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नवंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य: समस्या निवारक

हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएँ आती हैं जिनका सामना उसे करना ही पड़ता है । लेकिन कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जो उसे विचलित कर देती हैं जिसका समाधान उसे सूझता नहीं है। वह बार बार कोशिश करता है फिर भी उसे हल नहीं सूझता। और वो परेशान हो जाता है। ऐसी स्थिति में कुछ इतने सूझबूझवाले और समझदार लोग होते हैं जिनके पास हर समस्या का समाधान होता है । वे भी हमारे आस पास ही होते हैं जब उनके पास समाधान के लिए जाते हैं तो वे हमें ऐसे हल सुझाते हैं कि हम भी चकित रह जाते हैं। वे हमारी समस्या का समाधान कर के हमें चिंतामुक्त कर देते हैं। जबकि उनका तो यह स्वभाव ही होता है कोई भी उनके पास समस्या लेकर आता है तो वे बिना किसी भेदभाव के सच्चे मन से उसकी समस्या का समाधान बताते हैं। और इसी में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। रमेश जी ने पहली बार सरपंच का चुनेव लड़ा था और वे चुनाव जीत गए थे । सरपंच का पदभार भी उन्होंने ग्रहण कर लिया था। इसके बाद उनके ग्राम के स्कूल में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन होना था। उसमें उन्हें ध्वजारोहण करना था तथा भाषण भी देना था भाषण उन्होंने अपने जीवन में कभी दिया नहीं था भाषण कैसे दें यह...

व्यंग्य: हारने वाले की पीड़ा

चुनाव में जिनकी जीत होती है उनके तो जलवे ही निराले होते हैं पर जो चुनाव हार जाते हैं उनकी पीडा का बखान नहीं किया जा सकता है हारने वाला जिस दौर से गुजर रहा होता है इस विषय में सोचते ही दिल?काँप जाता है ।हार का अंतर अगर बहुत कम रहा हो तो हारने वाले की पीड़ा और अधिक बढ़ जाती है । हारने वाला भी चुनाव में खूब खर्च करता है लगभग दीवालिया हो जाता है। जीतने वाला तो अपना खर्च वसूल कर ही लेता है। लेकिन हारने वाले के माथे पर तो सारा खर्च ही मढ़ जाता है। रतन सिंह ने विधायक का चुनाव लड़ा था सुनते हैं कि टिकट के लिए उन्होंने पूरे पाँच करोड़ रुपये खर्च किए थे। इसके बाद पंरे दो महीने उन्होंने अथक परिश्रम किया पानी की तरह पैसा बहाया उनका हाईवे वाला ढाबा बिक गया दो बसें बिक गईं पूरी जमा पूँजी खर्च हो गई । उन्हें अपनी जीत का पूरा भरोसा था ढोल ढमाके मिठाई सबकी व्यवस्था उन्होंने कर ली थी। मतगणना शुरू हुई वे दोपहर तक लीड बनाए हुए थे दोपहर बाद बराबरी पर आ गए आखिरी राउंड में आठ सौ मतों से पीछे रह गए। सारे सपने चकनाचूर हो गए कोई उनके पास नहीं रहा अकेले घर आए । दुख के साथ इस बात की उन्हें कसक थी कि उनका भरो...

व्यंग्य: मोह का टूटना

हर घटना का वक्त निर्धारित होता है। उसी तरह हम भी लंबे समय तक एक ही स्थान पर नहीं रह पाते। अक्सर हम जिस शहर में रहते हैं जिस मोहल्ले में रहते हैं जिस घर में रहते हैं उससे हमें मोह हो जाता है वहाँ रहने वालों से भी हमारा मोह होता है। उनमें से कुछ हमारे बचपन के साथी होते हैं। कुछ दोस्त होते हैं । कुछ रिश्तेदार जिनके बीच हम रहते हैं उनमें जो बिछड़ जाते हैं उनके बिछड़ने का हमें दुख होता है। सबसे ज्यादा पीड़ा हमें तब होती है जब हमारा प्रिय जन इस दुनिया को छोड़कर ही चला जाता है। बेबालाल जी सेवानिवृत्त पोस्टमेन थे वे जिस शहर के रहने वाले थे वहीं उनकी नौकरी लग गई थी वे जिस मोहल्ले में रहते थे वहाँ आपस मे बहुत भाई चारा था वहाँ उनका पैतृक मकान था पूरा परिवार उसमें सुखपूर्वक रहता था बाबूलाल जी भी रिटायर होने के बाद वहाँ खुश रहते थे क्योंकि वहाँ उनके हम उम्र बहुत थे जिनसे उनकी मेल मुलाकात होती रहती थी उनके बच्चे आधुनिच सोच के थे उन्हें वो घर असुविधाजनक लगता था वे शहर की पॉश कॅलोनी में घर लेना चाहते थे पर इतने पैसे उनके पास नहीं थे उन्होंने पिताजी पर दवाब डाल कर वो पुशूतैनी घर बिकवा दिया जिस दिन उन...

व्यंग्य: ख़ुशी और ग़म के अलग अलग हिसाब किताब

दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसके पास ख़ुशी ही ख़ुशी हों ग़म बिल्कुल हों हीं नही। या किसी के पास गम ही गम हो खुशी बिल्कुल हो नही हो । खुशी और गम साथ साथ चला करते हैं पर इनके हिसब किताब अलग अलग होते हैं। किसी से किसी की क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती। वर्मा जी को शराब की लत थी वे सरकारी नौकरी करते थे लडका बेरोजगार था उसे नौकरी मिल नहीं रही थी वर्मा जी के वेतन का बड़ा हिस्सा शराब में खर्च हो जाता था वे किराये के मकान में रह रहे थे अधिक शराब के सेवन से उनका लीवर खराब हो गया किडनी फेल हो गईं। और वे रिटायरमेन्ट के एक साल पहले ही परलोक सिधार गए उनकी मौत से सब दुखी थे। यह दुख तो कभी दूर नहीं हो सकता था पर इस दुख के साथ बहुत सारी खुशियाँ भी आ गई थीं वर्मा जी को फन्ड ग्रेच्यूटी बीमा जीपी एफ के रूप में एक बड़ी रकम उनकी पत्नी को मिली थी इसके अलावा पेंशन भी अच्छी मिल रही थी लड़के को अनुकंपा नौचरी मिल गई थी फंड के पैसों से उन्होंने मकान खरीद लिया था लड़के की शादी हो गऍई थी। यह सब खुशियाँ उन्हें मिली थीं भले ही वे ये खुशियाँ खुलकर नहीं मना सकते थे पर इनकी अनुभूति तो उन्हें हो ही रही थी। जैसे सुब्ह किस...

व्यंग्य: विपरीत स्वभाव के रिश्तेदार

रिश्तेदार अगर एक दूसरे के स्वभाव के विपरीत हों तो रिश्ते भी असहज हो जाते हैं। और यदि पति पत्नी स्वभाव के विपरीत हों तो दाम्पत्य गीवन कष्टदायी हो जाता है। अक्सर बाप बेटे एक दूसरे के स्वभाव के विपरीत देखे जाते हैं। ऐसा होने पर बाप बेटों में मतभेद हमेशा कायम रहते हैं और ये उनकी परेशानी का सबसे बड़ा कारण बनते हैं फिर उनमें जनरेशन गेप तो होता ही है जो उनमें दूरिया पैदा करता है। कई बार देखा जाता है कि पिता जिम्मेदार है ईमानदार है कर्तव्य परायण है सिद्धान्तवादी है नियम का पक्का है । अनुशासन प्रिय है तो उसका बेटा उसके एक दम विपरीत होगा वो लापरवाह होगा उसका रवैया गैर जिम्मेदाराना होगा अनुशासन होगा ही नहीं कोई काम ठीक से नहीं करेगा कोई सिद्धान्त नहीं होंगे जुबान का सच्चा भी नहीं होगा उसके पिता से उसकी कभी नहीं बनेगी। ऐसे ही एक कृषि विभाग में अधिकारी थे संतोष जी उनकी दो बेटियाँ थीं उनकी शादी उन्होंने कर दी थी वे एक सिद्धानूतवादी ईमानदार व्यक्ति थे उनका लड़का था रोहित वो माँ का लाड़ला था उसका स्वभाव उसके पिता से विपरीत था पढ़ाई लिखाई में उसकी रूचि नही थी । वो पिताजी से हमेशा रुष्ट रहता था। उस...

व्यंग्य: मतलबी यार

आज के इस दौर में मतलबियों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। ऐसे मतलबी लोग संवेदना शून्य होते हैं इनमें न दया होती है न सहानुभूति भीतर से यह पूरी तरह भाव शून्य होते हैं।   जब तक इनका किसी से कोई मतलब न निकलता हो तब तक यह उससे कोई वास्ता नहीं रखते जान पहचान के होते हुए भी हालचाल तक नहीं पूछते। लेकिन जैसे ही इनका मतलब निकलता है। वैसे ही यह सकिय हो जाते हैं उसे अपना घनिष्ठ बना लेते हैं ऐसा जाहिर करते हैं जैसा आपका उनसे बड़ा हितैषी कोई और हो ही नहीं सकता। इनका आकर्षण इतना ज्रबर्दस्त होता है कि लोगों की सोच ही गुम हो जाती है यह भतलबी जब तक अपना मतलब पूरी तरह हल नहीं कर?लेते तब तक वे आपको अपने आकर्षण के जाल में फँसाए रखते हैं उनकी सम्मोहिनी से आप बाहर ही नहीं निकल पाते जब उनका मतलब पूरा हो जाता है और सम्मोहन टूटता है तब व्यक्ति अपने आपको ठगा सा महसूस करता हैं उसे बहुत अफसोस होता है तब तक देर हो चुकी होती है। प्रकाश चंद्र इसी तरह के इंसान थे मतलब के आगे उनके रिश्तों की कोई अहमियत नहीं थी। उनका कोई सगा नहीं था वे सिर्फ मतलब से ही वास्ता रखते थे उनकी सगी बहन सरला को मकान खरीदना थ...

व्यंग्य: शंका और दुविधा

शंका और दविधा हर व्यक्ति के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर सामने आती है। जो लोग शंकाओं से घिरे रहते हैं दुविधाओं में पड़े रहते हैं। वे चाहकर भी कोई काम नहीं कर पाते और बाद में सिवाय पछतावे के उनके पास और कुछ नहीं बचता । कहने वाले कहते हैं कि बुरे काम करने से पहले हज़ार बार सोचना चाहिए । और उसे टालने की सूरत निकालना चाहिए अगर टल जाए तो खुश होना चाहिए । इसके विपरीत अगर भला काम करना हो तो उसे करने में देरी नहीं करना चाहिए भला काम करने में सोच विचार की अधिक जरूरत?नहीं होना चाहिए भला काम करने से खुशी होती है साथ ही अदभुत आनंद की प्राप्ति भी। यह बात हर क्षेत्र में लागू होती है। हमारी सूझबूझ और समझ हमारे अंदर शंका उतूपन्न नहीं होने देती और जब शंका नहीं रहती तो विश्वास का जन्म होता यह विश्वास ही हमें सफल बनाता है। दुविधा में पड़े हौए लोग विश्वास को खो बैठते हैं। जिससे वे आगे नहीं बढ़ पाते और अपने विकास को अवरुद्ध कर लेते हैं। एक व्यापारी ने प्याज और लहसुन के वूयापार में चार महीने में चालीस लाख रुपये कमाए और दूसरे व्यापारी ने उसी व्यापार में बीस लाख का घाटा उठाया इसमें शंका तथा दुविधा प्...

व्यंग्य: अहं पर चोट

अक्सर जो अहंकारी होते हैं उनके अहं पर सबसे ज्यादा चोट लगती है। ऐसे लोग हमेशा विचलित रहते हैं इसका फायदा भतलबी उठाते हैं वे अहंकारी के अहं को संतुष्ट करते हुए उससे लाभ उठाते रहते हैं जब तक उसे इसका अहसास होता है तब तक देर हो चुकी होती है।  जो बड़े पद पर होते हैं वो अगर अभिमिनी हों तो वे सबकी परेशानी का कारण बन जाते हैं। जैसे कोई बड़ा साहब अपने अधीनस्थ को डाँट रहा हो उसे निकम्मा नकारा कह रहा हो उसके खिलाफ कार्यवाही की धमकी दे रहा हो तो अधीनस्थ का परेशान होना स्वाभाविक है बड़े साहब ने अपने अधीनस्थ को बुलाया और काम सौंपते हुए कहा कि दो दिन के अंदर काम पूरा करना है अन्यथा तुम्हारे खिलाफ सख्त कार्यवाही करूँगा अधीनस्थ ने खूब कहा कि यह अकेले के बस का काम नहीं है आप दो दिन की बात कर रहे हैं यह तो दस दिन में भी पूरा नहीं वाला इस पर साहब आग बबूला हो गए और अंतिम निर्णय देते हुए बोले कुछ भी हो दो दिन में काम पूरा होना इससे अधीनस्थ डिप्रेशन में आ गया काम पूरा नहीं होना था। साहब ने सख्त कार्यवाही कर उसकी वेतन वधद्धि रोक दूसरे को काम सौंपा वो भी नहीं कर पाया उसका भी यही हाल हुआ जब तीसरे को शिकार...

व्यंग्य: सुखों के दौर के साथी

कहते हैं जब वक्त अच्छा हो और पास में भरपूर सुख हों तो बहुत से ऐसे होंगे जो आपके खास साथी बनकर रहेंगे वे आपके साथ खूब मजे करेंगे आप से हर तरह का लाभ उठाएँगे आप को ऐसी चपत लगाएँगे जिसका अहसास तक आपको नहीं होगा । आप भी इनको अपना सबसे बड़ा हितैषी मान लेंगे ऐसे लोग सच्चे हितैषियों को आपके पास भी फटकने नहीं देंगे। लेकिन इनसे बड़ा घातक कोई नहीं ये ऊपरी तौर पर संवेदन शील बनेंगे भीतर इनमें जज्बात नाम की कोई चीज नहीं होगी। कुंदनलाल जब क्षेत्रीय विधायक थे तब उनके यहाँ समर्थकों की हमेशा भीड़ लगी रहती थी उनमें से कुछ तो उनके बहुत करीबी थे जो उनसे कई प्रकार के उचित अनुचित लाभ उठाते रहते थे वे भी यही सोचते थे कि उनके पास शुभचिंतको की ऐसी भीड़ है जो किसी भी हाल में उनका साथ नहीं छोड़ेंगे वही कुन्दनलाल जी जब चुनाव में पराजित हो गए । तो सारे हितैषी सारे शुभचिंतक नदारद हो गए कोई हालचाल पूछने वाला नहीं रहा। अकेले अपनी हार का वे शोक मना रहे थे और उनके अनेक कथित सच्चे हितैषी जीतने वाले के जिन्दाबाद के नारे लगा रहे थे । वे जब पॉवरलेस हो गए तो उनकी पूछ परख करने वाला कोई न रहा। इसलिए कहा गया है कि सच्चे ...

व्यंग्य: गलतफहमी चा शिकार

हमारे आसपास अक्सर ऐसे कई लोग मिल जाएँगे जो यह मानकर चलते हैं कि उनके बिना किसी का काम नहीं चल सकता ऐसे लोग अपने आपको महत्वपूर्ण मानकर गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। ये फिर अभिमानी हो जाते हैं इनकी काफी पूछ परख करना पड़ती है। यह लोग अक्सर एटीटयूड में रहते हैं कई बार ये दूसरों की बेइज्जती करने में भी संकोच नहीं करते। लोग इनको यह सोचकर बर्दाश्त कर लेते हैं क्योंकि उनका कोई विकल्प उन्हें नजर नहीं आता। वे इस स्थिति का भरपूर फायदा उठाते हैं ऐसे लोग हर जगह आपके भिल जाएँगे। सामजिक संगठन हों या घर परिवार या संस्थाएँ अथवा प्रतिष्ठान हों यह कई बार तो अपनी मनमानी पर उतर आते हैं। ऐसे लोगों का अभिमान भी चूर चूर होतः है। उमानाथ जी ऐसे ही व्यक्ति थे वे एक संस्था में पदाधिकारी थे। और सर्वेसर्वा बनकर रहते थे वे सभी पर अपने निर्णय थोपते थे। संस्था के अन्य सभी सदस्यों और पदाधिकारियों को यह अहसास कराते रहतः थः कि उनके दम पर यह संस्था चल रही है वो जिस दिन इस संस्था से हट जाअःगे उस दिन यह संस्था भी खत्म हो जाएगी। यह बहुत दिनों तक चलता रहा फिर एक बार ऐसी स्थिति निर्मित हुई जो उनको अप्रिय लगी उन्होंने इसे...

व्यंग्य: मज़बूरी का अनुचित लाभ उठाने वाले

एक ओर दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो दुखी लाचार बेबसों की मदद करते हैं और उनकी मद करके खुश होते हैं दंसरी ओर ऐसे लोगों की भी अच्छी खासी संख्या है। जो दुखी कमजोर और मज़बूर लोगों का अनुचित लाभ उठाते हैं उन्हें लूटकर ठगकर खुश होते हैं ऐसे लोगों में इंसानियत बिल्कुल नहीं होती न ही इनमें जमीर होता है ये अपनी ठगी के किस्से दूसरों को बढ़चढ़कर सुनाते हैं।  । ऐसा ही एक उदाहरण याद आ रहा है जो इस प्रकार है। रमेश के पास मिनी ट्रक था ।उसका वो खुद ही ड्राइवर था । उसका उसने अच्छी तरह मेन्टीनेन्स कर रखा था घर में कमाने वाला एक वही था । अचानक वो गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसके इलाज में बहुत से रुपये खर्च हो गए । जब वो ठीक होकरआया तो बहुत कमजोर था घर में कुछ भी नही था कर्ज भी हो गया था। उसकी मज़बूरी का फायदा उसके ही परिचित सोमेश ने उठाया उसका पाँच लाख का मिनी ट्रक उसने दो लाख रुपये में खरीद लिया। वो तो ड्राइवर से ट्रक मालिक बन गया और रमेश ठीक होकर?ड्राइवर बन कर अपने परिवार का पालन कर रहा था। इसी तरह कुछ मानवता विहीन ऐसे लोग भी हैं । जो मजबंरों को बीस परसेन्ट प्रतिमाह ब्याज की दर से कर्ज देते ...

व्यंग्य: अनजानी वक्त की बर्बादी

जो लोग यह सोच कर किसी काम में अपना वक्त खर्च कर रहे हैं कि यही समय का सही उपयोग है शायद उन्हें नही मालूम की वो ऐसा कर के अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहे हों ।कुछ लोग यह तय ही नहीं कर पाते कि उनकी ज़िंदगी का मक़सद क्या है। जिन्हें वे समझदार समझते हैं वो उन्हें जैसा बताते हैं वैसा ही करने लगते हैं खुद का दिमाग नहीं लगाते । ऐसा करते हुए जब बहुत सा समय व्यतीत हो जाता है तब उन्हें अहसास होता है कि वे तो अपना वक्त बर्बाद कर रहे थे। उनकी दशा उस मुसाफ़िर की तरह हो जाती है जो यह उम्मीद लेकर चला था कि वो जिधर जा रहा है वही उसकी मंजिल है यह सोचकर वो हर कठिनाई से गुजरता है हर रुकावट दूर करता है और जब पहुँचता है तो पता चलता है कि यह तो उसकी मंजिल है नहीं वो तो विपरीत दिशा में चल रहा था । यहाँ से तो उसकी मंजिल दोगुनी दूर है। उसके पास समय नहीं बचता हताशा उसे घेर लेती है और वो गहरे अवसाद में डूब जाता है उसके सपने चूर चूर हो जाते हैं जीवन बोझ लगते लगता है। वैसे देखा जाए तो हमारी हर गलती के सबसे बड़े जिम्मेदार हम स्वयं ही हैं। हम क्यों किसी के बहकावे में आए हमारा किसी ने ब्रेनवाश कर दिया और?हमने वो ...

व्यंग्य: वक्त की मार से पीड़ित

लोग बुरा वक्त इस उम्मीद में काटते हैं कि कभी तो उनका अच्छा वक्त आएया तब सब कुछ उनके अनुकूल होगा जिंदगी आनंद दायक हो जाएगी जिनका वक्त बदल जाता है उनकी तो हर इच्छा पूरी होने लगती हैं पर जिनका वक्त नहीं बदलता वे इंतजार करते ही रह जाते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो सुनहरे वक्त को बिताकर गर्दिश के दौर को काट रहे होते हैं ऐसे लोग इतनी बुरी तरह से बर्बाद होते हैं कि उनकी दुबारा सँवरने की संभावना हो समाप्त हो जाती है। दौलत राय कभी शहर के जाने माने ज्वेलर थे समाज में उनका बड़ा सम्मान था वे नगर परिषद में पार्षद भी थे। सब कुछ ठीक चल रहा था तभी विधान सभा के चुनाव आए समर्थकों के कहने पर उन्होंने विधायक का चुनाव लड़ा उसमें अनाप शनाप पैसा खर्च किया फिर भी चुनाव हार गए फार्म हाउस बिक गया दो मकान बिक गए फिर भी करोड़ों रुपये का कर्ज सिर पर था जवेलर की दुकान लड़के ने सम्हाल रखी थी । लेनदारों ने उनकी दुकान पर कब्जा करना चाहा तो बेटे ने कागजात दिखाकर बताया कि यह दुकान तो मेरी है। यह सुनकर लेनदार तो मायूस हो गए पर दौलतराम को भी सदमा लगा चुनाव की व्यस्तता का लाभ उठाकर लड़के ने उनके भरोसे का अनुचित फ...

व्यंग्य: भरोसे की भैंस

ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत खूब प्रचलित है कहावत इस प्रकार है भरोसे की भैंस पाड़े को जन्म देती है। इस कहावत का प्रयोग तब किया जाता है जब हम किसी पर पूरा भरोसा करते हैं और वो भरोसा तोड़ देता है । इतना ही नही वो विश्वास घात भी करता है। आज के इस दौर में तो बिश्वास देकर विष देने वाले बहुत मिल जाएँगे। कुछ दोस्त ऐसे भी होते हैं जो लाभ लेते समय बड़े दावे से कहते हैं कि कभी हम भी तुम्हारे काम आएँगे। इन पर कितने ही अहसान करो ये यही कहेंगे कि आपके सब अहसानों का बदला चुका देंगे। और यही लोग मुसीबत में कन्नी काट कर निकल जाएँगे इनके घर जाओ तो घर से बाहर नहीं निकलेंगे बच्चों से कहलवा देंगे कि पापा घर पर नहीं हैं यह मतलबी लोग सिर्फ मतलब से अपना वास्ता रखते हैं। मतलब निकल जाने के बाद मुड़कर देखते तक नहीं। इसलिए सयाने कहते हैं किसी पर भी पूरा भरॅसा करके आँखें बंद कर मत बैठ जाओ हमेशा इसका विकल्प तैयार रखो। कुछ लोग बड़े घटिया टाइप के होते हैं। वो उस वक्त नदारद हो जाते हैं जिस वक्त उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। समय निकलने के बाद ये अचानक प्गट हो जाते हैं। फिर बड़ी मासूमियत से कहते हैं मैं कहीं गय...

व्यंग्य: मोह से जुड़े रिश्ते

रिश्ते दो तरह से जुड़ते हैं एक तो स्वार्थ पर आधारित होता है। दूसरा रिश्ता मोह जनित होता है। मोह को कोई गुण नहीं कहा गया नही उस को अच्छा कहा गया पहले के मनीषियों ने मोह को व्याधि का मूल कहा है यदि कहा जाए कि सारी बुराई पाप मोह के कारण भी होते हैं। तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। कहते हैं कि यदि अंधा मोह नहीं होता तो पिता के सौ पुत्र युद्ध में नहीं मारे जाते पिता को पुत्र से मोह था और पुत्र को राज्य से कर्ण को मित्र से। इस मोह के कारण इंसान न तो भले बुरे का विचार करता है न ही परिणामों की परवाह करता है। मोह के कारण व्यक्ति पक्षपात करता है सरासर अन्याय करता है। झूठ बोलता है नैतिकता अनैतिकता की भी उसे चिंता नहीं रहती। इसलिए काम क्रोध मद मोह को नरक के पंथ कहा गया है। इस मोह को छोड़ना आसान नहीं है। माया मोह का कारण होती है। मोह इंसान की सोच पर भी असर डालता है । कई परिवारों में देखा जाता है कुछ माता पिता मोह के कारण अपनी ही संतानों के साथ पक्षपेत करने लगते हैं। जो लाड़ला होता है उसके सौ गुनाह भी माफ कर दिए जाते हैं और जो उपेक्षित होता है उस पर लगे झूठे आरोपों को भी सच मानकर प्रताड़ि...

व्यंग्य: मुफ़्तखोर

एक ओर जहाँ दिल फरियाद लोगों की कमी नहीं है वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो मुफ्त खोर होते हैं इनकी जेब से कोई एक रुपया भी खर्च नहीं करवा सकता लेकिन दूसरों के माल पर मौज उड़ाने भें इन्हें बहुत मजा आता है। जो दिल फरियाद होते हैं उन्हें खिलाने में मजा आता है। शहर के युवा व्यवसायी है किशोर गुप्ता जी दिन भर दुकान पर रहकर खूब व्यवसाय करते हैं और देर शाम को नोटों से भरा पर्स लेकर अपनी मित्र मंडली में शामिल हो जाते हैं। फिर उनका पर्स और दोस्तों की फरमाइशों के बीच मुकाबला होता है जिसमें उनके पर्स की सदैव जीत होती है। यह क्रम अनवरत कई वर्षों से जारी है जो कभी ट्टटूटा नहीं हैं वे रविवार को अपना कारोबार बंद रखते हैं । उस दिन वे दोस्तों के साथ घूमने निकल जाते हैं तब भी वे किसी का एक रुपया भी खर्च नहीं होने देते। इससे उनकी बरकत बनी रहती है ऐसा कभी कोई दिन नहीं आया जब उनका पर्स खाली रहा हो । वे खर्च करने में खुश होते हैं। इसके बाद भी वे धन संपन्न हैं। और उनके रुपयों पर मौज करने वाले हमेशा ही उनके मुकाबले में बहुत कम रहते आए हैं। इसके विपरीत उन लोगों की दशा पर विचार करें जो घर से ही फटी जेब ले...

व्यंग्य: दोस्त का दुश्मन बन जाना

वैसे तो जो सच्चे दोस्त होते हैं वो मरते दम तक दोस्ती निभाते हैं उनकी दोस्ती को नमन है लेकिन जो कभी बहुत गहरा दोस्त रहा हो वो अगर दुश्मन बन जाए तो उससे अधिक खतरनाक और कोई नहीं होता । और होता भी यही है । जो कभी गहरे दोस्त रहे हों वे सबसे बड़े दुश्मन बनकर सामने आते हैं। और एक दूसरे को गहरी चोट देते हैं। दोस्ती का जन्म प्रेम से होता है और दुश्मनी का नफ़रत से। जितनी ज्यादा नफ़रत बढ़ती है उतनी गहरी दुश्मनी भी हो जाती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने दोस्तों को मन की बातें बता देते हैं । उनसे कोई बात छिपाते नहीं दोस्त को उनकी सारी कमजोरियाँ मालूम होती हैं लोग ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वो अपने दोस्त को प्रेम करते हैं उसे दिल से चाहते हैं उसे अपना समझते हैं इसलिए उससे अपनी हर बात साझा करते हैं। यह सब तब घातक साबित हो जाता है जब उनकी आपस में दुश्मनी हो जाती है। दुश्मनी हो जाने पर ऐसा दुश्मना बना दोस्त बड़ा खतरनाक सिद्ध होता है वो आपकी छवि बिगाड़ देता है वो आपको बदनाम कर देता है और कभी कभी ऐसा भी होता है कि वो आपको कहीं मुँह दिखाने लायक भी नहीं छोड़ता । यह सब शुरू से चला आ रहा है फिर भी लो...

व्यंग्य: कहीं नाम न डूब जाए

जब किसी का जन्म होता है तब उसका कोई नाम नहीं होता नाम बाद में रखा जाता है वही नाम उसकी पहचान बन जाता है वो अपने नाम से इतना अधिक जुड़ जाता है कि हमेशा अपना नाम ऊँचा रखने की कोशिश में लगा रहता है ।कोई भी मशहूर होता है तो नाम से ही होता है। और अगर बदनाम होता है तो वो भी नाम से ही होता है। हर व्यक्ति जब तक जीवित रहता है तब तक उसकी यही सोच होती है कि वह कुछ ऐसा करे कि उसका नाम अमर हो जाए इसके लिए वो हर संभव प्रयत्न करता है । किसी की तारीफ भी नाम से होती है और बुराई भी नाम से नाम जब चलता है तो बहुत से काम तो नाम से ही हो जाते हैं कुछ लोग कहते भी हैं कि मेरा नाम ले देना तुम्हारा काम हो जाएगा। अखबारों में नाम भी यही सोचकर छपवाया जाता है कि लोग उनको याद रखें। लेकिन इस पर जरा गंभीरता से विचार करें तो समय बीतने के साथ नाम भी भुला दिए जाते हैं । ऐसा माना जाता है कि बेटे से वंश चलता है पिता का नाम भी चलता है। पर कोई ऐसा विरला ही होगा जिसे अपने चौथी पीढ़ी के पूर्वज का नाम याद हो । क्षेत्र कोई भी हो नाम हमेशा के लिए नहीं होता। तभी तो आए दिन ऐसी खबरे आती रहती हैं कि अपने ज़माने के कई मशहूर ...

व्यंग्य: बदले का भाव

बदला निकालने का भाव रखने वाले लोग अपनी सारी शक्ति और समय बदला निकालने में लगा देते हैं इसके लिए वे किसी हद तक गिर जाते हैं। और उनके अगर इरादे सफल हो जाएँ तो उन्हें परम संतुष्टि प्राप्त होती है पर यह सुख थोड़े दिन का होता है। जिससे इन्होंने अपना बदला निकाला था वो भी बदले की भावना से भर जाता है तथा अवसर की तलाश करता रहता है। जिसका फायदा कुछ चालाक लोग खूब उठाते हैं। यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। चाहे जिंदगी भले खत्म हो जाए। सयाने कहते हैं कि इंसान को वदलाव के लिए प्रयास करना चाहिए अपने आप में सुधार कर बेहतर इंसान बनने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन लोग ऐसा करते नहीं हैं वे बदले निकालने के फेर में बदतर इंसान बनकर रह जाते हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाना और खुद को ऊँचा समझना इंसान को एक घटिया इंसान बना देता है। कई बार आवेश में कही हुई तीखी बात किसी को बुरी लग जाती है । पर वो इसे जाहिर नहीं होने देता। जब वो बदला निकालने में सफल हो जाता है तब हम समझ पाते हैं पर तब तक देर हो चुकी होती है। अगर हम एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश न करें । और सबकी सच्चे मन से मदद करें तो हम बेहतर इंसान बन सकते ...

व्यंग्य: भाग्य के भरोसे

भाग्य का रोना रोने वालों में अधिकतर वे लोग होते हैं जो अपनी लापरवाहियों और सुस्ती के कारण असफल हो चुके होते हैं ।ये भाग्य के भरोसे बैठे हुए लोग कोई भी कार्य की पहल इसिलिए नहीं करते क्योंकि वे यह मान लेते हैं कि उनकी किस्मत ही खराब है। जो उनकी किस्मत में लिखा ही नहीं है वो उन्हें कैसे मिलेगा यह उनकी सोच होती है। इसके विपरीत जो मेहनत साहस और बुद्धि बल से सफल हो जाते हैं वे इस विषय में विचार तक नहीं करते उनके पास अपने कार्य की रुपरेखा होती है योजना होती है। वे अपना पूरा समय अपने कार्य को अंजाम देने में लगा देते हैं। और जब तक सफल नहीं हो जाते तब तक चैन से नहीं बैठते। इनकी सफलता को देखकर असफल उन्हें किस्मत का धनी कहकर उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं । और अपनी किस्मत को दोष देने लगते हैं।  कभो कभी ऐसा भी होता है कि दो व्यक्ति एक साथ एक ही स्थान पर मजदूरी करते हैं। दोनों की आय बराबर होती है फिर भी उनमें से जो मेहनती साहसी और बुद्धिमान होता है वो उन्नति के पथ पर चल पड़ता है धीरे धीरे सफलता उसके कदम चूमने लगती है । वो मजदूरी करना बंद कर के छोटा मोटा धंधा शुरू चर देता है फुटपाथ पर बैठकर...