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फ़रवरी, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: चोरी से पढ़ाई कर बनी आई ए एस

आई ए एस सुरेखा  जो कृषि उपज मंडी बोर्ड की निदेशक थीं,  ने अपनी कार्यकुशलता एवं प्रतिभा  से बोर्ड में  कई नवाचार किए थे, अनेक पेंडिंग कार्य पूरे कराए थे। जो फाइलें वर्षों से लंबित थीं उनका निपटारा किया था। ऐसी ही एक फाइल और थी जिसमें पाँच वर्ष से दैनिक वेतन भोगी के रूप में काम कर रहे कई मंडी कर्मचारियों के नियमितीकरण की फाइल थी।  सुरेखा ने उसका त्वरित निराकरण कर पूरे प्रदेश के एक हजार मंडी कर्मचारियों को नियमित नियुक्ति प्रदान की थी। उसमें उनका भाई सुरेश भी शामिल था जो स्थानीय कृषि उपज मंडी में  बारह हजार रुपये मासिक के वेतन पर नीलामी में बोली लगाने का काम पिछले पाँच वर्षों से कर रहा था। सुरेखा के चेहरे पर आज संतुष्टि के भाव थे। उन्होंने पूरी ईमानदारी से ये कार्य किया था। बोर्ड के अध्यक्ष ने भी उनको प्रोत्साहन दिया था। आज सुरेश के यहाँ दीवाली जैसी खुशियाँ मन रही थीं क्योंकि नियमित नियुक्ति के बाद उसका वेतन बारह हजार से बढ़कर बत्तीस हजार  रुपये प्रतिमाह हो गया था। इस खबर से पिताजी छगनलाल भी बहुत खुश थे।  सुरेखा उनकी ख़ुशी में शामिल होने अपने पि...

कहानी: भिखारी का अनुदान

डॉक्टर रश्मि वारेला ने आज रोशन जी की तीसरी पुण्यतिथि  मनाई थी। उनके पति डॉ तरूण ने भी आयोजन में सहभागिता की थी। रोशन सुपर स्पेशियलिटी हाॅस्पिटल के इस आयोजन में शहर के गणमान्य लोग शामिल हुए थे। वहाँ डॉ रश्मि वारेला ने कहा था रोशन वो शख्सियत हैं जिनके कारण आज में इस मुकाम पर पहुँची हूँ, वे मेरे माता पिता से भी बढ़कर थे। वे अगर मेरी मदद नहीं करते तो मैं भी गृहिणी बनकर रह जाती।  आज जो रोशन हास्पिटल की प्रसिद्धि है उसमें उनका आशीर्वाद समाया हुआ है। इस अवसर पर डॉ  रश्मि ने कई कल्याण योजनाएँ शुरू की थीं। यही उनकी सच्ची श्रद्धाँजलि भी थी। रोशन एक साधारण से भी साधारण इंसान थे। आज से बीस वर्ष पूर्व की उनकी मदद ने रश्मि का जीवन बदल दिया था। रश्मि ने उन दिनों जीवविज्ञान विषय से बारहवी में स्कूल में टॉप किया था। उनके सत्यासी प्रतिशत अंक आए थे। रश्मि के पिताजी  दूसरे के खेतों हाली का काम करते थे। परिवार की आर्थिक हालत बहुत ख़राब थी। रश्मि के पिता कुँजीलाल ने रश्मि को आगे पढ़ाने से इंकार कर दिया था। तथा रश्मि की शादी एक सजातीय युवक नीरज से करने का मन में विचार किया था। नीरज सरकारी ...

कहानी: ऐसे जीता सरपंच का चुनाव

सौम्य,स्वभाव के सौभाग्यमल चौथी  बार गाँव जमोनिया के सरपंच चुने गए थे आज उनका भव्य जुलूस निकला था। इस बार मुकाबला बहुत कड़ा था। शुरू में  सबको उनकी हार नजर आ रही थी मगर बाद में समीकरण उलट गए और उन्होंने भारी बहूमत से इस बार फिर जीत हासिल कर ली थी। हारा हुआ प्रत्याशी  दिलीप सिंह मुँह की खाए बैठा था उसकी चालाकी शातिरता धौंस दपट दादागिरी सब फेल हो गई थी चुनाव में जो रुपया पानी की तरह बहाया था वो भी बेकार हो गया था। इस बार दिलीपसिंह सौभाग्यमल को बुरी तरह हराने की रणनीति बनाकर चुनाव मैदान में उतरा था। स्थानीय विधायक जिनका क्रिमिनल रिकार्ड था वो दिलीप सिंह का खुलकर समर्थन कर रहे था। उन्होने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर दिलीप सिंह की हर प्रकार से सहायता की थी। जब वोटर लिस्ट तैयार हो रही थी तब  संबंधित  अधिकारी पर दवाब डालकर दो सौ बाहरी लोगों के नाम सूची में जुड़वा दिए थे। जब वे अधिकारी आनाकानी करने लगे तो दिलीप सिंह ने उन्हें डराया धमकाया जब वे नौकरी पर खतरे की बात करने लगे  तो दिलीप सिंह ने विधायक से कहलवाया कि नौकरी की चिंता मत करो नौकरी अगर चली गई तो सहकारी बैंक म...

कहानी: अपनों से दूर

शांति देवी और देवेन्द्र  को  बमूलिया  गाँव में रहते हुए पूरे दस वर्ष  हो गए थे इन दस वर्षों में वे दस एकड़  कृषि भूमि के मालिक  बन गए थे गाँव में ही उनका पक्का मकान बन गया था। ट्रेक्टर भी था और जीप भी उनके पास थी अब उनकी गिनती गाँव के संपन्न किसानों में होती थी।  शांति देवी जब गाँव  में शिशु केन्द्र खुला तब शिशु शिक्षिका बनकर आई थीं  उनका बेटा दीपक चार साल का था और बेटी अंजू एक साल की वे अपने दो छोटे बच्चों के साथ अजनबियों के बीच बिल्कुल अकेली थीं उनकी शिशु सहायिका रामवती  उसी गाँव की थी और,अच्छे स्वभाव की महिला थी उसने शाँति देवी को अपनी बाखल में रहने को घर दे दिया था। शाँतिदेवी काफी मिलनसार और भली महिला थीं वो थोड़े दिनों में ही सबसे घुल मिल गईं।  थीं। शाँति देवी का पति देवेन्द्र झगड़ालू किस्म का इंसान था जेब में छुरा रखकर घूमता था। उससे उसके परिवार वाले भी परेशान थे शाँति देवी जैसी भली महिला से शादी होने के बाद बी वो नहीं सुधरा था। उसकी बैठक शहर के नामी गिरामी बदमाशों के बीच थी। उसी दौरान शहर में एक और दबंग बिल्लू की हत्या हो गई ...

कहानी: तलाक के बाद

रागिनी आज वृद्धाश्रम एवं अनाथाश्रम का संचालन कर रहीं थी। वहीं अकेली  महिलाओं  के लिए भी होस्टल चला रही थीं, एक तो उनके पास खुद भी बहुत सी दौलत थी, दूसरे दानदाताओं से भी उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहयोग मिल रहा था। आज उनके आश्रम में जो रहने आई थी वो उनकी बचपन की सहेली थी। उसे बड़ा नाज़ था अपने घर परिवार पर, उसका नाम  रजनी था। वो रागिनी को देखकर पहले तो चौंकी, बाद में बहुत शर्मिंदा हुई। उसके पति के मरने के बाद बहू बेटों ने उसे घर से निकाल दिया था। इस आश्रम का बड़ा नाम था, जिसे सुनकर वो यहाँ रहने के लिए आई थी। पर उसे मालूम नहीं था कि रागिनी उसकी संचालिका है।  रागिनी शहर की गणमान्य नागरिक थी। उसका शहर में काफी मान सम्मान था। आश्रम में सभी उसको बहुत मानते थे। वो सबका ख्याल रखती तथा हर एक को अपने परिवार का सदस्य मानती थी। वृद्धाश्रम का संचालन करते हुए उसे बीस वर्ष हो गए थे। इस समय रागिनी की उम्र सत्तर वर्ष थी। छैयालीस वर्ष पूर्व ग्रेजुएशन करने के बाद रागिनी की शादी रविकाँत  से हुई थी। रविकाँत सरकारी नौकरी करता था, जिसमें वो था तो कार्यालय सहायक पर उसे नौकरी  पर बहुत ...

कहानी: बेबसी के बीच की खुशियाँ

सरिता आज भी निर्माणाधीन मकान में मजदूरी करने आ गई थी दो कॉलम के बीच साड़ी से बने झूले में उसका नवजात शिशु सो रहा था। जिसका जन्म कल रात को ही हुआ था। पेट में पूरे नौ माह का गर्भ होते हुए भी वो कल भी मजदूरी करने आई थी शाम को घर जाने के बाद उसे प्रसव पीडा  हुई तो उसकी बस्ती की एक मजदूर महिला ने दाई बनकर उसका प्रसव कराया उसने स्वस्थ बालक को जन्म दिया था। सुब्ह  सरिता ने उठकर कलेवा किया तथा  दोपहर के लिए भोजन तैयार कर टिफिन में रख पति शिवलाल के साथ मजदूरी करने आ गई थी।  सरिता के पिता हरखू  लकवाग्रस्त थे पर थोड़ा बहुत चल लेते थे। सरिता  के पति शिवलाल की माँ अंधी थी। सब एक साथ झुग्गीनुमा छोटे से घर में रहते थे दोनों पति पत्नी हर हाल में मजदूरी करते थे।वे एक दिन की छुट्टी नहीं ले सकते थे।वरना खाने और दवाई का जुटा पाना  मुश्किल हो जाता था। उन्हें उधार जिस साहूकार से मिलता था वो बीस प्रतिशत प्रतिमाह से ब्याज वसूलता था। इसलिए वे मजदूरी  कर के अपना गुजारा करते थे ताकि कर्ज के दलदल में फँस कर तबाह न हो जाएँ।सरिता और शिवलाल की शादी दो वर्ष पहले मुख्यमंत्री कन्य...

कहानी: इस तरह बना स्कूल का भवन

आज शाला प्रभारी श्याम मनोहर  ग्राम के सरपंच वीरेन्द्र प्रताप की लताड़ खाकर आ रहे थे इसके बाद भी वे दुखी नहीं थे क्योंकि इस लताड़ के कारण ही  वे अपनी नौकरी बचा पाए थे सरपंच भ्रष्ट काइयाँ दबंग  और बेरहम बेईमान इंसान था।तथा  उसने पूरे गाँव को दबा रखा था किसी में इतना साहस नहीं था कि उसके खिलाफ एक शब्द भी बोल दे वो किसी का भी अपमान कर सकता था। आए दिन उसके दरबार में कोई न कोई उसके हाथ से जरूर पिटता था। ऐसे में शाला प्रभारी को अगर लताड़ खाना पडी तो क्या हुआ नौकरी तो बच गई। बात चार महीने पुरानी है स्कूल के माध्यमिक शाला भवन के लिए सोलह लाख रुपये स्वीकृत हुए थे  शाला भवन  शाला प्रबंधन समिति को बनवाना था।  यह बात सरपंच वीरेन्द्र प्रताप को पता चली तो उसने शाला प्रभारी श्याम मनोहर जी को दरबार में बुलाया बड़ी आवभगत की उसकी बोली में बड़ी मिठास थी  जिससे श्याम मनोहर घबरा रहे थे। आखिर सरपंच मुद्दे पर आया। सर जो शाला भवन  के लिए राशि जारी होने वाली है  उसका एक रुपया भी मेरी इजाजत के बगैर मत खर्च कर देना। चेकबुक पूरी ब्लैंक साइन कर के मुझे दे देना भवन की...

कहानी: दबंगों की बेटी की शादी के बीच दलित की बेटी की शादी

पल्टूराम जो ग्राम के दलित वर्ग से संबंधित था, वह आज बहुत खुश था उसकी बेटी की शादी निर्विघ्न संपन्न हो गई थी। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि उसी दिन गाँव के दबंग जाति के पुष्पराज सिंह की बेटी मोनिका की भी शादी थी। ऐसे में पल्टूराम को आशंका थी कि कहीं शादी में कोई झगड़ा या विध्न खड़ा न हो जाए। गाँव के सारे दलित दबंगों पर निर्भर थे। कहीं झगड़ा हो जाता तो दलितों का गाँव में रहना मुश्किल हो जाता। पल्टूराम ने बीस वर्ष पहले ये गाँव छोड़ दिया था और शहर में आकर बस गया था शहर में उसने ज्वेलर की  दुकान पर नौकरी कर ली थी, चार महीने बाद वो अपने परिवार को लेकर शहर में आ गया था। तब उसकी बेटी मणिमाला दो साल की थी। तथा बेटा माणिक पाँच वर्ष का। पल्टूराम मेहनती ईमानदार और कर्मठ था। सेठजी के प्रति उसकी निष्ठा पर किसी को संदेह नहीं था। पल्टूराम ने शीघ्र ही सेठ सुहागमल जी का विश्वास जीत  लिया था। सुहागमल के दो बेटे थे दोनों ही बेईमान तथा मतलबी थे।  सेठजी रकम बनवाने के लिए शुद्ध सोना देते वे उसमें मिलावट कर रुपया अपनी जेब के हवाले कर लेते। इससे सेठ जी की शाख को बट्टा लग रहा था इससे बचने के लिए ...

कहानी: मुफ्त की दुकान

ग्राम चैनपुरा की शासकीय प्राथमिक शाला के प्रभारी शिक्षक ब्रजकिशोर जी  को पन्द्ह साल हो गए थे नौकरी करते हुए गाँव में एक और प्राइवेट स्कूल था। उसमें गाँव के संपन्न और ऊँची जाति के लोगों के बच्चे पढ़ते थे। जबकि गरीब णजदूरों के बच्चे  सरकारी स्कूल में शिक्षक ब्रजकिशोर जी उनके लिए मुफ्त की दुकान लगाते थे। जिसका संचालन वे स्कूल के बच्चों से ही कराते थे सामग्री लाना उनका काम था। आज दुकान पर दो सो रुपये का सामान बिका था । जिसकी कीमत वे अदा कर रहे थे बच्चों के लिए तो वो दुकान मुफ्त थी।  इन पन्द्रह सालों में सरकारी स्कूल के बच्चों ने बहुत तरक्की की थी। उनके पढ़ाए हुए बच्चे हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे थे। ज्यादातर युवकों की नौकरी लग गई थी। वे सब दलित परिवार के थे। लेकिन अब सब संपन्न होते जा रहे थे। कोई ऐसा दलित परिवार नहीं था जिसका एक भी सदस्य सरकारी नौकरी नहीं कर रहा हो। इसके कारण गाँव में खेतिहर मजदंरों का अकाल पड़ गया था। उन्हें बाहर से मजदूर लाने पड़ते थे। जो मँहगे पड़ते थे ।प्राइवेट स्कूल लूट का अड्डा था ड्रेस मँहगी कपड़ा  किताब मँहगी जूते टाई बेल्ट सब मँहगे तगड़ी फीस...

कहानी: ड्राइवर की तनख्वाह

सेवानिवृत होने जा रहे शिक्षक रामलाल से रिश्वत के रूप में पच्चीस हज़ार रुपये की रकम लेते हुए रंगे हाथों संकुल प्राचार्या सुनीता मेडम पकड़ाई थीं यह ख़बर आग की तरह चारों ओर फैल गई थी सुनीता मेडम के रिटायर मेन्ट में दो साल का समय शेष था उन्हें एक लाख साठ हजार रुपये तन्ख्वाह मिल रही थी फिर भी पच्चीस हज़ार की रिश्वत लेने के लोभ को रोक नहीं सकीं जबकि पति संजीव मेडिकल ऑफिसर थे एक बेटा रितेश  हार्ट स्पेश्लिस्ट  था बेटी  ऋचा स्त्री रोग विशेषज्ञ सबको अच्छी ख़ासी तनख़्वाह मिल रही थी । लेकिन लालच ने उनका केरियर चौपट कर दिया था। विभाग ने उन्हें सस्पेण्ड कर दिया था उनके वकील ने केस की स्टडी कर माथा पकड़ लिया था। कहा था मेडम अगर सजा हो गई तो सब कुछ चौपट हो जाएगा पुलिस ने आपके खिलाफ केस बहुत मजबूत बनाया है। सुनकर सुनीता मेम आजकल बहुत घबराई हुई थीं। सुनीता मेम शहर की कोई मामूली हस्ती नहीं थी पूरे तीस साल?तक एक्सीलेंस स्कूल में फिजिक्स की व्याख्याता रही थी। वे शहर की अच्छी शिक्षक मानी जाती थीं दो साल पहले उनका प्रमोशन शहर से बीस किलोमीटर दूर कस्बानुमा गाँव राजगाँव के हायर सेकेण्डरी  स्...

कहानी : अंतर

राम रतन और नव रतन वैसे तो दोनों सगे भाई थे लेकिन उनके व्यवहार तथा स्वभाव में जमीन आसमान का अंतर था रामरतन जहाँ साधु जैसे सरल स्वभाव के थे वहीं नवरतन मतलबी लालची तथा कुटिल स्वभाव का इंसान था। अब दोनों ही बुढ़ापे की अवस्था   के दौर से गुजर रहे थे। नवरतन जहाँ कष्टदायी जीवन जी रहा था वहीं रामरतन आज भी स्वस्थ और आनंदपूर्ण जीवन जी रहे थे। आज ही रामरतन सरकारी स्कूल के बच्चों में निःशुल्क स्वेटर का वितरण कर के आए थे। तथा आनंद का अनुभव कर रहे थे। वहीं नवरतन रीढ़ की  हड्डी में खराबी होने के कारण चलने फिरने को भी मुहताज था। और कष्टदायक जीपन जी रहा था बहू बेटे उसकी एक नहीं सुनते थे नाती पोते उसके पास फटकते भी नहीं थे दोनों बेटे दो चार दिन में एकाध बार उसे देखने आते थे और बिना कुछ कहे चले जाते थे। जबकि नवरतन  ने हर उचित अनुचित तरीके से खूब धन कमाया था। बेटों के लिए अच्छा बिजनिस खडा किया था जिंदगी में बिना स्वार्थ के कोई काम नहीं किया था नेकी करने में उसका कोई विश्वास नहीं था। फिर भी वह कोने में पड़ा  मौत के दिन गिन रहा था। एक नर्स उसकी देखरेख करती तो थी पर  उससे भी नवरत...

कहानी: साइलेंट पार्टनर

रघुवीर वर्मा को बावन वर्ष की उम्र में पता चला कि वो एक मामूली दुकानदार नहीं हैं बल्कि चार सौ करोड़ की रुपये की दौलत के मालिक हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा आज ही देश की प्रसिद्ध रूपम काॅस्मेटिक कंपनी के जनरल मेनेजर रोहित शुक्ला उनकी दुकान पर मिलने आए थे। उनसे सर कह कर बात कर रहे थे। उन्होंने ही बताया की वह रूपम कंपनी के तैंतीस प्रतिशत शेयर के मालिक हैं। तो उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ रोहित जी ने यह भी बताया की प्रतिमाह तीन से पाँच करोड़ रुपये की आय आपको होती है जो कंपनी में ही इन्वेस्ट कर दी जाती है। फिर भी आपके एकाउंट में अभी भी सत्तर करोड़ रुपये जमा है आपका खाता कंपनी के मालिक दिवाकर वर्मा संचालित करते हैं। दिवाकर वर्मा का नाम सुनकर रघुवीर जी चौंक गए बोले क्या ये वही दिवाकर जी हैं जो बत्तीस साल पहले इसी शहर में रहते थे और मेरे घनिष्ठ मित्र हैं। रोहित बोले बिल्कुल सही समझे हैं आप, उन्होंने ही मुझे आपके पास भैजा है। उनकी तबियत आजकल ठीक नहीं रहती वे आपका कारोबार आपको सौंपकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं। रोहित जी से रघुवीर जी ने काफी विस्तार से बातें की थीं इसके बाद वे घ...

कहानी: बाँटने का सुख

राजनगर के विख्यात समाज सेवी रामसुखलाल के कारण शहर में कोई ना तो रात को भूखा सोता था न फुटपाथ पर कोई ठंड से ठिठुरता नजर आता था उनके शहर में चार अस्पताल थे जो गरीबों के लिए मँहगा से मँहगा इलाज एवं चिकित्सक की सेवाएँ उपल्ब्ध कराते। उनके अस्पता के इलाज की इतनी ख्याति थी की अमीर पैसे वाले भी वहाँ इलाज कराना पसंद करते थे। और खुशी से इलाज का खर्च भी उठाते थे और बहुत सारा दान भी देकर जाते थे। आज कोई दानदाता उन्हें तीन करोड़ रुपये का दान देकर गया था दान दाता ने अपना नाम पता गुप्त रखा था। उसने टाइप किया हुआ पत्र भी दान की राशि के साथ रखा था जिसमें लिखा था यह पैसे खरी कमाई के हैं मुझे विश्वास है कि आप इस राशि का उचित उपयोग करेंगे। रामसुखलाल जी ने दान तो स्वीकार कर लिया था निर्माणाधीन  कैंसर अस्पताल के लिए उन्हें धनराशि की आवश्यकता भी थी दानदाता लाखों रुपये दान भी दे रहे थे लेकिन तीन करोड़ रुपये की राशि गुप्तदान में देने वाला उनके सामने ये पहला उदाहरण था। जी दान की राशि लाया था उससे रामसुखलाल ने हर तरह से पूछा पर वह भी रामसुखलाल को दानदाता का ना तो नाम पता बता सका ना ही हुलिया। रामसुखलाल शहर ...

कहानी: आखिर अपनाना ही पड़ा

राम शरण आज भले ही काफी धन संपन्न हों परंतु  उनका बचपन अभावों में रहकर गुजरा बारह साल की उम्र में उन्हें अपने माता पिता की उपेक्षा का शिकार  होकर घर से भागना पड़ा कई दिनों तक भरपेट खाना नहीं मिला पिता वीरसिंह को जब अपनी गलती का अहसास हुआ  तब तक रामशरण की उम्र पैंतीस वर्ष की हो गई थी और पिताजी के जीवन का अंत करीब आ गया था। आज रामशरण फाईव स्टार होटल रिसोर्ट  वाटर पार्क और डिज्नी लैंड के मालिक हैं  शहर में एक बड़ामॉल भी उनका है लेकिन एक वक्त वो भी था जब उनके खाने के भी लाले पड़े हुए थे। जब वे बहुत ज्यादा छोटे थे तब का तो उन्हें होश नहीं है लेकिन जबसे उन्होंने होश सँभाला था तबसे ही माता पिता की प्रताड़ना के शिकार होते रहे थे । जबकि रामशरण का छोटा भाई देवीशरण  बहन सुरेखा माँ बाप के खूब चहेते थे। उनके बड़े से  बड़े गुनाह भी क्षम्य थे पर रामशरण जी को छोटी गलती की भी बड़ी सजा मिलती थी। पिता वीरसिंह की नफ़रत  का एक बड़ा कारण यह भी था कि रामशरण का जन्म उनकी  शादी के सात भाह बाद ही हो गया था। हाँलाँकि कई सतमासा संतान भी जन्म लेती हैं पर वीरसिंह रा...

बस ड्राइवर

लघुकथा बस ड्राइवर संतष वर्मा एक यात्री बस के ड्राइवर थे बस शहर से ग्रामीण अंचल तक जाती थी सुब्ह आठ बजे घर से निकलते तो रात को आठ बजे घर आते थे  जिसका दैनिक वेतन उन्हें  मात्र तीन सौ रुपया मिलता था और कोई काम उनसे बनता नहीं थी ड्राइवरी करते करते उन्हें पच्चीस वर्ष हो गए थे। आज भी वे जब घर आए तो तीन सौ रुपये उन्होंने अपनी पत्नी सरला को दिए जिससे वह सामान बाजार से लाई फिर उनका चूल्हा जला रात को दस बजे खाना खाकर वे फुरसत हुए। आज संतोष जी की शुगर कुछ बढ़ी हुई लग रही थी। उन्हें कुछ घबराहट सी हो रही थी चक्कर भी आ रहे थे उन्होंने ये बात अपनी पत्नी सरला से छिपा ली थी और बिस्तर पर लेट  गए थः। बढ़ी बेटी तान्या बाइस साल की होने जा रही थी उसकी शादी करने की चिंता भी थी। उन्हें यही सोचकर नींद नहीं आ रही थी। कुछ माह पहले तक  संतोष  की कमाई से ही घर चल रहा था वे किराये के घर में रहते थे जिसका  किराया दो हजार रुपया प्रतिमाह था। नौ हजार प्रतिमाह उनकी आय थी जिसमें से दो हजार मकान किराये में खर्च हो जाते थे सात हजार रुपये इस मँहगाई के दौर में चार बच्चों के होते हुए मुश्किल से ग...

कहानी: दबंगों के बीच में

दबंगों के गाँव में रहते  हुए दलित बुद्धिजीवी डॉ रमतूलाल  ने जिस तरह अपनी प्रारंभिक पढ़ाई की थी ये वो ही जानते थे आज तो वक्त बहुत बदल चुका है जिसमें रमतू लाल जी जैसे कई दलित विचारकों का अहम योगदान हैं। डॉ रमतूलाल अपना सतहत्तरवाँ जन्मदिन मना रहे थे। जन्मदिन समारोह में सभी वर्ग के गणमान्य लोगों की उपस्थिति देख  डॉ रमतूलाल अभिभूत थे। समारोह के समापन के बाद जब वे फुर्सत में हुए तब अपने बचपन के कठिन दिनों को याद करने लगे किस तरह संघर्ष कर,वे आज इस मुकाम पर पहुँचे एक एक बात उन्हें याद आ रही थीं। जब रमतूलाल आठ वर्ष के थे तब उनके गाँव हीरापुर में सरकारी प्राइमरी स्कूल प्रारंभ हुआ था । गाँव दबंगों का था एक जाति विशेष का पूरे गाँव में दबदबा था कुछ दलितों के घर थे कुछ अन्य जातियों के लोग भी रहते थे।जो अधिकाँश दबंगों के खेतों में मजदूरी करते थे। स्कूल के शिक्षक को गाँव के पटेल ने रहने के लिए मुफ्त में मकान दिया था मकान से लगा हुआ फलदार पेड़ों का   बाग था उसी की दालान में वे स्कूल लगाते थे। स्कूल में सभी छात्र दबंगो के ही थे। कुछ छात्र पिछडा वर्ग के भी थे लेकिन दलितों का एक भ...

कहानी: जिम्मेदार कौन

राहुल की हार्ट अटेक से मौत हुए पूरे तीन साल हो गए थे। राहुल के पिता सुरेश सिंह के पास सिवाय पछतावे के कुछ नहीं बचा था उनकी करोड़ों की जायदाद का वारिस कोई नहीं  था। राहुल की मौत का वे खुद को जिम्मेदार समझने लगे थे वे अपने आपको कभी माफ नहीं कर पा रहे थे। तीन साल पहले राहुल उन्हीं के साथ उनके बड़े आलीशान मकान में अपनी पत्नी राजुल के साथ रहता था  एक छत के नीचे रहने के बावजूद भी बाप बेटे में आपस में बोलचाल बंद था राहुल,की उसकी मम्मी से भी बोलचाल बंद थी। राहुल,उस घर में ही अपने माता पिता से अलग रहता था राहुल इकलौती संतान था पिता की करोड़ों की संपत्ति का एकमात्र वारिस इसके बावजूद भी वो इतना खुद्दार था कि अपने पिता से एक रुपया,लेना भी गुनाह समझता था। राहुल की पत्नी राजुल की भी अपने सास ससुर से बोलचाल बंद थी। राहुल की अपनी अलग दुकान थी जिसमें वह खूब मेहनत करता था दुकान से उसकी अच्छी आय हो जाती थी। उसके पिताजी के शहर में आठ बड़े मकान बारह फ्लेट चौदह दुकाने और अठ्ठाइस एकड़ सिंचित जमीन,थी। पिता की अनाप शनाप आय पर राहुल का कोई हक नहीं था राहुल के पिता अहंकारी थे हमेशा अभिमान में चूर रहते क...

कहानी: दमदार खुद्दार

पूरे,दौलत पुर गाँव मे॔ चेतराम को छोड़कर  ऐसा कोई नहीं था  जो अमीरचंद के अहसानों तले या कर्ज के नीचे न दबा हो केवल चेतराम ही ऐसा था जिसने अमीर चंद से न कोई कर्ज लिया था ना ही कोई अहसान  हालात ऐसे बने की अमीरचंद को चेतराम का अहसान लेना पड़ा। हुआ यूँ कि अमीरचंद  को जोड़ों के दर्द की बीमारी ने परेशान कर दिया था उसने उसका हर संभव इलाज कराया पर उसे कोई लाभ नहीं हुआ चेतराम के पास इसका अचूक देशी इलाज था जिसके लिए वो दूर दूर तक जाना जाता था बड़ी संख्या मे उसके पास मरीज आते और उसकी देशी दवा से ठीक होकर जाते।अमीरचंद नहीं चाहता था कि चेतराम का कोई अहसान ले लेकिन बीमारी ने उसे चेतराम के पास आने को विवश कर दिया चेतराम ने उसे जो देशी दवा दी उसके  असर से उसकी बीमारी ठीक हो गई थी। चेतराम ने इसके बदले अमीरचंद से एक रुपया भी नहीं लिया था ये अमीरचंद के लिए बड़ी बात थी। जिसके जवाब में अमीरचंद ने इतना ही कहा कि कभी रुपयों की जरूरत पड़े तो आ जाना तुम्हें बिना ब्याज एवं जमानत के कर्ज दूँगा जिसकी वसूली के लिए कभी तकाजा नहीं करूँगा। चेतराम मुस्कुराकर रह गया था मन ही मन सोच रहा था भगवान क...

कहानी: गरीबी में गीला आटा

नंदराम बागवान की बाड़ी में लगी ट्यूब वेल की मोटर चोरी हो गई थी गरीब नंदराम को बीस हजार,रुपये की चपत लगी थी जिसने उसे तोड़कर रख दिया था पुलिस में रिपोर्ट लिखाने के बाद भी न तो मोटर मिली न चोर पकड़ाए आज नंदराम ने कर्ज लेकर नई मोटर खरीदी थी उसे बोर में,डलवाई तब कहीं वो बाड़ी में लगी बची खुची सब्जियों की सिंचाई कर पाया था इसिलिए आज उसके चेहरे पर पूरे एक महीने बाद संतोष के भाव दिखाई दे रहे थे। नंदराम के सितारे पिछले तीन महीनों से गर्दिश में चल रहे थे।  सबसे पहले उसके बाड़ी के घर में चोरी हुई इसके कुछ दिन बाद उसकी दुधारू गाय भी अज्ञात चोर चुराकर ले गए थे  फिर उसकी पत्नी सरोज घर की सफाई करते समय गिर गई जिससे उसके पाँव की हड्डी टूट गई थी इसके बाद बोर से मोटर की चोरी ने उन्हें तोड़कर रख दिया था घर की हालत वैसे ही खराब थी ऊपर से ये चपत उन्हें भारी पड़ी थी घर में मातम छाया हुआ था। घर का एक एक सदस्य रो रहा था तीन दिनों से किसी के गले से रोटी का एक  निवाला भी नहीं उतरा था। आज जब पूरे एक महीने बाद दुबारा बोर में मोटर डली और सिंचाई हुई तब नंदराम की उम्मीदें फिर से जाग उठी थीं। नंदराम ने...

कहानी: सात साल की कानूनी लड़ाई के बाद मिला बेवा को हक

पति के दःखद निधन के पूरे सात साल बाद  विधवा सावित्री को  कानूनी लड़ाई लडने के बाद खेती एवं मकान पर हक मिला था। जिसमें पूरी तरह  जमीन तो उसे दो साल बाद कब्जे में मिली थी आज उसके खेत से गेहूँ की उपज उसके घर आई थी चार एकड़ में पूरे सौ क्विंटल गेहूँ हुए थे आधा एकड़ जमीन में वो सब्जियों की खेती कर रही थी जिससे उसे रोज अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही थी एक गाय पाल रखी थी जिसका दोनों समय का छःलीटर दूध वो डेरी में दे रही थी वो भी उसकी आमदानी का जरिया था। सावित्री अब आर्थिक रूप से मजबूत थी लेकिन इस स्थिति के आने में उसे पूरे दस साल लग गए थे। सावित्री का एक बेटा रोशन था तथा दो जुड़वाँ बेटियाँ अंशिका एवं वंशिका थीं तीनों बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे। उसके घर में पहली बार चार ट्राली गेहूँ आए थे जिन्हें बेचकर वह अपने कच्चे घर  का कुछ हिस्सा तोड़कर दो पक्के कमरे एवं किचन लेटबाथ बनवाना चाहती थी । कुछ पैसा उसे पी एम आवास से भी मिलने वाला था। आज उसे अपने पति दिनेश की बहुत याद आ रही थी जिसने दस वर्ष पूर्व आत्महत्या कर ली थी। आत्म हत्या का कारण दिनेश का बड़ा भाई राकेश था। दोनों भाईयो...

कहानी: पत्नी के मरने के बाद छः महीने भी नहीं जी सके नरेशचंद्र

आज पिच्यासी वर्षीय नरेश चंद्र की दर्दनाक मौत हो गई थी। उनकी अंत्येष्टि में  गिने चुने लोग ही शामिल हुए थे। उनकी पत्नी निर्मला का देहान्त हुए छः महीने ही बीते थे कि नरेशचंद्र भी दुनिया को अलविदा कर चल दिए थे। उन्हें जो दर्दनाक मौत मिली  ऐसी भगवान दुश्मन को भी न दे यह कहना था नरेश चंद्द के भरे पूरे घर में झाड़ू पौंछा और बर्तन माँजपे वाली बाई मंजू का। मँजू उस घर में दस साल से काम कर रही थी। मँजू  नरेशचँद्र जी के रिश्तेदार दीवानचंद्र की पत्नी विमला से कह रही थी की उनकी पत्नी निर्मला के निधन के बाद नरेशचँद्र का ध्यान किसी ने भी नहीं रखा था जबकि निर्मला कहा करती थी कि हम सौ वर्ष तक जिएँगे पर ऐसा हुआ नहीं बयासी वर्ष की उम्र में जब वह सुब्ह मंदिर जा रही थी तब एक कार चालक ने अंधी गति से कार चलाते हुए उन्हें जोर की टक्कर मार दी थी और भाग गया था कार चालक का तो पता नहीं चल पाया पर निर्मला जी ने वहीं दम तोड़ दिया था। निर्मला के मरने के बाद नरेशचँद्र असहाय हो गए थे। उन्हें भूलने की बीमारी थी किसी को भी वे पहचान नहीं पाते थे जरा सी देर पहले की बात भी वे भूल जाते थे। निर्मला उनका बहुत ख्...