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नवंबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: काकाजी

वीरेन्द्र काकाजी सत्तर वर्ष की उम्र में भी युवाओं की तरह क्रियाशील थे। उन्होंने मात्र पन्द्रह वर्ष की उम्र से कमाना शुरू किया था आज वो शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी थे उनके दोनों भतीजों तथा उनके परिवार दोनों बेटियों तथा उनके परिवार ने वीरेन्द्र,काकजी का सत्तरवाँ जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया था। पूरा गौतम नगर उन्हें,काकाजी के नाम से जानता था। आज से चौंसठ वर्ष पूर्व गौतमनगर एक साधारण सा कस्बानुमा गाँव था। जिसमें मिडिल तक ही स्कूल था वीरेन्द्र काकाजी ने उसी स्कूल से आठवीं पास की थी उनके घर की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि उन्हें आगे पढ़ाई के लिए दंसरे शहर में भैजा जा सके । वीरेन्द्रा काकाजी के पिताजी रामधन जी सीधे सादे इंसान थे उनके पास कुल पाँच एकड़ जमीन थी उसमें ही खेती कर वे अपने परिवार का खर्च चला रहे थे वीरेन्द्र काकाजी के बड़े भाई नरेन्द्र तो बिल्कुल भी पढ़े लिखे नहीं थे वे भी खेती करते थे उनके पास दो बैल थे वे बँटाई से जमीन लेकर खेती करते थे कुल मिलाकर जौतमनगर में उनका परैवार साधारण हैसियत वाला था। गौतम नगर में हर मंगलवार को साप्ताहिक हाट लगा करती थी। उसमें बाहर से फड़िया आते थे...

कहानी: पलायन

सुरजन को आज पूरे बीस साल हो गए थे अपने ग्राम बिशनखेडी से पलायन कर शहर में आए हुए। इन बीस सालों में उसकी बहुत तरक्की हुई थी। उसका बड़ा लड़का किशोर एस डी एम था और लड़की रूपा डॉक्टर। सुरजन ने बीस साल पहले जो चाय की छोटी सी दुकान खोली थी उसकी जगह पर आज मिलन रेस्टोरेन्ट था जो शहर का सबसे अच्छा रेस्टोरेन्ट माना जाता था। सुरजन साठ साल की उम्र में भी उस रेस्टोरेन्ट का संचालन सफलतापूर्वक कर रहे थे। बीस साल पहले जब सुरजन ने बिशनखेड़ी गाँव से पलायन किया था उस समय उनके पास सिवाय कुछ फटे चीथड़ों और कुछ टूटे फूटे बर्तनों के सिवा और कुछ नहीं था। सुरजन ने एक निर्माणाधीन बहुमंजिला भवन में पूरे एक साल तक मजदूरी और चौकीदारी की थी। वहीं पर एक चाय की छोटी सी दुकान भी खोल ली थी जिसको उसकी पत्नी सरसुती चलाती थी। किशोर सरकारी स्कूल में नवमी में पढ़ रहा था। वैसे देखा जाय तो किशोर का भविष्य सुधारने के लिए सुरजन सिंह गाँव से शहर में आए थे। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो किशोर भी गाँव के दबंग उमराव सिंह के यहाँ बँधुआ मज़दूर बनकर रह गया होता। उमराव सिंह एक अत्याचारी व्यक्ति था। उसके चंग...

कहानी: अंतर

मनीष और सतीश दोनों सगे भाई थे । दोनों आज से दस वर्ष पूर्व अलग अलग हुए थे तब दोनों में जो बँटवारा हुआ था वो बराबर हुआ था मगर आज दोनों की हैसियत मे ज़मीन आसमान का अंतर था मनीष आज भी नौकरी कर रहा था जिसमें उसे चालीस हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिल रहा था इसमें ही उसकी जैसे तैसे गुजर बसर हो रही थी जबकि सतीश का नमकीन का बिजनिस था और,प्रतिदन की बिक्री ही उसकी लाखों में थी उसके पास पचास कर्मचारी काम कर रहे थे वो एक बड़े मकान में रह रहा था। बचपन से ही मनीष तथा सतीश के स्वभाव में बहुत अंतर,था मनीष किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहता था और सतीश को जोखिम भरे काम करना अच्छा लगता थे उनके पिताजी रघुवीर की किराना की दुकान थी उसकी आय से उन्होंने शहर में दो मकान तथा शहर से दो किलोमीटर दूर एक एकड़ जमीन खरीदी थी वो जमीन खाली पड़ी थी कोई उसे देखने तक नहीं जाता था मनीष रघुवीर के साथ दुकान पर रहता था जो रघुवीर बताते उतना काम कर देता इससे आगे उसकी कोई सोच नहीं होती थी सतीश प्रापर्टी डीलिंग का काम करता था दोनों भाई हायर सेकेण्डरी से अधिक नहीं पढ़े थे दोनों भाइयों की शादी हो गई थी सब एक साथ रह रहे...

कहानी: बेचारे माँ बाप

संतोष और मोहिनी वृद्धाश्रम में रहकर अपने दिन गुजार रहे थे। उनके इकलौते बेटे सुनील की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। इसके बाद उनका अपना कोई नहीं था। बहू सानिया ने दूसरी शादी कर ली थी। उनकी आमदनी का कोई जरिया नहीं था। ऐसे में उन्होंने वृद्धाश्रम में रहना ही उचित समझा था। यहाँ वे ठीक से रह रहे थे, हालाँकि बेटे की मौत का दुख वे अभी तक नहीं भूले थे। वे दोनों बेचारे होकर रह गए थे। दस वर्ष पहले की बात है तब सुनील परिवहन विभाग में नौकरी करते थे। उनकी शादी सानिया से पाँच वर्ष पहले हुई थी मगर यह शादी सफल नहीं कही जा सकती थी। क्योंकि सुनील और सानिया के संबंध में पहले दिन से ही खटास आ गई थी। सानिया का सुनील के प्रति व्यवहार अच्छा नहीं था। वो अगर सात दिन ससुराल में रहती थी तो महीना भर मायके में गुजारती थी। वो सुनील के माता पिता को बर्दाश्त नहीं कर पाती थी। वो कहती अगर माँ बाप को छोड़कर अलग रहने का बंदोबस्त करो तो मैं तुम्हारे साथ रहूँगी नहीं तो सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा। मगर सुनील अपने माता पिता को छोड़ने को तैयार नहीं थे। सानिया अब सुनील से तलाक लेने की बात भी करने लगी थी। एक दिन सुनील जब अपनी ससु...

कहानी: बीमारी

प्रकाश चंद जी कृषि विभाग में क्लर्क के पद पर कार्यरत थे । आज उनकी बेटी रोशनी की शादी सादगी से संपन्न हो गई थी। जिसमें उनका बहुत कम पैसा खर्च हुआ था जिस नवयुवक रोहन ने रोशनी से शादी की थी उसका दो दिन पहले ही आइ ए एस में चयन हो गया था इसके साथ ही उसे करोड़ों रुपये की दहेज वाली शादी के ऑफर आए थे मगर उसने रोशनी से दहेज रहित शादी की थी और वो इससे बहुत खुश था प्रकाश जी की खुशी का तो ठिकाना ही नही था उनके परिवार में पूरे एक महीने बाद खुशी का अवसर जो आया था इसके पूर्व तो प्रकाश जी की गंभीर बीमारी ने पूरे परिवार को महीने भर दुखी और चिंतित कर दिया था। प्रकाश जी की एक माह पूर्व अचानक तबियत खराब हो जाने के कारण उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा जहाँ वे बोस दिन भर्ती रहे पूरे बारह दिन आइ सी यू में तथा आठ दिन सामान्य वार्ड इन बीस दिनों में उनके पूरे पंद्रह लाख रुपये खर्च हो गए थे।जिससे उनकी बेटी रोशनी की शादी के लिए जोड़ा गया लगभग सारा पैसा खर्च हो गया था । प्रकाश जी की सत्ताइस साल की नौकरी हो गई थी उनकी बेटी रोशनी की शादो अगले माह होने वाली थी इसके लिए उन्होंने पंद्रह लाख रुपये ...

कहानी: संरक्षण

आलोक और रवीना की शादी को अभी ग्यारह साल भी पूरे नहीं हुए थे और वे पिछले दस सालों से अपनी बुआ कुसुम कसंम के सरक्षण में रह रहे थे आलोक का बेटा मोहित और बिटिया मोनिका कांवेण्ट स्कूल में पढ़ रहे थे आलोक की बाजार में रेडीमेड कपड़ों की दुकान थी। रवीना अपनी बुआ सास कुसुम को बहुत मानती थी क्योंकि उन्हीं की बदौलत आज वो जीवित थी वरना कब की जलाकर मार दी गई होती। आज के ही दिन बुआ उनको अपने यहाँ लेकर आईं थीं उनका मकान बहुत बड़ा था उसके एक हिस्से में उन्होंने आलोक एवं रवीना के रहने की व्यवस्था की थी फूफाजी ने जो दुकान किराये पर दे रखी थी वो खाली कराकर आलोक की दुकान खुलवाई थी जिसका किराया वो आज तक नहीं लेते थे कहते थे ये दुकान तुम्हारी है तुम इसके मालिक हो फिर किराया कैसा। आलोक की रवीना से शादी कराने में भी कुसुम बुआ की बड़ी भूमिका था रवीना की मम्मी टीना कुसुम की बचपन की सहेली थी रवीना के पापा अशोक भी कारोबारी थे रवीना पढी लिखी और खूबसूरत लडकी थी आलोक भी सुदर्शन नवयुवक था कुसुम बुआ के कहने पर ही रवीना का रिश्ता आलोक से तय हुआ था। कुसुम ने रवीना की मम्मी को पूरा आश्वासन दिया था कि वे रवीना क...

कहानी: रिश्ते की डोर

राजेश निशा की आज शादी की पच्चीसवीं सालगिरह थी जो उन्होंने बड़ी धूमधाम से मनाई थी। उनके बेटे रोहन ने  भी अपना एम बी ए पूरा कर लिया था और उसे अच्छा पैकेज मिला था जबकि अभी उसकी उम्र मात्र तेईस वर्ष ही थी। बेटी अमिता का बी एस सी, बी एड कंपलीट हो गया था तथा वो सरकारी स्कूल में नौकरी के लिए प्रयासरत थी। आज राजेश और निशा की रिश्ते की डोर बहुत मजबूत थी पर आज से बीस साल पहले यह डोर टूटते-टूटते बची थी। पच्चीस साल पहले जब निशा और राजेश की शादी हुई थी तब राजेश शिक्षा विभाग में एल डी सी के पद पर कार्यरत थे जबकि निशा के पिता सुरेशचंद्र भाई राकेश सुपर स्टोर चलाते थे। उनका जमा-जमाया व्यापार था अच्छी कमाई होती थी तथा परिवार आर्थिक रूप से सुदृढ़ था। दूसरी ओर राजेश के पिताजी रमेश और भाई दिनेश सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। उनका जीवन स्तर साधारण था। शादी के बाद निशा को अपनी ससुराल का रहन-सहन समझ में नहीं आया। वह सोचती ये लोग इतने कम पैसे में कैसे अपना गुजारा करते होंगे जबकि वे सब आराम से अपना जीवन यापन कर रहे थे। एक दिन निशा ने राजेश से पूछा आपको कितनी तनख्वाह मिलती है। जब राजेश ने अपनी तनख्वाह बताई तो स...

कहानी: पति के मरने के बाद

सुरेखा के पति रामप्रकाश रायनगर के धनाढय व्यक्तियों में से थे उनका निधन हुए मात्र दस वर्ष ही हुए थे और उनका परिवार घोर,निर्धना के साथ जीवन यापन कर रहा था। सबसे बुरी हालत सुरेखा की थी वो मंदिर के सामने भीख माँगकर अपना पेट भर रही थी। एक जमाने में उसके बड़े रुतबे थे हज़ार दो हज़ार रुपयों को तो वो ऐसे ही खर्च कर देती आज रुपये दो रुपये की भीख माँग रही थी। दो दिन वो बीमार रही तो कोई छोज खबर लेने वाला नहीं न उसे खाना नसीब हुआ आज जब हिम्मत कर के आई तब थोड़े पोहे खाकर उसने अपनी भूख मिटाने का प्यास किया था। सुरेखा को कभी कभी दस वर्ष पूर्व पति के साथ बिताए सुनहरे दिन बहुत याद आते थे उसके पति राम प्रकाश जी नगर के बड़े व्यवसायी थे खूब जमीन जायदाद ये सब उन्हें विरासत में नहीं मिला था उनकी अपनी मेहनत की कमाई थी सुरेखा से जब उनकी शादी हुई तब उनका कारोबार अच्छा चल,रहा था सुरेखा निर्धन परिवार की लडकी थी यहाँ सब हरा भरा देखकर उसे हैरत होती थी वो यहाँ पर पैसों में हेराफेरी कर अपने मायके वालों की मदद तो करती ही थी ऊपर से भी पति पर दवाब डालकर बहुत से रुपये खर्च कराती थी शादी के पाँच सालों में वो द...

कहानी: बुढ़ापे में शादी

सुरेश की उम्र बहत्तर वर्ष की थी और उनकी कुसुम से शादी हुए आज पूरे छः वर्ष हो गए थे। कुसुम की उम्र सत्तर वर्ष की थी उन्होंने अपनी शादी की छठवीं वर्षगाँठ बड़ी धूमधाम से मनाई थी। उन्हें खुशहाल देखकर सभी खुश थे, सभी ने उन्हें बधाई दी थी। दोनों बुढ़ापे में एक दूसरे का सहारा बने हुए थे। दोनों को ही पेंशन मिल रही थी। इसलिए पैसे की उनके पास कोई तंगी नहीं थी, दोनों अच्छा जीवन जी रहे थे। कुसुम और सुरेश की मुलाकात सात वर्ष पूर्व नेहरू पार्क में हुई थी। तब कुसुम तिरेसठ वर्ष की थी। वो पंजीयन विभाग में बड़े बाबू के पद से रिटायर हुई थी। रिटायर हुए उसे तीन वर्ष हो गए थे। वहीं सुरेश आबकारी विभाग में एकाउण्टेंट थे। उन्हें रिटायर हुए पाँच वर्ष हो गए थे। कुसुम और सुरेश सुबह रोज घूमने जाते थे। वहाँ से नेहरू पार्क में कुछ देर बैंच पर बैठते थे। इसके बाद अपने घर आ जाते थे। दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला तभी शुरू हुआ था। कुसुम ने बताया कि वो अकेली रहती है। उसकी बेटी कामना तथा बेटे कमल आस्ट्रेलिया में रहते हैं, वे वहीं सेटल हो गए हैं, उनके अपने अपने परिवार हैं। कुसुम के पति कमल...

कहानी: मुनीम सेठ

मुनीम सेठ जी के नाम से विख्यात सतेन्द्र शर्मा आज की स्थिति में किशनगंज के सबसे बड़े गल्ला मर्चेन्ट थे। उनका करोड़ों रुपयों का बिजनिस, खुद के ट्रक थे, गोदाम था वेयरहाउस था। वे किशनगंज के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति थे। किशनगंज कृषि उपज मंडी का साठ प्रतिशत अनाज वे ही खरीदते थे। मण्डी के पास ही उनकी दाल मिल भी थी। उनकी उम्र पचास वर्ष की हो गई थी। उनके दोनों बेटे नीरज और धीरज उनके साथ ही कारोबार में हिस्सा बँटाते थे। आज सतेन्द्र जी का जन्म दिवस था। जिसे पूरे नगरवासियों ने धूमधाम से मनाया था। आज उन्हें यह सुखद अहसास हुआ था कि वे नगरवासियों के कितने अधिक चहेते हैं। हर वर्ग के लोग उन्हें चाहते थे। इसका एक बडा कारण यह भी था कि नगर में कोई ऐसा घर बाकी नहीं था जिसके कभी मुनीम सेठ काम न आए हों। मुनीम सेठ सतेन्द्र जी को किशनगंज में अपना कारोबार करते हुए पूरे बीस वर्ष हो गए थे। इन बीस वर्षों में वे शून्य से शिखर तक पहुँच गए थे। इसके पहले वे भोपाल के गल्ला व्यापारी मोहन दास गोयल के यहाँ मुनीम का काम करते थे। सतेन्द्र जी पास के गाँव दीवड़िया के रहने वाले थे। दीवड़िया के हायर सेकेन्ड्री...

कहानी: वैज्ञानिक प्राइमरी शिक्षक

रामबाबू वर्मा जो एक ग्रामीण अंचल के गाँव ताजपुर की प्राथमिक शाला में प्राथमिक शिक्षक थे उन्हें छः माह पूर्व राष्ट्रीय विज्ञान मेला में प्रथम पुरुस्कार मिला था तभी से वे चर्चित हो गए थे और इन छः महीने में वे जमीन से आसमान में पहुँच गए थे। अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान सभा ने उन्हें अपना फैलो बनाया था। उनके शोध विश्वस्तरीय विज्ञान पत्रिकाओं में छप रहे थे। एक दर्जन विश्वविद्यालयों ने उन्हें पी एच डी की उपाधि प्रदान की थी तथा नोबल प्राइज के लिए उन्हें नामित किया गया था। आज रामबाबू वर्मा किसी पहचान के मौहताज नहीं थे। श्री वर्मा का प्रारंभिक जीवन गाँव में ही बीता था। ताजपुरा में उनके पिता हरीश बाबू प्राथमिक शिक्षक थे। रामबाबू ने एम एस सी फिजिक्स के अंतिम सेमिस्टर की परीक्षा दी ही थी कि अचानक गाँव से दुखद संदेश आया कि उनके पिताजी का हार्ट अटेक के कारण दुखद निधन हो गया था। वे तुरंत गाँव आए पिताजी की उत्तर क्रिया की तथा फिर पिताजी के फंड निकलवाने में व्यस्त हो गए। उन्हें शासन ने अनुकंपा नियुक्ति तो दी पर एम एस सी गोल्ड मेडलिस्ट होने के बाद भी उन्हें प्राथमिक शिक्षक ही बनाया। वे पूर...

कहानी: नपाध्यक्ष

सतीश नागर लगातार चौथी बार बड़ागाँव नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गए थे जबकि इस चुनाव में उनके विरोधी दिनेश बड़कुल ने पानी की तरह पैसा बहाया था फिर भी उसकी करारी हार हुई। दुष्प्रचार, झूठी अफवाह का भी कोई लाभ नहीं हुआ था। श्री नागर फिर भी भारी बहुमत से जीत गए थे। सतीश नागर तीस साल पहले जब बड़ागाँव में ग्राम पंचायत सचिव थे तब उन्हें अपनी ईमानदारी के कारण नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। इसकी लोगों में बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी जिसने उन्हें जनता में लोकप्रिय बना दिया था। तीस साल पहले बड़ागाँव अंचल का सबसे बड़ा गाँव था जिसकी जनसंख्या आठ हज़ार थी। उस समय सतीश नागर पंचायत के सचिव थे तथा मदनलाल नवनिर्वाचित सरपंच। उस समय मदनलाल को लोगों ने इसलिए वोट दिया था क्योंकि वो जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गए थे कि वो ईमानदार हैं और अपने पद पर ईमानदारी से काम करेंगे। पर जीतने के बाद मदनलाल के तेवर बदल गए थे। इससे सतीश नागर जो एक ईमानदार सचिव थे पशोपेश में पड़ गए थे कि वे किसका साथ दें। मदनलाल ने पदभार ग्रहण करने के बाद ही भ्रष्टाचार की शुरूआत कर दी थी। गाँव में नाली का निर्माण हो रहा था उसके ठ...

कहानी: दुख में न कोई

रामस्वरूप का एक्सीडेन्ट हुए पूरे आठ माह हो गए थे लेकिन अब भी वो पूरी तरह से चल फिर नहीं सकता था। ट्राइसायकिल से अपनी गुमठी पर जाता और दिन भर वहीं रहता जो भी बिक्री होती उससे बमुश्किल अपनी गुजर बसर कर रहा था। जबकि वो एक हार्ट पेशेन्ट के साथ साथ डायबिटीज का मरीज भी था। जिनके कारण उसका एक्सीडैन्ट हुआ था उन्होंने तो खोज ख़बर तक नहीं ली थी। उसकी पत्नी सरला अब पछता रही थी अगर उसने पहले यह सोच लिया होता तो वो कभी ऐसी गलती नहीं करती। आठ माह पहले की बात है जब रामस्वरूप एक कारखाने में सुपरवायजर था। उसे अच्छी तनख्वाह मिल रही थी बड़ा लड़का नीरज एक कंपनी में नौकरी कर रहा था और वो जयपुर में अपनी पत्नी निर्मला के साथ रह रहा था। बेटी विमला की शादी भी हो गई थी और वो अपने ससुराल में थी। रामस्वरूप के साले रवि की शादी हो रही थी साले की पत्नी पलक उसके घर शादी का निमंत्रण देने आई तो रामस्वरूप से बोली शादी मैं आपको जरूर आना है रामस्वरूप बोले मैं रात को कहीं आता जाता नहीं हूँ। मेरी दोनों आँखों में मोतियाबिंद है। रात में मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। इस पर वह बोली आना तो आपको पड़ेगा ही चाहे कैसी भी आओ अगर नहीं ...

कहानी: बाल मेला

रतनपुर की कन्या माध्यमिक शाला में पहली से आठवीं तक छात्र संख्या कुल पचपन होने के बाद भी बाल मेला का आयोजन सफल रहा था सभी ब्च्चे खुश थे प्रधानाथ्यापक आर के वर्मा भी संतोष का अनुभव कर रहे थे पिछली साल इस शाला में दो सौ छात्र छात्रा अध्ययनरत थे नौ शिक्षक कार्यरत थे तब भी बाल मेला इतना सफल नहीं रहा था जितना सफल,आज का आयोजन हुआ था। पिछले साल रतनपुर का हायर सेकेणडरी स्कूल सी एम राइज स्कूल बन गया था रतनपुर की बालक माध्यमिक शाला को सी एम राइज में मर्ज कर दिया गया मगर कन्या माध्यमिक शाला को छोड़ दिया गया फिर भी परिणाम उल्टा ही रहा कन्या शाला के बच्चे बड़ी संख्या में टीसी लेकर सी एम राइज स्कूल में प्रवेशित हो गए जिससे छात्र संख्या तेजो से गिरी कक्षा एक में तो मात्र दो ही एडमीशन हुए थे। कई कक्षाओं में तो दस से भी कम छात्र बचे थे इसके कारण दो मध्यान्ह भोजन बनाने वाले रसोइयों की नौकरी चली गई थी नौ में से चार शिक्षकों का अतिशेष में तबादला हो गया था सी एम राइज के भवन के निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा था भवन बन जाने पर यह स्कूल भी मर्ज होने वाला था। जो शिक्षक कार्यरत थे वे भी यह मानकर चल...

कहानी: जिम्मेदारी

मनोज की उम्र अभी बीस वर्ष की भी नहीं हुई थी और वो परिवार की पूरी जिम्मेदारी निभा रहा था पिछले महीने ही उसने अपनी बड़ी बहन तेइस वषीया सुमन की शादी की थी जिसमें खूब दहेज दिया था मनोज के पिताजी शंकर लाल का निधन डेढ़  वर्ष पूर्व  एक सड़क दुर्घटना में हो गया था था तब मनोज की उम्र अठारह साल की थी ।  उसने इस उम्र में  ही अपने परिवार का सारा बोझ अपने कंधे पर ले लिया था। मनोज के पिता शंकरलाल लोडिंग ऑटो चलाते थे उन्होंने दीपावली पर एक और लोडिंग ऑटो खरीदा था उसका कारण यह था कि मनोज तीन साल से लगातार नवमी कक्षा में फेल हो रहा था चौथे साल उसे स्कूल से निकाल दिया गया था। स्कूल से निकाले जाने से शंकर लाल मनोज पर खूब गुस्सा हुए तो मनोज ने भी कह दिया कि पढ़ना लिखना अपने बस का नहीं है। आप तो हमें  कहीं काम पर लगा दो। शंकरलाल जी को मनोज की बात कुछ जमी  और उन्होंने दीपावली पर एक और लोडिंग ऑटो खरीद लिया तथा एक सप्ताह में मनोज को ऑटो चलाना सिखा दिया । इस पर शंकरलाल बोले कि जब तू एक हफ्ते में अच्छी तरह लोढिंग ऑटो चलाना सीख सकता है तो पढाई में इतना फिसड्डी क्यों है मनोज ने इसका को...

कहानी: टेक्सी ड्राइवर

पिछले साल तक सतीश टेक्सी ड्राइवर था उसे मात्र पन्द्रह हज़ार रुपये वेतन मिल रहा था जिसमें उसके परिवार की गुज्रर बसर मुश्किल से चल रही थी पिछली दीपावली पर उसके मालिक सोहन ने उसके सामने एक प्रस्ताव रखा था जिसमें उसे या तो तीस हज़ार रुपये बोनस लेना था । या फिर उसको डाउन पेमेन्ट मानकर पन्द्रह हज़ार रुपये प्रतिमाह की किश्त पर वही टेक्सी खरीद लेना था जिसका वो ड्राइवर था। सतीश ने मालिक की बात मानकर वो टेक्सी ख़रीद ली जो उसके लिए लाभ का सौदा सिद्ध हुई आज वो उस टेक्सी की किश्त तो अदा कर ही चुका था। बल्कि इस दीपावली पर उसने एक नई टेक्सी भी खरीद ली थी। और इसके साथ ही एक ड्राइवर को भी रोज़गार दे दिया था। सतीश जब टैक्सी ड्राइवर था तब उस की सोच यही थी की टेक्सी मालिक बनना उसके लिए असंभव है उसकी किस्मत में तो ड्राइवरी है पर जब टेक्सी मालिक सोहन ने उसे टेक्सी बेचने की बात कही तब उसने उसे मान तो लिया पर मन में यही डर था कि अगर टेक्सी नहीं चली तो हर महीने की पन्द्रह हज़ार रुपये की किश्त कैसे अदा करेगा और परिवार का खर्च कैसे चलाएगा लेकिन ऐसी कभी नौबत नहीं आई शुरू दिन से ही उसे काम ...

कहानी: पुनर्मिलन

मोहन लाल का अपनी पत्नी राधिका से समझौता होने पर एक साल बाद पुनर्मिलन हुआ था। इस मेल से जहाँ मोहनलाल और राधिका ख़ुश थे वहीं दोनों बच्चे रोहन और सोनम भी बहुत खुश नज़र आ रहे थे। एक छोटे से झगड़े ने इतना तूल पकड़ा कि वे साल भर अलग रहे। बच्चे कभी पिता के यहाँ तो कभी मायके में रहे, साल भर तक उन्हें माता पिता का एक साथ सानिध्य नहीं मिला था। साल भर पहले सिर्फ एक छोटी सी घटना घटी थी। तब मोहनलाल जानपुर जोड़ पर स्थित एक ढाबे पर रात के ग्यारह बजे अपने साले रवि के साथ खाना खा रहा था। रवि के पास टेक्सी थी जिसे वो इंगेज पर चलाता था। जबकि मोहनलाल मिस्त्री का काम करता था। रवि खाने के साथ ही शराब भी पी रहा था। उसने मोहनलाल से भी शराब पीने का आग्रह किया जिसे मोहनलाल ने नकार दिया। फिर रवि ने जिद पकड़ ली की जीजा शराब तो तुम्हें पीनी पड़ेगी। मोहनलाल ने सख्ती से मना कर दिया तो रवि ने गुस्से में आकर शराब की बोतल से गाड़ी के काँच पर जोर से प्रहार किया। इससे टेक्सी का फ्रन्ट का काँच टूट गया और रवि का हाथ भी लहूलुहान हो गया। रवि नशे मे धुत होकर मोहनलाल को गाली देने लगा था। मोहनलाल खुद को संयत कर रवि को गाड़ी...

कहानी: बागवानी छोड़कर

लखन बागवान ने जबसे बागवानी छोड़कर सब्जी फल फूल की दुकान लगाई थी तभी से वो सुखी और संपन्न जीवन जी रहा था। यह दुकान लगाए उसे तीन ही साल हुए थे और इस बीच उसने पक्का मकान भी बना लिया था और इस दीपावली पर नई कार भी खरीद ली थी। जबकि जब वो बागवानी करता था तब कर्ज में ही डूबा रहता था और हमेशा आभावों का जीवन जीता था। इस बार लखनलाल एवं उसके परिवार ने दीपावली का पर्व धूमधाम से मनाया था। लखन बागवान के पास तीन एकड़ जमीन थी जिस पर वह तीन साल पूर्व तक फल, फूल और सब्जी उगाता था। तथा सब्जी मंडी में नीलामी में बेचकर अपना गुजर बसर करता था। एक बार की बात है वो तीन कट्टी हरी मिर्च नीलामी में बेचकर आया था जो बीस रूपये किलो के भाव से बिकी थी। सब्जी मंडी के बाहर उसने उत्सुकतावश फुटकर विक्रेता से हरी मिर्च का भाव पूछा तो उसने बताया ले लो सस्ती ही है सिर्फ दस रुपये कि सौ ग्राम। लखन ने हिसाब जोड़ा यानि सौ रूपये किलो। पाँच गुना अधिक दाम वो भी चंद कदम की दूरी पर जबकि वो अच्छी तरह जानता था कि सब्जी कितनी मेहनत से उगाई जाती है और लागत भी बहुत लगती है मगर दाम कभी अच्छे नहीं मिलते...

कहानी: भानजे की किराना दुकान

राकेश अग्रवाल की न्यू बस स्टेण्ड के पास किराने की दुकान थी। यह दुकान कालका नगर की सबसे अच्छी दुकान मानी जाती थी। दुकान सुबह आठ बजे खुलती थी और रात के दस बजे तक बंद होती थी। इस बीच दुकान पर ग्राहकों का ताँता लगा रहता था। राकेश अग्रवाल बड़ा बाजार में स्थित मूलचंद किराना स्टोर्स के प्रोपरायटर मूलचंद के भानजे थे। मूलचंद जी की किराना दुकान नब्बे साल पुरानी थी जबकि राकेश को दुकान खोले हुए अभी दस साल ही हुए थे मगर फिर भी वे शहर के प्रमुख किराना व्यवसायी थे। राकेश दस साल पहले तक अपने मामा मूलचंद की किराना दुकान पर काम करते थे। मूलचंद अपने भानजे राकेश को उस समय अपनी बहन विमला से लाए थे जब  राकेश जी की उम्र ग्यारह साल की थी और उन्होंने पाँचवी की परीक्षा पास कर ली थी। उस समय मूलचंद जी की अपनी संतान नहीं थी। राकेश स्कूल से आने के बाद दुकान पर आ जाते और अपने मामा के काम में हाथ बँटाते थे। राकेश जी के हायर सेकेण्डरी पास होने के बाद मूलचंद जी ने उनकी पढ़ाई छुड़वा दी थी। अब वो पूरे समय किराने की दुकान पर रहकर काम करते थे। मूलचंद की दो संतान हुई थीं जिसमें बेटी का श्वेता तथा बेटे का नाम स...

कहानी: नगर पालिका अध्यक्ष

कैलाश नगर की वृंदावन कॉलोनी की सोसायटी के अध्यक्ष रहे गोकुल प्रसाद वर्तमान में नगर पालिका अध्यक्ष थे वे जिस नगर पालिका के अध्यक्ष थे कभी वहाँ वे बड़े बाबू हुआ करते थे उन्हें अध्यक्ष बने दो साल हो गया था इन दो सालों में उन्होंने कैलाश नगर की कायापलट करके रख दी थी। आज उनसे मिलने वृंदावन सोसायटी के अध्यक्ष श्याम कुमार तथा पदाधिकारी मिलने आए थे । तथा बड़े सम्मान से उनसे बात कर रहे थे उनमें से कुछ उनके पुराने साथी भी थे जो उनसे अपने व्यवहार पर माफी भी माँग रहे थे। गोकुल प्रसाद तीन साल पहले वृदावन कॉलोनी की सोसायटी के अध्यक्ष थे उन्होंने अपने कार्यकाल में सोसायटी का खूब विकास किया था एक रुपये का भी गलत उपयोग नहीं किया था । मगर एक घटना ने उनका दिल तोड़ दिया था ।हुआ ये था कि गोकुल प्रसाद पहले नगपालिका में बड़े बाबू थे वृंदावन कॉलोनी के एम आई जी मकान में वे रहते थे नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद जब कॉलोनी में सोसायटी का गठन हुआ तब कोई आगे नहीं आया ऐसे में गोकुल प्रसाद जी ने सोसायटी का कार्य सम्हाला सभी ने उन्हें अध्यक्ष बना दिया था गोकुल,प्रसाद जी ने रात दिन एक करके कॉलोनी में विकास कार...

कहानी: वी आर एस

अभिषेक और आशीष दोनों बचपने के दोस्त थे दोनों के पिता रोशन लाल और सोहन लाल का निधन छः महीने पहले हो गया था वे दोनों भी दोस्त थे तथा रेल्वे में नौकरी करते थे आशीष के पिता सोहनलाल के निधन पर आशीष को अनुकंपा नौकरी मिल गई थी लेकिन अपने पिता की एक चूक के कारण अभिषेक अनुकंपा नौकरी से वंचित रह गया था और अब भी बेरोजगार था।कारण यह रहा कि अभिषेक के पिता रोशन लाल ने अपने निधन के एक महीने पहले वी आर एस ले लिया था स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेने के कारण वे सेवारत नहीं माने गए जिस के कारण अभिषेक को अनुकंपा नौकरी नहीं मिल सकी थी। और माँ की पैंशन भी आधी हो गई थी घर की आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी। रोशनलाल और सोहनलाल बीना जंक्शन में कार्यरत थे दोनों ही लोको पायलट थे वे आपस में गहरे दोस्त थे दोनों को शराब पीने की लत थी रोज शाम को दोनों खूब शराब पीते थे इससे उनके परिवार के लोग परेशान थे कई बार इसको लेकर घर में विवाद भी होता था फिर भी उनकी शराब की लत नहीं छूटती थी अब तो यह हालत हो गई थी कि वे दिन में भी शराब पिए बिना नहीं रहते थे शराब ने उनकी कार्यक्षमता पर असर डालना शुरू कर दिया था रोशनलाल को दमे की ब...

कहानी: ढोलकिया की वापसी

सुखलाल कस्बे के सबसे अच्छे ढोल एवं ढोलक बजाने वाले के रूप में विख्यात थे उनकी पूरी टीम थी कस्बे में जितने ढोल एवं ढोलक बजाने वाले थे सब उनके शिष्य थे और उन्हें बहुत मानते थे। इसके बावजूद भी उनसे अच्छा ढोल बजाने वाला दूर दूर तक कोई भी नहीं था उनकी उम्र सत्तर वर्ष की हो गई थी मगर देखने में वे पचास के लगते थे छः महीने उन्हें उनका लडका राजेश अपने साथ भोपाल ले गया वहाँ उनका बेटा और उनकी बहू सरकारी नौकरी करते थे दोनों यह कहकर उन्हें अपने साथ ले गए थे कि आपने जिंदगी भर बहुत काम किया है अब हमें भी सेवा का अवसर दो । मगर छः महीने में ही वे वापस अपने कस्बे में आ गए थे। सुखलाल जी ने अपना छः महीने से बंद पड़ा घर का ताला खोला वहाँ रखे अपने ढोल देखकर उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई उनके आने की ख़बर उनके शिष्यों को जैसे ही लगी सभी बहुत ख़ुश हुए क्योंकि सब उनकी कमी महसूस कर रहे थे आते ही पूरे एक घंटे तक उन्होंने रियाज किया था तब कहीं उनके मन को संतोष मिला था जो छः महीने उन्होंने अपने बेटे के घर बिताए थे वे एक एक दिन उनका बहुत भारी बीता था शुरू के चार पाँच दिन तक तो वे ठीक से रहे बाद में पता चला की राज...