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जनवरी, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: जीवन साथी

रजनी दस साल पहले अपने जीवन से तंग आकर रात के दो बजे कुएँ में डूबकर आत्महत्या करने जा रही थी। रास्ता सुनसान था और वो तेजी से कदम बढ़ा रही थी। उसे जाते हुए राकेश ने देखा तो पहले तो वो डरा फिर उसने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। कुएँ की तरफ तेजी से बढ़ते हुए देखकर राकेश को उसके इरादे भाँपते हुए एक पल की भी देरी नहीं लगी और उसने उसके छलाँग लगाने से पहले ही उसे पकड़ लिया था। वही रजनी आज राकेश की पत्नी थी तथा राकेश के दोनों बच्चों की माँ भी। हाइवे पर उनकी छोटी सी होटल थी जिसमें उनकी गुजर बसर आराम से चल रही थी। रजनी की जान बचाने पर पहले तो वह राकेश पर खूब गुस्सा हुई फिर बेबसी से रोने लगी। पूछने पर उसने राकेश को बताया कि उसके पिताजी ने चार साल पहले उसकी शादी सोमेश से की थी। शादी के चार साल बाद तक भी जब रजनी को कोई बच्चा नहीं हुआ था तब सोमेश तथा उसके माता पिता की नजर से रजनी उतर चुकी थी, वो उसे छोड़कर सोमेश की शादी कहीं ओर करना चाहते थे। सोमेश का बर्ताव भी बदल गया था आखिर एक दिन सोमेश ने श्यामली से शादी कर ली और उसे घर ले आया।रजनी का विरोध कमजोर होता चला गया। एक दिन स...

कहानी: आठ लड़के

हर स्वरूप के आठ लड़के थे। आठों लगभग अनपढ़ तथा जाहिल थे जबकि उसके छोटे भाई किशन स्वरूप के एक ही लड़का था अजय। दोनों भाइयों के पास पच्चीस पच्चीस एकड़ जमीन थी पूरा परिवार खेती करता था। किशन स्वरूप के पिताजी रामस्वरूप के निधन के बाद से दोनों भाइयों के बीच अक्सर तनाव की स्थिति निर्मित होने लगी थी। तनाव का मुख्य कारण यह था कि अजय के पास पूरी पच्चीस एकड़ जमीन थी। बाकी आठों भाइयों के पास कुल तीन तीन एकड़ जमीन ही थी। वे खेती के कार्य में भी लापरवाही बरतते थे। जिसके कारण उन्हें आठ आठ महीने दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था। अजय अच्छी तरह जानता था कि अगर वो कमजोर रहा तो यह सारे भाई उसे मारपीट कर भगा देंगे तथा उसकी सारी जमीन छीन लेंगे। इसलिए उसने दिमाग से काम लेना शुरू किया। उन्हें गाँव में कोई कर्ज नहीं देता था अजय ने पक्की लिखापड़ी करके उन्हें कर्ज देना शुरू कर दिया और धीरे धीरे सारे भाईयों की सारी जमीन अजय ने खरीद ली। इसके साथ ही उसने पेट्रोल पंप खोल लिया, वेयर हाउस खोल लिया तथा आटा, मैदा मिल भी खोल ली। आठों भाइयों को उसने अच्छे वेतन पर मिल में का...

कहानी: बेगुनाह का बचाव

करन सिंह जी की अलीपुर के बी आर सी कार्यालय में बी ए सी के पद पर नवीन नियुक्ति हुई थी। उनकी नियुक्ति से सबसे ज्यादा दुखी बी आर सी सी के चहेते दिनेश हुए थे। दिनेश की खुद इस पद पर नियुक्ति होने वाली थी। इसके लिए उन्होंने बी आर सी सी को रिश्वत के रूप में बड़ी राशि भेंट भी की थी। दूसरी ओर बी आर सी सी वो सारी राशि हजम कर गए थे जो अब लौटाना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की जिसके वे खुद ही शिकार हो गए थे। घटना कुछ इस प्रकार है- मदन कान्वेन्ट स्कूल की मान्यता के लिए बी आर सी सी ने लंबी रिश्वत की माँग की थी जो स्कूल के संचालक रमेश जी को अखर रही थी। उन्होंने इसकी शिकायत लोकायुक्त को कर दी थी। लोकायुक्त ने रंगे हाथों पकड़ने के लिए राशि अपनी ओर से बी आर सी सी के पास भिजवाई थी। पीछे पूरी टीम सतर्क थी। बी आर सी सी को कुछ खटका लग रहा था। इसलिए उन्होंने करन सिंह जी को जिन्होंने घंटे भर पहले कार्यभार ग्रहण किया था उन्हें लिफाफा लेने चाय की दुकान पर भेज दिया था। लेकिन स्कू...

कहानी: आखिर लेना ही पड़ा अवकाश

रमेश चंद्र गंभीर बीमारी से पीड़ित होते हुए भी अपनी नौकरी बिना नागा किए पूरी कर रहे थे पर अचानक उनको तेज बुखार ने घेर लिया। कोशिशों के बाद भी वे नौकरी पर जा नहीं पाए। छब्बीस जनवरी का पर्व नजदीक था जिसमें अपनी उपस्थिति वे अनिवार्य समझते थे। रमेश चंद्र जी ने अभी तक चार सी एल का ही लाभ लिया था। अभी उनकी नो सी एल बाकी थी जो उनके रिटायरमेन्ट के बाद बेकार होना थी। फिर भी उनको सी एल लैने का बहुत दुख था। चाहते साथ जाना बैटे को लेकर जो वो भी उसी बुखार से पीड़ित हुआ था। आखिर छब्बीस जनवरी को उनसे रहा नहीं गया ओर वे हिम्मत जुटाकर चल ही पड़े। सत्ताइस किलोमीटर का सफर था कई बार मोटरसायकिल काबू से बाहर हुई दुरघटना होते होते बची फिर भी वे आयोजन में शामिल हो ही गए। वहाँ से जैसे तैसे घर तो आ गए। लेकिन जो बुखार ने जकड़ा तो वे रिटायरमेन्ट के दिन तक भी ठीक न हो सके। बेटा उनको ऐसी स्थिती में ही लाया। इसके वे पन्द्रह दिन बाद ठीक हो सके थे। ***** रचनाकार प्रदीप कश्यप

कहानी: सरपंच की बहू

दबंग नेता एवं हरबपुर गाँव के सरपंच अमर सिंह की बहू निशा जबसे स्कूल शिक्षक बनकर आई है तबसे उस स्कूल में कोई अधिकारी झाँका तक नहीं है। उनके सामने सारे नियम फेल हैं। जिले के सारे अधिकारी उनकी कृपा  प्राप्त करना चाहते हैं। उसका कारण यही की वह रूलिंग पार्टी को सबसे अधिक चंदा देते रहे हैं। उनकी बहू सिर्फ बीए पास थी पर चयन कमेटी ने फिर भी उसका चयन कर लिया था। तबसे बहू एक दिन भी स्कूल नहीं गई थी। हर महीने प्रधानाध्यापक रजिस्टर लेकर उनके पास जाते थे वे तब उसमें महीने भर के दस्तखत करती थीं। अमर सिंह पिछले तीस सालों से उस गाँव के सरपंच थे। उनके सिवा गाँव में एक पत्ता तक भी नहीं हिलता था। ऐसकी वजह से कोई अधिकारी रिश्वत की मांग कर नहीं सकता था। पिछले दिनों अमर सिंह को तेज हार्टअटेक आया था जिससे वे तीन महीने अस्पताल में भर्ती रहे थे। उन दिनों गाँव के स्कूल की बिलडिंग बन रही थी जिसमें वे ऐक रुपये का भी घपला नहीं कर पाए थे। इसका उन्हें बहुत अफसाॅस था। जबकि प्रधानाध्यापक महोदय खूब खुश थे। जिसकी सजा ये मिली की सरपंच ने उनका तबादला करवा दिया था जिससे प्रधानाध्यपक बहुत खुश थे। उनके जाने...

कहानी: फौजियों का आत्म बलिदान

अजीत नगर में देश पर आत्म बलिदान करने वाले लेफ्टीनेन्ट परमवीर चक्र विजेता अजीत सिंह का समाधि स्थल था जिसमें हर वर्ष भव्य मेले का आयोजन किया जाता था जिसमें तीन दिन तक दूर दूर से लोग आकर उनकी समाधि के दर्शन करते थे तथा उनके जैसे देश भक्त बनने की कामना करते थे। देश ने पिछला युद्ध उनको सूझ बूझ तथा अपने साथ आठ सैनिकों के आत्म बलिदान के परिणाम था। बात उन दिनों की है जब दुश्मन देश से युद्ध चल रहा था। भारतीय सैनिक उन पर भारी पड़ रहे थे इसलिए वे बौखलाए हुए थे और भारतीय सेना को भारी क्षति पहुँचाना चाहते थे। लेफ्टीनेन्ट अजीत सिंह दुश्मन की चौकियाँ फतह करते हूए दुश्मन देश की सीमा में बहुत अंदर तक आ गए थे और दुश्मन के हजारों सैनिकों के बीच घिर चुके थे। उनके पास का गोला बारूद खत्म हो गया था। मदद मिलने की कोई गुंजाइश नहीं थी तभी लाँस नायक सुधीर ने देखा कि दुश्मन का सैनिक उनकी तरफ हैंड ग्रेनेड फेंकने वाला है। सुधीर ने बिजली की फुर्ती से उसपर छलाँग लगा दी। वो ग्रनेड वहीं फट गया सुधीर के साथ दुश्भन के सत्रह सैनिक काल के गाल में समा गए। दुश्मनों के बीच कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। इसका लाभ...

कहानी: शाला भवन की पुताई

रमेश चन्द्र जी सेमल गाँव की माध्यभिक शाला के प्रभारी थे उन्हें अधिकारियों के द्वारा सख्त निर्देश मिले थे कि छब्बीस जनवरी से पहले शाला भवन की पताई हो जाना चाहिए अन्यथा कार्यवाही की जाएगी वे पिछले आठ दिनों से परेशान थे पुताई में उनकी जेब से पूरे अठारह हज़ार रुपये लग गए थे। शासन द्वारा पुताई के लिए नौ हज़ार रुपये की राशि दी गई थी जबकि पुताई में पूरे सत्ताइस हजार रुपये खर्च हुए थे।  रमेशचंद्र जी जबसे शाला प्रभारी बने हैं तबसे हर महीने उनकी जेब से पाँच से सात हजार रुपये खर्च हो रहे हैं जिनकी कभी भरपाई नहीं होती इसके बाद भी आए दिन स्कूल में निरीक्षण करने आए अधिकारी उन्हें डरा धमका कर चले जाते हैं जबकि वे उन्हें अपनी जेब से चाय नाश्ता कराते हैं तब भी उनका व्यवहार ठीक नहीं रहता इसके बाद भी उनकी निरीक्षण जी में कोई सकारात्मक टिप्पणी लिखकर नहीं जाते। शिक्षण सत्र समाप्ति की ओर जाने पर अब शाला निधि के नाम से शासन ने मात्र पच्चीस हज़ार रुपये वेन्डरों के खाते मे जमा किए थे। उनमें से दो हज़ार रुपये अधिकारियों ने वेन्डरों से सीधे हड़प लिए थे । पैसे जमा करने के तुरंत बाद शाला भवन की पुताई क...

कहानी: नई नौकरी

तीन साल पहले एम बी ए करने के बाद रोहित को जिस कंपनी में प्लैसमेन्ट में असिस्टेन्ट मार्केटिंग मेनेजर बनाया था। तब उसका पैकेज चार लाख रुपये था। आज वही रोहित कंपनी का सीनियर मार्केटिंग मैनेजर था और अब उसका सलाना पैकेज चालीस लाख रुपये था। उसने अपनी योग्यता के बल पर यह पद और वेतन हासिल किया था। जबकि उसके साथ ही छः लाख रुपये सालाना पेकेज पर नियोजित नितेश के वेतन में मात्र एक लाख रुपये की ही बढ़ोतरी हुई थी इसके बाद भी कंपनी उसे नौकरी से निकालने की सोच रही थी। दूसरी ओर रोहित को कई बड़ी कंपनी वाले दोगुने पैकेज पर रखने को तैयार बैठे थे। तीन साल पहले जब रोहित के पास आउट होने में महज चार महीने बचे थे तब रोहित का ऐसी कंपनी में प्लेसमेन्ट हुआ थाह रोहित के नीतेश से कम नंबर होने पर कम पैकेज मिला था जबकि नितेश को डेढ़ गुना। पर रोहित की परफार्मेन्स कई गुना अच्छी थी इसका रोहित को लाभ मिला था। नौकरी के शुरुआती दिनों में कंपनी ने रोहित को तीन दिन के लिए मुंबई भेजा था। इसके अलावा नितेश को तीन दिन के लिए कलकत्ता। नितेश ढाई दिन में ही लौट आया था। और जो उसे भत्ते के पैसे दिए थे वो भी उसने आधे लौटा दिए थे। कंपन...

कहानी: मजबूरी का फायदा

रतनसिंह को पीलिया की बीमारी हो गई थी जिसका इलाज के नाम पर उसके अपने ही सगे भाई धीरप सिंह ने पाँच लाख रुपये हड़प लिए थे। बाद में उन पैसों से दुकान खोल ली थी। बीमारी के बाद रतनसिंह की आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी। उनकी पत्नी दूसरों के घर के बर्तन माँझकर घर का खर्च चला रही थी। धीरप सिंह ने तो इलाज के नाम से भाई को कंगाल बनाकर उससे कन्नी काट ली थी। रतनसिंह को बाद में भाई की साजिश का पता चला था। लेकिन वे क्या कर सकते थे। धीरप सिंह रतन सिंह से दो साल छोटा था। उनके पिताजी रामसिंह खेतिहर मजदूर थे। रतनसिंह ने गाँव के सरकारी स्कूल में आठवीं तक की पढ़ाई की थी। इससे आगे पढ़ाने में रामसिंह ने अपनी असमर्थता जताई थी। हारकर रतन सिंह को अपनी पढ़ाई छोड़ना पड़ी थी। वो पटेल दुर्गा सिंह के पशु चराने के काम में लगा दिया गया था। धीरप सिंह शुरू से ही आवारा था। स्कूल में नाम तो उसका भी लिखाया था पर वो कभी स्कूल नहीं गया था। इसके बाद भी वो माँ बाप का चहेता था। पिताजी ने रतनसिंह की शादी करके उसे घर से अलग कर दिया था। रतनसिंह रोज सायकिल से शहर जाते तथा वहाँ भवन निर्माण कार्य में मजदूरी करते थे। तेज दिमाग होने के कार...

कहानी: स्मृति शेष

प्रकाश सर अस्सी व्रष की उम्र में मृत्यु को प्राप्त होने वाले सेवानिवृत प्रधानाध्यापक हरीष जी की अंत्येष्टि में शामिल, होने के बाद घर आए थः और उन्हीं की स्मृतियों में खोए हुए थे प्रकाश सर उनके साथ,पन्द्रह वर्ष तक मीर,गाँव के स्कूल में टीचर रहे थे हरीश सर ,बहुत अच्छे इंसान थे उनकः साथ प्रकाश सर की बहुत यादें जुडी सुई थीं। प्रकाश सर,की तब नई नौकरी,लगी थी तब वे मीरगंज में ज्वाइन करने आए थे उस समय शाला प्रभारी हरीश सर थे हरीश सर की सादगी देखचर वे खुद चकित हो गए थे हरीश सर उसी गाँव के रहने वाले थे उनके पास पचास एकड़ उपजाऊ जमीन थी दो चार साल,में एकाध बार वे बैंक से अपना वेतन निकालते थे। लेकिन कभी उन्होंने अपनी संपन्नता पर अभिमान नहीं किया था उनके यहाँ पन्द्रह नौकर काम करते थे उन से वे परिवार की सदस्य की तरह व्यवहार करते थे उनमें से एक नौकर हरखू ने तो उन्हें बचपन में गोद में खिलाया था। उन्हें वे पिता के समान आदर,देते थे। मीरगाँव में हाईस्कूल था उसमें प्राचार्य का स्थानान्तरण हो जाने पर हरीश सर प्रभारी बन गए थे ।उन दिनों प्रकाश जी के पिताजी बीमार थे उनकी देखभाल में प्रकाश जी को ...

कहानी: प्रेमविवाह

सेवानिवृत्त व्याख्याता कमला जी ने साठ वर्ष पूर्व नरोत्तम जो से प्रेम विवाह किया था साठ वर्ष तक सुखपूर्वक वैवाहिक जीवन जीने के बाद दोनों का दो घंटे के अंतराल से निधन हो गया था कमला जी के निधन के दो घंटे बाद नरोत्तम जी ने भी आखिरी साँस ले ली थी। कमला जी की इच्छा थी कि वे सुहागन रहते हुए मृत्यु को प्राप्त हों जबकि नरोत्तम जी चाहते थे कि उनकी मौत कमला जी से पहले हो लेकिन दोनों की मौत,एक ही दिन होने से दोनों का एक साथ अंतिम संस्कार किया गया था नरोत्तम जी सेवानिवृत्त प्राचार्य थे उनकी उम्र पिच्यासी वर्ष थी जबकि कमला जी बयासी वर्ष की थीं। उनका भरा पूरा परिवार था बेटी दामान नाती पोतों से भरा परिवार था उनका। उनकी अंत्येष्ट में बड़ी संख्या में,लोग शामिल हुए थे एक सुहागन की तरह उनका अंतिम संस्कार किया गया था पूरे शहर में उनकी युगल,जोड़ी उदाहरण की तरह थी। साठ वर्ष पूर्व जब कमला जी की उम्र,बाइस वर्ष की थी बी एड करके वे रोशन पब्लिक स्कूल में टीचर बन गई थीं वहीं पर छः महीने पहले से नरोत्तम जी व्याख्याता के पद पर कार्यरत थे वो पुराना दौर था प्रेम विवाह न के बराबर होते थे ऐसे में जब लड़की लड़...

कहानी: छोटी सी बचत

गुलाबसिंह ने बीए करने के बाद पूरे दस साल तक पेपर मिल में नौकरी की थी। बाद में पेपर मिल बंद होने पर उसकी नौकरी छूट गई थी और वो पूरी तरह बेरोजगार हो गया था। ऐसे में जो दस वर्ष तक उसने दो सौ रुपय महीने की बचत की थी वो उसके बड़े काम आई थी। आज उसकी बदौलत उसकी शहर में अपनी इलेक्ट्रानिक्स की दुकान थी। बात बारह वर्ष पुरानी है तब गुलाब सिंह की नौकरी पेपर मिल में लगी ही थी। उसका एक सहपाठी दोस्त था दिनेश वो एक फाइनेन्स कंपनी में काम करता था। उसने गुलाबसिंह से कहा या कि वो अपनी तनख्वाह से छोटी सी बचत भी करेगा तो आगे चलकर बड़ी काम आएगी। गुलाब सिंह को बारह हजार रुपये महीना वेतन मिलता था। उसने दिनेश से कहा तेरा मन रखने के लिए मैं दो सौ रुपये प्रतिमाह की बचत करने को तैयार हूँ। दिनेश बोला ठीक है दो सौ रुपये ही सही। गुलाबसिंह ने अपना वादा निभाया था पूरे दस साल तक वो दो सौ रुपये प्रतिमाह दिनेश को देता रहा। उसने दिनेश से कभी ये नहीं पूछा कि वो इन रुपयों का क्या कर रहा है। उसकी तनख्वाह बढ़कर चालीस हजार हो गई तब भी उसने दो सौ रुपये से ज्यादा दिनेश को कभी नहीं दिए थे। इधर मिल बंद हो जाने से गुलाब सिंह की हाल...

कहानी: सहारा

नीरज कन्सट्रक्शन के मालिक नीरज गुपता आज शहर के धनाढ्य लोगों में गिने जाते लेकिन वे पन्द्रह साल पहले तक एक बिल्डर के यहाँ सिविल इंजीनियर के पद पर पन्द्रह हज़ार रुपये प्रति माह वेतन पर काम करते थे। लेकिन सोमवती अमावस्या पर होशंगाबाद में मिली सत्तर वर्षीया शारदा देवी ने उन्हें नौकर से सेठ बना दिया था। वे पूरे दस वर्ष तक नीरज के यहाँ नीरज की दादी बनकर रहीं थीं। नीरज ने उन्हें सहारा दिया था जिसके बदले मरने से पहले वे अपनी पूरी जमीन जायदाद नीरज के नाम कर गईं थीं। तब नीरज को पता चला था कि उसने जिन्हें बेबस गरीब बेसहारा समझकर सहारा दिया था वो करोड़ों रुपये की जमीन की मालिक थीं। बारह करोड़ रुपये तो उनके बैंक में जमा थे सात करोड़ रुपये के उनके पास जेवरात थे वे सब नीरज को दे गईं थीं। शारदा देवी के निधन के बाद पता चला कि वे महानगर से लगी पच्चीस एकड़ जमीन की मालिक थीं। उनके पति  सोहनलाल शेरपुर गाँव के सरपंच रहे थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। शारदा देवी अकेली करोड़ों की संपत्ति की स्वामिनी थी। इसके कारण कई मतलबी रिश्तेदार उनके हमदर्द बनकर उनकी जायदाद हड़पने के...

कहानी: फीकी मकर संक्रान्ति

रागिनी का इस बार का मकर संक्रान्ति का पर्व फीका मना हमेशा तीन दिन से अधिक मायके में रहने वाली शाम को ही दुखी मन से अपने घर आ गई थी माँ के निधन होने के कारण ऐसा हुआ था बाकी तो सब थे एक अकेली माँ ही तो नहीं थी पर उनके न होने ने रागिनी का त्यौहार फीका कर दिया था। रागिनी को पिछली मकर संक्रान्ति की याद आ रही थी जब उसकी माँ ने कई प्रकार के लड्डू बनवाए थे रागिनी और उसके दोनों बच्चों के लिए उनकी पसंद के कपड़े दिलवाए रागिनी को विदा करते समय पाँच हज़ार रुपये दिए थे साथ में बहुत सारा सामान भी भाभी भैया ने भी अच्छा व्यवहार किया था रागिनी का भतीजा मयंक तथा भतीजी महक ने भी उससे खूब बातें की थी वो बड़ी खुशी से तीन दिन मायके रहकर आई थी। माँ का पिछले वर्ष अगस्त में डेंगू के कारण दुखद निधन हो गया था माँ के देहावसान के अभी छः महीने ही हुए था मगर उसके मायके में सब कुछ बदल गया था रागिनी के पिता जगदीश बेटे बेटी में भेद करते थे माँ के जाने के बाद उन्होंने सारे जेवर और नगदी बहू बेटे को दे दी थी मकान अपने जीते जी बेटे के नाम कर दिया था पाँच एकड़ जमीन बहू के नाम कर दी थी दुकान भी अपने लडके को दे दी थ...

कहानी: बुढ़ापे के साथी

पिचहत्तर वरूष के मनीष और बहत्तर की मंजू बुढ़ापे में एक दूसरे के जीवन साथी बने थे। उनकी शादी हुए दस वर्ष हुए थे और दोनों पिछले दस वर्षों से सुखपूर्वक रह रहे थे। मंजू की यह पहली शादी थी जबकि मनीष जी की यह दूसरी शादी थी। पहली पत्नी मानसी की मौत मंजू से शादी होने के पाँच वर्ष पूर्व हो गई थी। पत्नी की मौत के बाद मनीष एकदम अकेले रह गए थे। ऐसे में मंजू ने उनका साथ दिया और शादी कर के उनके साथ रहने लगी। मंजू से मनीष की पहचान कोई नई नहीं थी। यह बात तब की है जब मंजू चौबीस वर्ष की थी और मनीष जी की उम्र सत्ताइस वर्ष की। दोनों एक प्राइवेट स्कूल में टीचर थे। मनीष शादी शुदा थे और मंजू कुँवारी। मंजू देखने में सुंदर थी तथा बहुत समझदार भी थी। मनीष जी का मंजू से ज़्यादा वास्ता नहीं था। वैसे भी मंजू साइंस की टीचर थी और मनीष सर कॉमर्स पढ़ाते थे। मंजू से और भी शिक्षक जो कुँवारे थे निकटता बढ़ाना चाहते थे। मगर मंजू किसी को भाव नहीं देती थी। वो मनीष जी को मन ही मन बहुत चाहती थी पर जाहिर नहीं करती थी। उसकी शादी के लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते आ रहे थे मगर वह सबको नापसंद कर देती थी। एक द...

कहानी: एक शरीफ एक बदमाश

राजेन्द्र और विजेन्द्र दोनों सगे भाई थी। जिनमें बड़ा भाई राजेन्द्र निहायत ही शरीफ इंसान थे। जबकि विजेन्द्र छँटा हुआ बदमाश था। विजेन्द्र ने दस पूर्व राजेन्द्र की बेरहमी से पिटाई कर घर से निकाल दिया था। तथा पिता की सारी संपत्ति हड़प ली थी। उस समय राजेन्द्र अपने दोनों बच्चों के तथा पत्नी रजनी के साथ घर से निकाला गया था। तब उसके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। आज वही राजेन्द्र गाँव का सबसे धनाढ्य व्यक्ति था जबकि विजेन्द्र अपनी सारी संपत्ति गँवाकर जेल की हवा खा रहा था। राजेन्द्र बचपन से ही सीधे और सरल थे दयालू के साथ-साथ सबकी मदद के लिए हरदम तेयार रहते थे। विजेन्द्र उनसे दो वर्ष छोटा था। वो शुरू से ही अपराधी प्रवृत्ति का था। फिर भी अपने पिता किशनलाल का लाड़ला था। वे विजेन्द्र की बड़ी से बड़ी गलती माफ कर देते थे और राजेन्द्र की एक छोटी सी गलती पर भी कड़ी फटकार लगाते थे। विजेन्द्र घर से पैसे चुराता था और पिटाई राजेन्द्र की होती थी। विजेन्द्र कक्षा पाँच में तीन साल से लगातार फेल हो रहा था। अंततः उसे स्कूल से निकाल दिया गया था। इसके बाद विजेन्द्र पूरी तरह आवारा हो गया था। राजेन्द्र की पढ़ाई हायर ...

कहानी: पैंशन प्रकरण

राजेन्द्र वर्मा जी को रिटायर हुए पूरे पाँच महीने हो गए थे उनकी पेंशन प्रकरण का अभी तक निपटारा नहीं हुआ था अभी न उन्हें ग्रेच्युटी मिली थी न जी पी एफ की राशि ही मिली थी वे पिछले पाँच माह से ऑफिसों के चक्कर लगा लगा कर परेशान हो गए थे उनकी आर्थिक स्थिति बुरी तरह डगमगा गई थी मगर उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था उन्होंने सिर्फ रिश्वत देने से इंकार,किया था जिसका नतीजा उन्हें ये मिला था। बात छः महीने पुरानी है। तब राजेन्द्र वर्मा जी के रिटायरमेन्ट में एक माह का समय बाकी था तब उन्हें संकुल केन्द्र के बाबू दिनेश ने घर बुलाया था वे उसके घर पहुँचे तो बाबू ने कहा देखिए वर्मा जी आपके प्रकरण में यह पेंच आ रहा है कि अगर आपकी परिविक्षा अवधि जोड़कर पेंशन निर्धारित करें तो आपकी छः लाख की रिकवरी निकल रही है और अगर दो साल बाद से आपकी गणना करें तो कोई रिकवरी नहीं निकलने वाली इसके अलावा आपके और भी बिल हैं जिनका भुगतान होना है इसके लिए आपको एक लाख रुपये देना होंगे अगर आप पैसे देने को तैयार हैं तो आपके सारे काम हो जाएँगे तथा दस दिन में आपके पूरे भुगतान हो जाएँगे अगले महीने से पेंशन भी जमा होने ल...

कहानी: मार्केटिंग

वनाँचल में स्थित वीरपुर ग्राम में राघव ने मार्केटिंग से बहुत रुपया कमाया था। फार्मेसी में डिग्री हासिल करने के बाद उसने वीरपुर गाँव में ही अपना प्लान्ट लगाया था जिसमें वो आयुर्वेदिक दवाएँ बनाकर उनकी पैकिंग कर मार्केटिंग के जरिए खूब पैसा कमा रहा था। वीरपुर गाँव के और भी नवयुवक थे जो उच्च योग्यताधारी थे। अनेक एम बी ए, एम सी ए भी थे पर उनमें से अधिकाँश बेरोजगार। दूसरी ओर राघव खूब रुपया कमा रहा था। अस्सी लोगों को उसने रोजगार भी दे रखा था। उसके पिताजी रामकिशन जलाऊ लकड़ी बेचकर अपना गुजारा करते आज तीस एकड़ जमीन के मालिक थे और उसमें जड़ी बूटी का उत्पादन कर रहे थे। आठ वर्ष पूर्व राघव फार्मेसी में डिग्री लेने के बाद जब वीरपुर आया था तब उसके साथ के युवकों ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि थोड़े दिन बाद इसका भी जोश ठंडा पड़ जाएगा। बेरोजगारी इसे तोड़कर रख देगी। मगर वे जानते नहीं थे कि राघव मार्केटिंग एक्सपर्ट है जो मिट्टी से भी रुपया कमा सकता है। राघव की आते ही गाँव के बेरोजगार युवकों से तीखी बहस हो गई थी। राघव का कहना था आगे बढ़ने के अवसर बहुत हैं और हमारे आसपास ही हैं। इस पर सभी ने राघव जी को च...

कहानी: विश्वासघात

अनाज व्यापारी रामरतन आज भले ही धन संपन्न हों लिकन पाँच वर्ष पूर्व तक वे खेती करत थे। उनके पास चालीस एकड़ जमीन थी। उस जमीन पर रामरतन जी ने पूरे पन्द्रह साल खेती की थी। आखिर हरिचरण जिसे वो अपना पिता समझते थे उनके मरने के बाद पता चला कि वे उनके असल पिता नहीं थे सौतैले थे। उनके छोटे भाई के वे सगे पिता थे। उनकी माँ हीरा देवी ने भी उनसे ये बात छिपाई थी। कानूनन पूरी जमीन का मालिक उनका छोटा भाई अमित था। सारी जमीन अमित के नाम हो गई थी। और रामरतन जी को उस जमीन से बेदखल होना पड़ा था। रामरतन जी की उम्र पैंतीस साल की हो गई थी। उनके दो बच्चे सोहन और सोनम को साथ लेकर वे वीरगंज में किराये का मकान लेकर रहने लगे थे। उन्हें दुख इस बात का था कि उनकी सगी माँ ने भी उनसे इतनी बड़ी बात छिपाई थी। सौतैले पिता हरिचरण ने भी यह जाहिर नहीं होने दिया था कि वो सौतेले हैं। वे उस जमीन को अपनी समझकर मेहनत करते रहे थे। रामरतन जी ने पूरे पन्द्रह साल उस जमीन पर इतनी मेहनत की थी कि कभी बंजर माने जाने वाली वो जमीन अब सबसे उपजाऊ बन गई थी। खेत पर चालीस लाख का मकान उन्होंने ही बनवाया था। पन्द्रह लाख रुपये के कृषियंत्र थे, ट्रेक...

कहानी: कड़वा अतीत

निराश्रित महिला आश्रम की संचालिका साध्वी जितनी सरल मधुर और शाँत दिखाई देतीं थी उनका उतना ही कड़वा अतीत था जिसे वे भूल चुकी थीं। इसके जिम्मेदार सभी लोगों को उन्होंने दिल से माफ कर दिया था अब उनके मन में किसी के प्रति कोई मलाल नहीं था। उनके साथ रह कर पिछले पन्द्रह वर्ष से काम कर रही सरोज उनके विषय में बहुत कुछ जानती थी। वो पूछने पर उनके अतीत के विषय में सहजता से सब कुछ बता देती थी जिसे सुनकर लोगों की मिली जुली प्रतिक्रिया होती थी। शाँति देवी की उम्र इस समय पचास वर्ष की थी। इस आश्रम की स्थापना उन्होंने पन्द्रह वर्ष पूर्व की थी। उनके आश्रम में चार सौ निराश्रित महिलाएँ थीं उनमें से अधिकाँश आत्म निर्भर थीं। जो कई प्रकार के काम कर धन कमाती थीं। आश्रम का अपना बिक्री केन्द्र भी था जहाँ दिनभर खरीददारों की भीड़ लगी होती थी। सरोज ने एक दिन बताया था कि शाँति जी की शादी अठारह वर्ष की आयु में शंकरलाल के साथ हुई थी। शंकरलाल जी के पिता उमाकाँत का निधन हो गया था। शंकरलाल के ऊपर माँ तथा अपनी छोटी बहन और भाई की जिम्मेदारी थी। जिसका निर्वहन वो भली प्रकार से कर रहे थे। उस समय शाँति देवी आज की तरह नर्मदिल की...