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फ़रवरी, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: रिश्वत खोर का रिटायरमेन्ट

सतीश एक कमाऊ सरकारी विभाग में अधिकारी के पद पर एक साल पहले तक कार्यरत थे। उनके रिटायरमेन्ट को आज एक वर्ष पूरा हो गया था। इस एक वर्ष में उन्होंने कैसे अपने खर्चों पर अंकुश लगाया इसको वो ही जानते हैं। अब कहीं उनकी गाड़ी पटरी पर आइ थी। बच्चों को यह समझने में बहुत दिन लगे कि अब उनके पापा रिटायर्ड हैं और पेन्शन के सहारे हैं। सतीश जी जब शौकरी करते थे तब उनकी तनख्वाह एक लाख रुपये प्रतिमाह थी। मगर छः से सात लाछ रुपये वे रिश्वत से कमा लेते थे। इसके कारण उनकी पत्नी सुषमा, बड़ा लड़का संदीप, छोटा लड़का आकाश भी फिजूल खर्च करते थे। हर महीने संदीप एक लाख रुपये खर्च कर देता था। इतने ही रुपये आकाश भी उड़ा देता था। सतीष की पत्नी सुषमा महीने में दो लाख रुपये खर्च देती थी। सतीश जी भी एक लाख रुपये से अधिक ही खर्च कर देते थे। सुषमा बहुत सारा रुपया तो जुए में हार जाती थी। सब रिश्वत के कारण लक्जरी लाइफ जी रहे थे। सतीश जी ने होम लोन से एक मकान खरीदा था। इसके अलावा उनके पास कोई अचल संपत्ति नहीं थी। दोनों बेटे कहीं पर नौकरी नहीं करते थे। सरकारी नौकरी उन्हें मिली नहीं थी और प्राऐवेट पन्द्रह हजा...

कहानी: आर्टीजन

मोहनलाल जो दस साल पहले शहर के एक कारखाने में आर्टीजन के पद पर कार्यरत थे वे अब खुद कारखाने के मालिक थे जिसमें दो सौ श्रमिक काम कर रहे थे और जिसका हर माह करोड़ों रुपये का टर्नओवर था। उनकी शहर में अच्छी प्रतिष्ठा थी। वे सत्ताधारी दल के प्रदेश शाखा में पदाधिकारी भी थे तथा नगर पालिका के अध्यक्ष भी रह चुके थे। वे शहर के सबसे बड़े दानदाता थे फिर भी उनके पास कभी धन की कमी नहीं आती थी। उनके कारखाने में कोई श्रमिक ऐसा नहीं था जिसको उन्होंने रहने को आवास नहीं दिया हो। उनके सभी श्रमिकों के पास अपने दो पहिया वाहन थे तथा फोरमेन एवं उससे ऊपर के अधिकारियों के पास कार। आज के दौर में जबकि कई सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चल रहे थे तब उनका कारखाना लाभ में चल रहा था। दस वर्ष पूर्व वे जिस सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने में काम करते थे वो पिछले तीन सालों से बंद पड़ा था। उस कारखाने के बहुत से श्रमिक एवं इंजीनियर अब उनके कारखाने में काम कर रहे थे। जब मोहनलाल जी ने नौकरी छोड़ी तब वे उस कारखाने के सबसे कुशल आर्टीजन थे। वे जिस मशीन को चलाते थे उसकी उन्हें पूरी जानकारी थी। अगर वो मशीन...

कहानी: सेकेण्ड हैण्ड कार

नरेश बाबू एक सेकैण्ड कार खरीदने के कारण पूरे साल भर परेशान रहे। उसकी बार बार रिपेयरिंग कराने में उनके ढाई लाख रुपये खर्च हो गए थे फिर भी वो बार बार काम निकाल रही थी। अब मैकेनिक उसका इंजन बदलने की बात कर रहा था। नया इंजन बहुत महँगा आ रहा था। मैकेनिक का कहना था कि सैकेण्ड हैण्ड इंजन लगवा लो पर नरेश बाबू सैकेण्ड हैण्ड कार खरीदने के निर्णय पर अभी तक पछता रहे थे इसलिए सेकेण्ड हैण्ड इंजन खरीदने का विचार उन्होंने त्याग दिया था। अंत में वो कार उन्होंने मुश्किल से अस्सी हजार रुपये में बेचकर पीछा छुड़ा लिया। इसमें उन्हें पूरे छः लाख रुपये का नुक्सान हुआ था फिर भी उनको इस बात से संतोष था कि घर में कलह का कारण बनी उस कार से उनका पीछा छूट गया था। बात एक साल पुरानी है तब नरेश बाबू सेवानिवृत हुए थे। फंड का पैसा उन्हें मिला था उनकी पत्नी विमला की बहुत इच्छा थी कार खरीदने की। घर का मकान उनके पास था ही बेटे और बेटी की शादी वे कर ही चुके थे। बेटा एम बी ए करने के बाद पूना में नौकरी कर रहा था। नरेश जी कार के शोरूम पर गए तो पता चला कि छोटी कार भी सात लाख रुपये से कम में नहीं मिल रही है। फिर भी उन्ह...

कहानी: जादू टोने का फेर

जादू टोने के फेर में विवेक की बहन विशाखा का बीस साल पहले दुखद निधन हो गया था जिसमें उसके पिताजी सोमनाथ का रिटायर मेन्ट के दौरान मिला बहुत सा रुपया बर्बाद हो गया था वही स्थिति विवेक के बेटे अनुपम की हो गई थी परीक्षा में कम अंक आने के कारण अनुपम डिप्रेशन का शिकार हो गया था उसकी हालत देखकर कई लोगों ने उससे कहा कि इस पर किसी ने काला जादू कर दिया है जो किसी जानकार से ही ठीक होगा मगर विवेक ने किसी की बात पर भरोसा न करके उसे मनोचिकित्सक को दिखाया था जिसके इलाज से अनुपम धीरे धीर ठीक हो रहा था। विवेक को बीस वर्ष पहले का वो समय याद आ गया जब विवेक की नई नई नौकरी लगी थी और वो अपने घर से दूर नागपुर में रह रहा था । उसे काम से फुरसत नहीं मिलती थी इस लिए वो अपने गृह नगर बहुत दिनों से नहीं गया था एक दिन अचानक उसे खबर मिली की उसकी बहन विशाखा का दुखद निधन हो गया है तो वो छुट्टी लेकर घर आया विशाखा का मृत शरीर देखकर उसे अहसास हुआ कि विशाखा की मौत दर्दनाक हुई है विशाखा के अंतिम संस्कार के बाद सोमनाथ जी ने बताया कि विशाखा के उपचार में उनके रिटायरमेन्ट में मिली अधिकांश राशि खर्च हो गई है अब उनके पास सिव...

कहानी: चुनौतियों भरी नौकरी

सुरेश सुदूर सतपुड़ा के सघन एवं दुर्गम जंगल के बीच में स्थित आदिवासियों के गाँव दुरगाँव के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में गणित के शिक्षक के पद पर कार्यरत था उस गाँव तक जाने का रास्ता बहुत कठिन था बीच में नर्मदा नही पड़ती थी उसे पार करने के बाद सतपुड़ा पर्वत श्रृखला का एक दुर्गम पहाड़ पड़ता था इसके बाद पाँच किलोमीटर का घना जंगल तब कहीं दुरगाँव नजर आता था सबसे ज्यादा परेशानी बरसात में होती थी। सुरेश की पत्नी सुनीता गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में नर्स के पद पर कार्यरत थी। जो उस केन्द्र की सर्वेसवा थी कहने को तो उस केन्द्र पर,एक डॉक्टर का पद भी स्वीकृत था उस केन्द्र पर दस का स्टॉफ स्वीकृत था मगर सुनीता अकेली उस केन्द्र पर विगत चार वर्षों से नर्स के पद पर कार्यरत थी। सुरेश के हायर सेकेण्डरी स्कूल में चौदह पद थे जिनमें एक शिक्षक प्राथमिक में एक माध्यमिक में तथा एक हायर,सेकेण्री में पदस्थ था तीन शिक्षकों के ऊपर दो सौ छात्रों को शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी थी सुरेश के पास प्रभारी प्राचार्य के पद का भार भी था। उधर सुनीता भी स्वास्थ्य केन्द्र पर दिन भर व्यस्त रहती थी । सुरे...

कहानी: चार दुकानें

काशी बाई की ट्रान्सपोर्ट नगर के महेन्द् मार्केट में चार दुकाने थीं । जिसका किराया चालीस हज़ार रुपया प्रतिमाह उन्हें मिलता था जिससे उनकी गुज़र बसर आराम से हो रही थी उनकी उम्र अब सत्तर वर्ष की हो गई थी वे पिछड़ी बस्ती उमा कॉलोनी में रहती थीं जहाँ उनका खुद का छोटा सा मकान था उनकी आय का साधन उन चार दुकानों का किराया ही था ये चार दुकानें भी काशीबाई को महेन्द्र मार्केट की मालकिन गौरो देवी ने अपनी दस वर्ष तक देखभाल,करने के बदले में दी गई थीं। जिनके किराये से काशी बाई का खर्च चल रहा था। महेन्द्र मार्केट की मालकिन गौरी देवी जब पैसठ वर्ष की थीं तब उनका आधा शरीर लकवा ग्रस्त हो गया था उनके दोनों लड़कों के पास फुर्सत नहीं थीं उनकी दोनों बहुओं ने अपनी सास गौरी देवी की सेवा करने से साफ इंकार कर दिया था । तब उनके बड़े बेटे मनीष ने काशीबाई को उनकी पूरी देखभाल,करने के लिए रखा था ।काशीबाई शहर के एक प्राइवेट अस्पताल के एक वार्ड में काम करतीं थीं जिसका उन्हे सात हजार रुपये बेतन मिलता था। मनीष ने बारह हजार रुपये के वेतन पर काशीबाई को अपनी बीमार माँ की देखभाल का जिम्मा सौंप दिया था । आज से पन...

कहानी: आत्मनिर्भर

ठेले पर मनिहारी का सामान बेचने वाली कमला की बड़ी बेटी अंजली की आज सरकारी अस्पताल में स्टॉफ नर्स की नौकरी लग गई थी। आज वो बहुत खुश थी उसकी छोटी बेटी अंजू सिविल इन्जीनियर के ट्रेड से बी ई कर रही थी तथा लड़का अविनाश इस साल हायर सेकेण्डरी में पढ़ रहा था। कमला के पति नरेश का सोलह वर्ष पूर्व निधन हो गया था। तभी से कमला मनिहारी की छोटी सी दुकान चलाकर अपने तीनों बच्चों का लालन पालन कर रही थी तथा उन्हें पढ़ा लिखा रही थी। उसके तीनों बच्चे  होनहार थे जिन पर कमला को बहुत गर्व था। कमला के पति नरेश की सोलह वर्ष पूर्व बेदर्दी से हत्या कर दी गई थी जिसके आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी हो गए थे। जब नरेश की हत्या हुई उस समय वो हीरापुर का कुख्यात गुण्डा था। उससे सभी खौफ खाते थे। जिससे जितने पैसे की माँग करता उतने पैसे उसे मिल जाते थे। उसके कारण वो बड़े ठाट बाट से रहता था। उसका बेटा अविनाश उस समय दो वर्ष का था। अंजली तीसरी में पढ़ रही थी तथा अंजू ने कक्षा एक में प्रवेश लिया था। नरेश का हीरापुर में नाम चलता था जबकि उसकी पत्नी उसे कई बार समझा चुकी थी यह का...

कहानी: चरवाहा

नंदलाल अठ्ठाइस वर्ष का युवक था वो बकरियाँ पालकर अपनी गुजर बसर कर रहा था उसके पास छत्तीस बकरियाँ थीं और चार बकरे इनकी संख्या घटतो बढ़ती रहती थी इनसे वो हर माह चालीस हजार रुपये कमा रहा था जिससे उसके परिवार का खर्च आराम से चल रहा था आज ही नंदलाल ने एक बकरा और एक बकरी पच्चीस हज़ार रुपये में बेची थी। नंदलाल का घर पक्का था कई छोटे किसान उसके मुकाबले में पीछे थे वे अभी भी कच्चे घरों में रह रहे थे जबकि उसका घर सर्व सुविधा युक्त था उसकी बेटी सानिया तथा बेटा शिवम प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे।उसके घर में ट्यूब वेल लगा हुआ था तथा दो पानी के संग्रहण करने भूमिगत टैंक भी बने हुए थे। नंदलाल ने आठवीं की परीक्षा दी थी तब उसके पिता पूनमचंद का करंट लगने से दुखद निधन हो गया था वे किसी के खेत में मजदूरी से रात में गेंहू की फसल की सिंचाई करने गए थे वहीं उन्हें करेंट लग गया आसपास कोई नहीं था करंट लगने से उनकी रात में ही मौत हो गई सुब्ह जब किसान अपने खेतों की ओर गए तब उन्होंने पूनमचंद जी का मृत शरीर देखा । पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट से पता चला कि उनकी मौत करेंट लगने सु हुई है नंदलाल की उम्र उस समय मात्...

कहानी: प्रमोशन न मिलने का दुख

रतनपुर के सरकारी स्कूल में सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत रहे लीलाकिशन तिरतालीस साल की नौकरी करने के बाद उसी पद से रिटायर हो गए थे जिस पद से उन्होंने अपनी नौकरी की शुरूआत की थी। सेवानिवृति के समय उन्हें एक ही बात का दुख था कि उनको एक भी प्रमोशन नहीं मिला था जबकि वे प्रथम श्रेणी में हिन्दी में एम ए थे तथा उन्होंने एम एड भी प्रथम श्रेणी में किया था वे एक उत्कृष्ट शिक्षक थे फिर भी प्रमोशन से वंचित रहे थे। पूरे जिले में उन जैसा हिन्दी का मर्मज्ञ शिक्षक और कोई नहीं था फिर भी वे पहली क्लास पढ़ाने वाले शिक्षक का कार्य कर रहे थे। लीलाकिशन जी का मुकद्दर ने शुरू से ही साथ नहीं दिया था एम ए करने के बाद उन्हें एक प्राइवेट कॉलेज में सहायक प्राध्यापक के पद पर चार्य करने का अवसर मिल रहा था पर वे अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने का मोह नहीं त्याग सके। बाद में उस कॉलेज का सरकार ने अधिग्रहण कर लिया और उनसे कम अंकों से पास होने वाला उनसे जूनियर,रविकाँत सरकारी सहायक प्राध्यापक बन गया उनकी हायर सेकेण्डरी में शिक्षाकर्मी वर्ग एक की नौकरी भी लग रही थी पर उसमें भी उनकी यह सरकारी नौकरी आड़े आ गई बाद में उनका...

कहानी: पराजित

नवीन कुमार जबसे विधानसभा चुनाव हारे थे तभी से उनके रुतबा खत्म हो गया था। अब वे पूर्व विधायक होकर रह गए थे। उनकी पार्टी पूरे प्रदेश में चुनाव हार गई थी। अब उनकी पार्टी की प्रदेश में सरकार नहीं थी जिसका उन्हें बहुत नुक्सान उठाना पड़ा था। उनका लड़का प्रवीण जो किसी से सीधे मुँह बात तक नहीं करता था वो अब धरातल पर आ गया था। जब नवीन कुमार जी विधायक थे तब उनके जलवे ही कुछ और थे। उनकी पार्टी सत्ता में थी, वे मुख्यमंत्री जी के खास थे जिनका उन्हें बहुत लाभ मिलता था। वे कोई ईमानदार नेता तो थे नहीं। उन्होंने अपने कार्यकाल में खूब पैसा कमाया था। प्रवीण लेनदेन की बात करता था। नवीन जी किसी को विधायक निधि से पैसा भी देते थे तो उसके बदले में तीस प्रतिशत की रकम पहले ही ले लेते थे। उनके भ्रष्टाचार के चर्चे जनता में आम थे मगर कभी उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई थी। जबकि वे जब पहली बार विधायक चुने गए थे तब उनकी छवि बहुत अच्छी थी। तब जनता ने उन्हें आगे आकर जिताया था। चुनाव में उनका ज्यादा रुपया भी खर्च नहीं हुआ था। लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्होंने जब अपना रंग बदला तो जनता भी हैरान हो गई थी। उन्होंने पाँच सालों...

कहानी: बेबसी

सोहनलाल सब्जी उत्पादक किसान था लेकिन पिछले कुछ दिनों से सब्जी के दामों में गिरावट से परेशान था। सब्जी तड़ाई तथा मंडी लाने का खर्च तक नहीं निकल पा रहा था जिसके कारण वो घोर आर्थिक संकट से घिर गया था। इससे बचने के लिए उसने ई रिक्शा ले लिया था जिससे उसको एक निश्चित नियमित आय होने लगी थी। कुछ क्षतिपूर्ति वो दूध बेचकर भी कर रहा था। गत वर्ष सोहनलाल ने अपने खेत में लहसुन प्याज की खेती की थी। उस समय फसल का उत्पादन कम हुए था। मौसम की मार का भी फसलों के उत्पादन पर असर पड़ा था। जिसके कारण उसे सरकार से मुआवजा भी अच्छा मिला था। तथा भाव अच्छे होने के कारण उसे लाभ भी अच्छा हुआ था लेकिन इस बार स्थिति विपरीत हुई। मौसम अनुकूल रहने के कारण बंपर फसल हुई थी जिसके कारण मंडी में सब्जियों की आवक बहुत ज्यादा हो गई और दामों में गिरावट ने सोहनलाल की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। सोहनलाल ने जब अपने खेत में टमाटर की फसल बोई थी उस समय टमाटर सौ रुपये किलो बिक रहा था, मटर ढाई सौ रुपये, हरा धनिया तीन सौ रुपये और हरी मिर्च डेढ़ सौ रुपये किलो थी। सोहनलाल ने अपने खेत में इन फसलों को उगाया था। फसलों की ब...

कहानी: मौसी

रूपा मौसी ने जीवन में बहुत दुख उठाए थे। शादी के चार साल बाद उनके पति देवेन्द्र का दुर्घटना में दुखद निधन हो गया था। तब उनका बेटा और बेटी बहुत छोटे थे। उनके पति शिक्षा विभाग में शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। रूपा मौसी अधिक पढ़ी लिखी तो थी नहीं इसलिए उन्हें अनुकंपा नौकरी में चतुर्थ श्रेणी का भृत्य का पद मिला था और वो छोटी सी नौकरी कर अपने बच्चों की परवरिश करती रहीं थीं। आज रूपा मौसी बहुत दुखी थीं। उनकी बहन की बड़ी लड़की कनुप्रिया की शादी थी। जिसमें उन्हें इसलिए नहीं बुलाया गया था क्योंकि वे छोटे पद पर कार्यरत थीं और उनकी बहन उन्हें अपने रिश्तेदारों से नहीं मिलाना चाहतीं थीं। वैसे रूपा मौसी स्वभाव की बहुत अच्छी थी। अपनी बहन के दोनों बच्चे उनके पास ही रहकर पढ़े थे। कनुप्रिया ने बी एड रूपा मौसी के घर रहकर ही किया था तथा रूपा जी के पास रहकर पी जी टी की तैयारी की थी। वहीं से कनुप्रिया की केन्द्रीय विद्यालय में पी जी टी की नौकरी लगी थी। कनुप्रिया ने तब कहा था मौसी आप मेरी माँ से भी बढ़कर हो आपने ही मुझे पढ़ा लिखाकर इस योग्य बनाया है। तब मौसी ने कहा था यह तो मैंने अपनी खुशी के लिए किया ह...

कहानी: चाची का मकान

शहर की घनी बस्ती में दुर्गा चाची का छः सौ वर्गफीट के भूखण्ड पर तीन मंजिला मकान था जिसका अठारह हज़ार रुपये प्रतिमाह किराया आता था जिसमें चाची आराम के साथ रहतीं। उसी मकान को दुर्गा चाची के लड़के अखिल ने चाची के निधन के तीन महीने बाद चालीस लाख रुपये में बेच दिया था। अखिल का शहर की अशोक विहार कॉलोनी में काॅनर्र पर चौबीस सौ वर्गफीट का मकान था जिसमें दो तरफ सड़क थी। तथा उस मकान में नीचे आठ दुकानें थी। वो मकान भी तीन मंजिला था जिसका डेढ़ लाख रुपये प्रतिमाह किराया आता था। अखिल कोई काम नहीं करता अखिल की पत्नी पोस्ट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी करती थी। अखिल का अशोक विहार कॉलोनी का मकान भी दुर्गा चाची और उनके पति भुवन चाचा ने मिलकर बनवाया था जिसमें अखिल अपने परिवार सहित सुख से रह रहा था। दुर्गा चाची के पति भुवन चाचा का निधन तीन साल पहले हो गया था। तब चाची अखिल के पास रहने आ गई थी। उस समय अखिल ने चाची पर शहर की घनी बस्ती वाला मकान बेचने का दवाब बनाया था। चाची को भुवन जी के निधन का सदमा था वे भी मकान बेचकर अखिल के साथ ही रहने को तैयार हो गईं थी। उस दौरान वे एक महीने अखिल और बहू के साथ रही थीं। उस एक म...

कहानी: चाचा के अहसान

छः भाईयों में सबसे छोटे बैजनाथ चाचा शहर के हायर सेकेण्डरी स्कूल में पिछले बीस वर्षों से कामर्स के व्याख्याता के पद पर कार्यरत थे। बैजनाथ जी बचपन में पोलियो के शिकार हो गए थे तथा एक बैशाखी के सहारे चल लेते थे। बैजनाथ जी ने अपने पाँचों भाईयों के बच्चों को अपने घर में रखकर पढ़ाया लिखाया था और उन्हें कामयाब इंसान बनाया था। उनके कारण गाँव में उनके सभी भाई संपन्न परिवार की श्रेणी में आते थे। सभी भाईयों के गाँव में पक्के मकान थे, जमीन जायदाद थी। बैजनाथ चाचा ने होमलोन लेकर शहर में अपना मकान बनवाया था जिसमें अपने भाईयों से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली थी। बैजनाथ चाचा जब बहुत छोटे थे तब पोलियो से ग्रस्त हो गए थे। गाँव में उनका इलाज ठीक से नहीं हुआ था इसलिए उम्र भर के लिए दिव्यांग हो गए थे पर वे पढ़ने में होशियार थे। बैजनाथ जी के पिताजी उमानाथ जी ने भी उनकी पढ़ाई पर बहुत ध्यान दिया था। उनके बाकी पाँच लड़के आठवीं पास होकर ही रह गए थे। उमानाथ जी के पास नदी किनारे की तीस एकड़ सिंचित जमीन थी जिस पर पाँचों भाई खेती करते थे। उमानाथ जी ने सबको छः-छः एकड़ जमीन बाँट दी थी बस बैजनाथ जी ने जमीन में अपना हि...

कहानी: अपने घर में

विकासखण्ड में बड़े बाबू के पद से सेवानिवृत हुए राकेश गुप्ता जी ने पूरे एक साल बाद अपने खुद के नए मकान में आज गृहप्रवेश किया था। इस अवसर पर उन्होंने एक छोटा सा आयोजन भी किया था। आज वे बहुत खुश थे उनका चेहरा खुशी से दमक रहा था। उन्होंने अपना सरकारी क्वार्टर भी खाली कर दिया था। राकेश गुप्ता जी ने विकास खण्ड कार्यालय में पूरे चौंतीस साल तक नौकरी की थी। नौकरी के शुरू में ही उन्हें सरकारी क्वार्टर मिल गया था। उसी में उनकी शादी हुई थी तथा वे अपनी पत्नी शीला को ब्याहकर लाए थे। उनके एक बेटा रोहित तथा एक बेटी रुचि थी दोनों की शादी उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के पूर्व ही कर दी थी। बेटी अपनी ससुराल में अपने पति के साथ खुशीपूर्वक रह रही थी। रोहित और उसकी पत्नी रिया उनके साथ ही रह रहे थे। रोहित प्राइवेट में जॉब कर रहा था तथा रिया एक निजी स्कूल में शिक्षक के पद पर कार्यरत थी। राकेश बाबू ने अपनी कमाई गृहस्थी की गाड़ी चलाने में लगा दी थी। उनके पास कभी इतने रुपये नहीं जुड़ सके थे कि वे अपना मकान बना सकें। बीस साल पहले उन्होंने पंचवटी काॅलोनी में बारह सौ वर्ग फीट का एक आवासीय भूखण्ड लोन से खरीद लिया थ...

कहानी: कटु अनुभव

अशोक दस वर्ष पूर्व अपनी ससुराल में घर जँवाई बनकर रहा था। मात्र छः महीने में उसे इतने कटु अनुभव हुए कि वो ससुराल से आने के बाद दस वर्षों में फिर कभी अपनी ससुराल नहीं गया ना ही उसकी पत्नी सुनीता ने कभी उसे ससुराल ले जाने पर जोर दिया। उसके साथ गुलामों से भी अधिक बुरा बर्ताव किया गया था। अशोक की शादी जब सुनीता के साथ हुई थी तब कुछ दिनों तक अशोक का अपनी ससुराल में खूब आदर सत्कार हुआ था जिससे अशोक बहुत प्रभावित था। अशोक ठेकेदार के यहाँ राज मिस्त्री का काम करता था। एक दिन जब अशोक अपनी ससुराल में था तब उसके ससुर ओम प्रकाश ने उससे पूछा दिन भर ठेकेदार के यहाँ काम करते हो इसके बदले में ठेकेदार तुम्हें कितने रुपये देता है। अशोक ने कहा चार सौ रुपये, सुनकर ओमप्रकाश ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा बस चार सौ ही रुपये उसमें घर का खर्च कैसे चलता होगा पूरे ग्यारह घंटे खर्च करने के बाद मात्र चार सौ रुपये की कमाई तो बहुत कम है। फिर ओमप्रकाश बोला मुझे देखो रोज तीन घंटे से ज्यादा काम नहीं करता फिर भी एक हज़ार रुपये रोज कमा लेता हूँ। ओमप्रकाश सब्जी का ठेला लगाता था। सुबह सात बजे सब्जी मंडी जाता वहाँ से ताजी सब्...

कहानी: अपनों का दंश

आखिर विधवा कुसुम के बेटे दीपक की शादी आज संपन्न हो ही गई थी। बेटे की शादी से कुसुम बहुत खुश थी। शादी में खास अपनों ने ही अड़ंगे लगाए थे जिसके कारण दीपक का रिश्ता बनते बनते टूट गया था। कुसुम की दोनों बेटियों की शादी पहले ही हो चुकी थी उसमें इतनी परेशानी नहीं आई थी जितनी दीपक की शादी में आईं। कुसुम के पति उमेश शिक्षा विभाग में बड़े बाबू के पद पर कार्यरत थे। उनका निधन पच्चीस वर्ष पहले हो गया था तब दीपक की उम्र दो साल की थी तथा उससे बड़ी बेटी ज्योति पाँच साल की और सबसे बड़ी बेटी कोमल आठ साल की थी। पति के निधन से कुसुम के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। कुसुम ज्यादा पढ़ी लिखी तो थी नहीं इसलिए उसे जो पति के स्थान पर अनुकंपा नौकरी लगी वो भृत्य की थी। जिसे स्वीकार करना उसकी मजबूरी थी। कुसुम ने तीन साल तक अकेले ससुराल एवं मायके से दूर रहकर नौकरी की लेकिन जब उसकी बेटी कोमल की तबियत ज्यादा खराब हो गई तब कुसुम के पिताजी घनश्याम जी उन्हें अपने घर ले आए। यहाँ उन्होंने कुसुम को घर बनाने के लिए खाली जगह दी जिसमें कुसुम ने छोटा सा घर बनवा लिया तथा अपने तीनों बच्चों के साथ उसम...

कहानी: चुनावी रंजिश

वीरपुर गाँव के सुखराम सेन चुनावी रंजिश के कारण पिछले छः माह से परेशान थे। उनकी गाँव में हेयर कटिंग की दुकान थी उसकी ग्राहकी भी चौपट हो गई थी। कोई उनको मजदूरी तक नहीं दे रहा था पर दो दिन पूर्व हुए समझौते के बाद अब कहीं उन्हें राहत मिली थी। गलतफहमी दूर होने पर यह संभव हुआ था। छः माह पूर्व की बात है गाँव में पंचायत चुनाव का दौर चल रहा था। चुनाव में गाँव के दबंग नेता और संपन्न तथा प्रभावशाली किसान किशन लाल भी सरपंच पद के प्रत्याशी थे साथ ही वे जनपद सदस्य का चुनाव भी लड़ रहे थे। सुखराम के परिवार के छः वोट थे जिस पर किशनलाल अपना हक समझते थे। सुखराम ने भी उन्हें ही वोट देने का वादा किया था लेकिन चुनाव के दो दिन पूर्व सुखराम को अपनी ससुराल जाना पड़ा क्योंकि उसकी सास की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी। सुखराम ने सोचा था कि एक दिन वहाँ रुककर वो वोट डालने आ जाएगा लेकिन ऐसा हो नहीं सका। खास चुनाव के दिन ही सुखराम की सास का निधन हो गया और सुखराम ससुराल का होकर ही रह गया। जब अंत्येष्टी हुई तब तक मतदान का समय खत्म हो गया था। मतदान के बाद वोटों की गिनती हुई जिसमें सरपंच का चुनाव किश...

कहानी: गुणवत्ता

मनोहर लाल दस वर्ष पहले जिस नमकीन बनाने वाले प्लांट में काम करते थे आज उसे बंद हुए पाँच वर्ष हो गए थे जबकी मनोहर लाल जी के द्वारा घरेलू उद्योग के तहत तैयार नमकीन दुर्गानगर की पहचान बन चुका था। मनोहरलाल जी ने यह काम मालिक द्वारा उन्हें नौकरी से निकाले जाने के बाद घरेलू उद्योग के अंतर्गत शुरू किया गया था। अपनी गुणवत्ता और अनोखे स्वाद के कारण मनोहरलाल जी के द्वारा तैयार नमकीन ओर चिवड़े की शहर में बड़ी माँग रहती थी। हालत यह थी दिनभर में वे जितना माल तैयार करते थे वो कुछ घंटों में ही बिक जाता था। रात को तैयार माल सुबह ग्यारह बजे तक उठ जाता था। मनोहर लाल जी का जब खुद का बिजनेस नहीं था तब वो जहाँ काम करते थे उनकी गुणवत्ता से वे संतुष्ट नहीं थे। मालिक ज्यादा लाभ कमाने के फेर में माल की क्वालिटी गिराने में कोई झिझक नहीं करते थे। उनका बेसन घटिया था जो आधी कीमत पर बाजार में मिल जाता था। इसी तरह वे घटिया खाद्य तैल का उपयोग भी कर रहे थे। उनके मसाले घटिया थे। जब माल तैयार होता तो देखने में वो अच्छा लगता था पर उसका स्वाद अच्छा नहीं था। मनोहर लाल जी कई बार सेठजी से कह चुके थे कि माल की क्...

कहानी: छोटी सी दुकान

राजेन्द्र की बस स्टैण्ड पर चाय समोसा पोहा जलेबी की छोटी सी दुकान थी। इस दुकान को खोले हुए उसे पाँच वर्ष ही हुए थे पर इस दुकान ने उसे गरीबी तथा बेरोजगारी से उबार दिया था। उसकी शादी हो गई थी और वो दो बच्चों का पिता भी बन गया था। राजेन्द्र के पिता रमेश कृषि विभाग में क्लर्क थे। वे सात साल पहले रिटायर हुए थे यह बात तभी की है। तब नगरपालिका ने बस स्टैण्ड से अतिक्रमण हटाया था। उससे जो जगह निकली थी उस पर नगर पालिका ने दुकानें बनवाईं थीं। दुकानें तैयार होने के बाद उनकी नीलामी की तारीख नगर पालिका ने निर्धारित की थी। उस नीलामी में हिस्सा लेने के लिए रमेश जी भी पहुँच गए थे। इसकी सूचना उन्होंने किसी को भी नहीं दी थी। सारी दुकाने नीलाम होती जा रही थीं। उन दुकानों में एक आठ बाई आठ फुट की सबसे छोटी दुकान भी थी जिसे लेने में किसी की रूचि नहीं थी। उसे रमेश जी ने तीन लाख रुपये में ले लिया था। जब यह ख़बर रमेश जी ने घर पर सुनाई तो सब उन पर बहुत नाराज हुए। पत्नी बोली कौन चलाएगा वो दुकान रिटायरमेन्ट के तीन लाख रुपये बर्बाद कर दिए इससे अच्छा तो घर की मरम्मत ही करा लेते। इस बुढ़ापे में आप क्या दु...

कहानी: अभागी

रजनी ने तीस साल पहले नर्सिंग में बी एस सी की थी और आज भी वो साढ़े बाइस हज़ार रुपये प्रतिमाह वेतन पर शहर की पिछड़ी बस्ती में स्थित एक निजी जन आरोग्य अस्पताल में नर्स की नौकरी कर रही थी। नौकरी करना उसकी मजबूरी बन गई थी। उसकी उम्र छप्पन वर्ष की हो गई थी परिवार चलाने में उसका यह छोटा सा वेतन बहुत अहम भूमिका अदा कर रहा था। अस्पताल के मालिक एवं डॉक्टर रमेश राय सुबह शाम तथा दोपहर को कुछ देर के लिए आते थे बाकी समय अस्पताल नर्स एवं रेसिडेन्शियल डॉक्टर के हवाले रहता था। डॉ राय की पत्नी डॉ प्रमिला स्त्री तथा प्रसूति रोग विशेषज्ञ थी। वो थोड़े अधिक समय तक अस्पताल में रहती थीं। रजनी ने बाइस साल पहले इस अस्पताल में छः हजार रुपये प्रतिमाह वेतन से नौकरी की शुरूआत की थी। तीस साल पहले रजनी को बड़े अस्पताल में अच्छे वेतन पर नर्स की नौकरी मिल रही थी। तभी उसके पापा अशोक ने उसकी शादी राजेश जी से कर दी जो कपड़ा मिल में नौकरी करते थे। उनको अच्छी तनख्वाह मिल रही थी यह सोचकर उन्होंने रजनी को नौकरी नहीं करने दी। आठ साल में रजनी के यहाँ बेटी रवीना तथा बेटा रवीश का जन्म हो गया। इधर राजेश की कपड़ा मिल अचानक बंद ...