपके लायक मेरी दुकान में कोई सामान नहीं है। वे ही चतर सिंह अपने संबंधी की बिटिया का रिश्ता पक्का करने दूसरे शहर में गए थे। वहाँ किसी ने उन्हें बाजार से रसगुल्ला लाने के लिए भेज दिया। वहाँ दुकानदार से इस...

व्यंग्य: झूठी सहानुभूति जताने वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपके हितैषी बनने का दिखावा करते हो पर भीतर से वो आपका भला होते हुए देखना नहीं चाहते। कई बार यह हमें नुक्सान पहुँचाने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं लेकिन कभी खुलकर सामने नहीं आते । ऐसे लोग हमारा बना बनाया काम बिगाड़कर फिर हमारे सामने झूठी सहानुभूति दिखाने आते हैं । अपनी खुशी को भीतर छिपाकर। फिर दुख प्रगट करते हुए सारी जानकारी प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग हमारे दोस्त भी हो सकते हैं। परिचित भी हो सकते हैं। हमारे निकट संबंधी भी हो सकते हैं जिनके बारे में हम सपने में भी यह नहीं सोच सकते कि यह ऐसे होंगे। यह हमारा सौदा फेल करा देंगे। रिश्ता तुड़वा देंगे दोस्त से झगड़ा करा देंगे सुलझते मामले को उलझा देंगे। अपने किए का इल्जाम दूसरों पर मढ़ देंगे।  राकेश और मोहन दो दोस्त थे। राकेश के पास निजी मकान था मोहन किराये के घर में रह रहा था। राकेश इसी बात को लेकर उसकी खिल्ली उड़ाया करता था। औरों के सामने नीचा दिखाता रहता था। इससे तंग आकर मोहन ने एक फ्लेट खरीदने का विचार किया। फ्लेट देख भी लिया वो उसे समझ में भी आ गया उसका सौदा भी हो ही गया था। उस फ्लेट के विषय में मोहन ने ...

व्यंग्य: समय की करवट

समय कब किस का कौन सी करवट बदल ले ये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता । समय अगर मेहरबान हो तो रंक को राजा बनने में देर नहीं लगती वही समय अगर करवट बदल ले तो राज भी रंक बन जाता है। कई नगर सेठ दर?दर के भिखारी बनते हुए देखे गए हैं। एक किसान के खेत पर जाने का अवसर मिला उसके खेत में एक लगभग पचास वर्ष का मजदंर काम कर रहा था। खेत मालिक ने उसके विषय में बताया कि ये भी इसी गाँव का है इसके पास सौ एकड़ जमीन थी शानदार हवेली थी पचासों नौकर चाकर इसके यहाँ काम करते थे कभी इसका बड़ा रुतबा था आसपास के पच्चीस गाँवों में इसकी बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी । लेकिन समय ने करवट बगली इसके हालात बिगड़े और ये मिटता चला गया। अंत में सब कुछ बिक गया न जमीन रही न जायदाद एक छोटी सी झुग्गी में रह रहा है सबने इसका साथ छोड दिया है सारा रुतबा खत्म हो गया है। खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। इसलिए कहा गया है कि समय सबका एक सा नहीं रहता किसी का समय अच्छा होता है तो किसी का बुरा। जो बीज जमीन में पडकर अंकुरित होकर ऊग आते हैं। वे बड़े होकर फल फूल जाते हैं बाकी असंख्य बीच चक्की में पिसकर आटा में बदल जाते हैं जो भोजन में ब...

व्यंग्य: उधारी की आदत

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें मजबूरी में उधार लेना पड़ता है। दूसरी ओर कुछ लोग आदतन उधार लेने वाले होते हैं जिनको उधारी की आदत पड़ जाती है वे हमेशा आर्थिक संकट से घिरे रहते हैं उनका खर्च आय से अधिक होता है जिससे वे उधारी के दललद में हमेशा हो फँसे रहते हैं ।जो उधारी लेकर वापस नहीं करते उनकी हालत और भी अधिक दयनीय हो जाती है। ऐसे लोग भरोसा तोड़ देते हैं फिर उन्हें उधार देने वाला कोई नहीं मिलता। जिनका यह पैसा खा चुके होते हैं उनसे इन्हें बचकर रहना पड़ता है अगर इनका कभी उधारी वसूल करने वाले से सामना हो जाए तो फिर उन्हें सार्वजनिक रूप से अपने अपमान को सहन करना पड़ता है। सोहन और रोहन एक ही ऑफिस में नौकरी करते थे । दोनों का वेतन भी बराबर था उस वेतन में सोहन का तो आराम से गुजारा चल जाता था पर रोहन हमेशा आर्थिक संचट से घिरा रहता था उसने सोहन से भी कर्ज ले रखा था जिसे वो लौटाने का नाम भी नहीं लेता था जिस दिन उसे वेतन मिलता था उस दिन उसके यहाँ उधारी वसूल करने वालों की भीड़ लगी रहती थी उसने बैंक से भी लोन ले रखा था जिसकी किश्त में उसके वेतन का बड़ा हिस्सा चला जाता था। सोहन का कहीं कोई उधारी का ख...