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दिसंबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: बड़े भैया

बड़े भैया गिरीश जी आज पूरे चवालीस साल की सरकारी नौकरी के बाद रिटायर हो गए थे वे राम गंज तहसील के कार्यालय के सबसे पुराने कर्मचारी थे जहाँ से नौकरी की उन्होंने शुरूआत की थी वहीं से बेदाग रहते हुए रिटायर होना बड़ी बात थी वे तहसील में पेशकार के पद पर कार्यरत थे । तीन बार उनका प्रमोशन हुआ लेकिन वे कहीं पर नहीं गए यहीं के रहे पूरी तहसील में उनकी सब से पहचान थी अंचल के गाँवों में उन्हें जानने वालों की अच्छी संख्या थी।आज जब वे रिटायर होकर घर आए तो सभी ने उनका स्वागत किया। उन्हें अपने सभी पुराने दिन याद आ रहे थे। बचपन के वे दिन भी जो उन्होंने बड़े कष्ट में गुजारे थे। गिरीश जी जब दस साल की उम्र में कक्षा चौथी में पढ़ते थे तभी से घर की जिम्मेदारियों को निभाने लगे थे उनके दो भाई तथा दो बहने थीं दोनों बहने, रोशनी और,चाँदनी सबसे छोटी थीं उनसे छोटे भाई का नाम अमित तथा उससे छोटे भाई का नाम सुमित था। उनके पिताजी हरिप्रसाद की तहसीय परिसर में छोटी सी चाय की दुकान थी। स्कूल के बाद गिरीश को चाय की दुकान पर पिताजी के काम में मदद करना पड़ती थी छोटे भाई बहनों की देखरेख भी उन्हें ही करना पड़ती थी ...

कहानी: कलाकार

बलराम पुर कस्बे आज फिल्म जगत के मशहूर कलाकार रूपेश कुमार का चैरिटी शो था। वे इतने व्यस्त थे कि अपने बचपन के मित्रों परिजनों से भी ज्यादा देर तक नहीं मिल सके जिनके साथ बैठकर वे घंटों बात करना चाहते थे। उनसे बात करने के लिए उनके चंद मिनट ही मिल सके थे। उनका सगा भाई रमेश भी उनसे सिर्फ पाँच मिनट के लिए मिले थे। कार्यक्रम खत्म होते ही वे तुरंत मुंबई रवाना हो गए थे वहाँ उनकी शूटिंग थी। दस वर्ष पहले रूपेश कुमार बलरामपुर में ही रहते थे। उनके पिता किशनलाल किसान थे उनका बड़ा भाई पटवारी था तथा छोटा भाई खेती कर रहा था। जब रूपेश बलरामपुर में रहते थे तब वे अपने पिता की नजर में नकारा निकम्मे इंसान थे। उनकी अपने पिता से बिल्कुल भी नहीं बनती थी। उनका कई कई दिनों तक आमना सामना भी नहीं होता था। कभी हो भी जाता था तो उनके बीच खूब तीखी बहस होती थी। रूपेश को तुरंत हटना पड़ता था। उन्हें लगता था कि यदि ज्यादा देर रुके तो पिता के हाथों मार खाने की नौबत भी आ सकती है। उसका कारण यह था कि रूपेश कुमार घर का कोई काम नहीं करते। कक्षा नौ में लगातार तीन साल फेल होने के कारण उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। जबकि उनका ब...

कहानी: बेवफ़ाई

अपनी पत्नी सुधा को हरिशंकर बहुत चाहता था पर उसने उसके साथ बेवफ़ाई करते हुए तलाक ले लिया था। इस तलाक ने उसे तोड़कर रख दिया था लेकिन प्रमिला ने उसे संबल प्रदान किया। वो एक सफल व्यवसायी के साथ मार्केंपिंग एक्सपर्ट भी था। उसके हरि नमकीन ने सारे लोकल ब्राण्ड के नमकीन वालों का कारोबार ठप्प कर दिया था। हरिशंकर ने सुधा से लव मैरिज की थी। उनकी पहचान तब हुई थी जब दोनों ही एम बी ए कर रहे थे। यह पहचान प्रेम में बदल गई दोनों ने मरते दम तक साथ में रहने की कसमें खाईं थी। एम बी ए करने के बाद सुधा और हरिशंकर ने लव मैरिज कर ली थी। दोनों की नौकरी शिवरतन मार्केटिंग कंपनी में लगी। हरिशंकर को मार्केटिंग मैनेजर बनाया गया था। उसको अपने काम के सिलसिले से टूर पर जाना पड़ता था जबकि सुधा को ऑफिस में ही रखा गया था। हरिशंकर की तनख्वाह सुधा से ज्यादा थी। शादी के साल भर तक तो वे बहुत अच्छे से रहे दोनों एक दूसरे के प्रेम में खोये रहते थे लेकिन दूसरा वर्ष लगते ही सुधा के व्यवहार में फर्क नजर आने लगा। अब वो हरिशंकर की उपेक्षा करने लगी थी कभी कभी उसका सबके सामने अपमान भी कर देती थी। हरिशंकर स...

कहानी: डेढ़ एकड़ जमीन

राम किशोर के दादाजी शिवस्वरूप जी ने सौ वर्ष पूर्व डेढ़ सौ रूपये मे जो डेढ़ एकड़ जमीन खरीदी थी। आज वो पूरे परिवार की आय का मुख्य जरिया थी। बारह लोगों के परिवार के लिए सालभर का गेहूँ उस जमीन से मिलता था। तथा उसकी उपज बेचकर उनके अन्य खर्च चलते थे। आज उस जमीन की कीमत इक्कीस करोड़ रुपये थी। मगर वे उसे किसी भी हाल में बेचना नहीं चाहते थे। संग्रामपुर गाँव की यह जमीन शहर से दो किलोमीटर दूर थी। उसके आस पास कई आवासीय कॉलोनियाँ बन गई थीं। इस जमीन के ग्राहक भी आने लगे थे लेकिन राम किशोर जी सख्ती से मना कर देते थे। राम किशोर की उम्र ही पिचहत्तर वर्ष की हो चुकी थी। वे बताते हैं कि जब उनका जन्म हुआ तब उनके पिताजी ओम प्रकाश जी पच्चीस वर्ष के थे और दादाजी शिवस्वरूप जी पचास वर्ष के थे। तब जमीन खरीदे हुए उन्हें पच्चीस वर्ष हो गए थे। दादाजी अपनी शादी के एक साल बाद चैनपुरा गाँव से संग्रामपुर आ गए थे। संग्रामपुर गाँव में उस समय कोई बढ़ई नहीं था। तब गाँव के सेठ दीनदयाल पालीवाल ने शिवस्वरूप जी को अपने गाँव संग्रामपुर में रहने की जगह दी थी तथा मकान बनवाने क...

कहानी: फिर अपने गाँव में

रत्नाखेड़ी गाँव के स्वरूप सिंह पिछले पैंतीस सालों से गाँव से बाहर रहे थे। पाँच वर्ष पहले वे गाँव वापस आ गए थे। इन पाँच वर्षों में उन्होंने गाँव वालों का दिल जीत लिया था। इसके कारण वे हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनाव में गाँव के सरपंच चुने गए थे। चालीस साल पहले की बात है जब स्वरूप सिंह की उम्र सिर्फ बीस वर्ष की थी तब उनके पिताजी राम भरोसे का लंबी बीमारी से निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन सुनीता की शादी उन्होंने मरने के पहले ही कर दी थी। रामभरोसे जी के पास गाँव से लगी आठ एकड़ जमीन थी। पिताजी की उत्तक्रिया करने के बाद जब स्वरूप सिंह अपने खेत पर पहुँचे तो वहाँ गाँव के साहूकार लाला राजमल के नौकर हेमराज ने आकर उससे कहा कि सेठजी तुम्हें बुला रहे हैं। स्वरूप सिंह जब लाला के घर पहुँचे तो लाला राजमल ने स्वरूप सिंह से कहा खेत पर जाने के पहले मालूम तो कर लेना चाहिए कि वो जमीन तुम्हारी है भी की नहीं। स्वरूप बोले मेरी क्यों नहीं है यह मेरे बाप दादों की जमीन है पिताजी के निधन के बाद अब यह जमीन मेरी है। इस पर लाला ने कहा ये जमीन तुम्हारी नहीं है यह जमीन मेरी है तुम्हारे पिताजी ने ये जमीन मुझे बेच दी थ...

कहानी: गढ़े धन के फेर में

कंचन लाल अपने पिता हरलाल के स्वभाव से एकदम विपरीत था। हरलाल जहाँ जीवन भर गढ़े धन के फेर में रहे और उनकी मृत्यु भी ऐसी कारण हुई वहीं कंचनलाल एक कर्मठ इंसान कड़ी मेहनत पर विश्वास करते थे। उनके पिता का स्वर्गवास हुए आठ वर्ष हो गए थे। इन आठ वर्षों में कंचन ने अपनी मेहनत से खुद को गरीबी के स्तर से उठाकर धनवान बना लिया था। आज उनका कंचन नमकीन सबसे अधिक बिकने वाला नमकीन था। जिससे उन्हें हर महीने बीस लाख रुपये की आय होती थी। आज कंचन के पिताजी की आठवीं पुण्यतिथि थी। उसकी माँ सरोज कह रही थीं अगर वे गढ़ेधन के फेर में न पड़े होते तो अभी भी जीवित होते। पिताजी हरलाल जब तांत्रिकों के साथ घर में बैठकर गढ़े धन की चर्चा करते थे तब कंचन भी सुनता था और कहता पिताजी इस फेर में मत पड़ो अपने काम धंधे पर ध्यान दो पर इस बात का उन पर कोई असर नहीं होता था। हरलाल की मेन रोड पर सेव नमकीन की दुकान थी।उनके हाथ के बनाए सेव का स्वाद अनूठा था। वो रोज पचास किलो सेव तैयार करते थे जो उनकी दुकान से तीन घंटे में बिक जाते थे और वे अपनी दुकान बंद कर के ग्यारह बजे रात को घर आ जाते थे। इससे उनके परिवार की गुजर बसर ठीक हो रही थी। ...

कहानी: अहंकार

शहर के लखन पब्लिक स्कूल के प्राचार्य नवनीत शर्मा पाँच वर्ष पहले तक अहंकार से भरे रहते थे। उन्हें अपने उच्चशिक्षित होने का बहुत घमंड था। छोटे मोटे काम को वे अपने स्तर के अनुरूप नहीं मानते थे ना ही छोटे काम करने वालों को बराबरी का दर्जा देते थे। इसी कारण से उन्होंने छोटी नौकरी पाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया था और बड़ी नौकरी उन्हें मिल न सकी थी। नवनीत के पिता हरिवंशलाल जिला पंजीयक थे। नवनीत चाहते थे कि वे आइ ए एस अधिकारी बनें बी ए पास करने के बाद उन्होंने दो साल लगातार कोचिंग की, परीक्षा दी मगर असफलता ही हाथ लगी। फिर नवनीत ने अंग्रेजी में एम ए किया और प्रोफेसर बनने के लिए यू जी सी की परीक्षा दी। उसमें भी वे सफल नहीं हुए, हारकर उन्होंने बी एड किया। और सरकारी हायर सेकेण्डरी स्कूल में व्याख्याता बनने के प्रयास भी किए पर उसमें भी असफल रहे। पोस्ट ऑफिस में उन्हें सहायक की नौकरी मिल गई थी। तब उनके पिताजी ने उन्हें बहुत समझाया पर उन्होंने वो नौकरी इसलिए नहीं की क्योंकि वो उनकी गरिमा के अनुरूप नहीं थी। नवनीत जी की उम्र तीस वर्ष हो चुकी थी। पिताजी भी रिटायर हो गए थे। नौकरी, काम धंधा न होने के कार...

कहानी: अतिक्रमण

मदनपुर ग्राम का शासकीय माध्यमिक स्कूल जो कभी गाँव की सबसे अच्छी लोकेशन में स्थित था आज चारों तरफ से अतिक्रमण से घिरा हुआ था। जब यह स्कूल बना था तब यह दो एकड़ जमीन पर था। और अब इस स्कूल के पास मात्र दो हज़ार वर्ग फुट जमीन बची थी जिसमें शाला भवन भी था और छः सौ फीट का मैदान था जहाँ  रोज प्रार्थना होती थी। स्कूल के फ्रंट पर सिर्फ गेट बचा था जिससे स्कूल में प्रवेश किया जा सकता था। आसपास दुकानें बनी हुई थीं जो अतिक्रमण कर बनाई हुई थीं। अतिक्रमण की शुरूआत बीस साल पहले हुई थी इसके पहले शाला प्रभारी मोहन लाल थे। उन्होंने स्कूल परिसर को बहुत अच्छा बना दिया था। जब तक वो शाला प्रभारी रहे तब तक कोई भी स्कूल की एक इंच जमीन पर भी कब्जा नहीं कर सका था। मोहनलाल जी का तबादला तत्कालीन सरपंच रामसिंह ने करा दिया था तथा उनके स्थान पर अपने भतीजे घनश्याम की पदस्थापना करा दी थी। घनश्याम सिंह जब शाला प्रभारी बने तभी स्कूल के सामने से पक्की सड़क बनाई गई जो भोपाल रोड को जोड़ रही थी। घनश्याम की नजर स्कूल की जमीन पर थी उन्होंने अपने भाई बंधुँओं से मिलकर सारी जमीन पर कब्जा कर लिया ज...

कहानी: आम का पेड़

अस्सी वर्ष के किशनलाल जी अपने पिता के निधन पर इतना नहीं रोये थे जितना अपने दादाजी द्वारा डेढ़ सौ साल पहले लगाए गए आम के पेड़ के काट दिए जाने पर रोए थे। उनके आँसू नहीं थम रहे थे हसनपुर गाँव के उनके हमउम्र उन्हें खूब समझा रहे थे पर उनका दुख कम नहीं हो रहा था। आम का वो पेड़ ऐसा था जिसके आम सबसे मीठे होते थे उसकी केरी की चटनी बहुत अच्छी बनती थी। उस आम की घनी छाया में उनका बचपन जवानी और बुढ़ापे का बहुत सारा समय बीता था। बुढ़ापे में सब उनका साथ छोड़कर चले गए थे मगर ये पेड़ हमेशा उनके साथ रहा था। वे सोचते थे एक दिन वे तो मर जाएँगे मगर ये पेड़ जीवित रहेगा और अपने जीते जी पेड़ की हत्या उनसे सहन नहीं हो रही थी। किशनलाल पाँच वर्ष पहले तक हसनपुर में ही रहते थे। उनका बड़ा मकान था जिसके आँगन में यह आम का पेड़ लगा हुआ था। उनके दो बेटे थे बड़े का नाम उमेश तथा छोटे का सुरेश था। दोनों भाई बैंग्लोर में अपने परिवार के साथ रहते थे। उमेश और सुरेश का बचपन हसनपुर में ही गुजरा था। उन्होंने पास के गाँव पीपलखेड़ा के स्कूल से हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास की थी। दोनों ने बी ई किया था और इंजीनियर बनकर बैंग्लोर में ही...

कहानी: पुश्तैनी ज़मीन

आज ओमप्रकाश बहुत खुश था क्योंकि आज उसने 35 साल की अपने गृहग्राम रामाखेड़ी में उसके पिता दीनदयाल से साहूकार लाला रोशन द्वारा हड़पी अपनी आठ एकड़ पुष्तैनी जमीन रोशन की विधवा पत्नी कमला देवी से खरीद ली थी। आज से पैंतीस साल पहले की बात है तब ओमप्रकाश की उम्र पच्चीस साल की थी। उसकी शादी रामाखेड़ी के ही किसान हरलाल की लड़की ओमवती से हो गई थी। तथा उसके दो लड़के थे। बड़े का नाम धीरज तथा छोटे का नाम नीरज था। ओमप्रकाश चौथी तक पढ़ा था और पिताजी दीनदयाल जी के साथ खेती करता था। वह यह खेती पाँच सालों से कर रहा था। दीनदयाल जी अनपढ़ थे। उनका लेनदेन गाँव के लाला रोशनलाल से चलता था। ओमप्रकाश को इसकी कोई जानकारी नहीं थी वो तो अचानक उसके पिताजी बीमार पड़ गए उन्हें पीलिया हो गया था उसका इलाज न कराते हुए उन्होंने झाड़फूँक पर विश्वास किया। तीन महीने बाद जब हालत बहुत ज्यादा बिगड़ गई तब उन्हें सरकारी अस्पताल ले जाया गया तब पता चला कि उनका पीलिया बिगड़ गया है। लीवर पूरी तरह खराब हो गया था। डॉक्टरों ने कहा इन्हें घर ले जाओ तथा जब तक जिएँ तब तक इनकी सेवा करो वैसे भी ये कुछ दिनों के ही मेहमान है। ओमप्...

कहानी: गेहूँ की फसल

पिछले साल की तरह हरिकिशन ने इस वर्ष भी अपनी साढ़े चार एकड़ जमीन में गेहूँ की फसल बोई थी कड़ाके की ठंड पड़ रही थी ऐसे में  उसे रात भर जहाँ खेत में सिंचाई करना पड़ रही थी वहीं  जंगली जानवरों से अपनी फसल भी बचानी पड़ रही थी  । रात को हरिकिशन खेत पर ही था सुब्ह जब घर आया तो ठंड के मारे बुरी तरह ठिठुर रहा था आधे दिन धूप में बैठने के बाद भी उसकी ठंड दूर नहीं हुई थी आज रात फिर,उसे खेत पर जाना था उसके पास खेती के अलावा और कोई कमाई का जरिया भी नहीं था। आज दिन में जब वो धूप में बैठकर अपनी ठंड भगा रहा था । तब अपनी फसल  को लेकर कई  सुंदर सपने उसकी आँखों में पल,रहे थे । पिछले वर्ष उसके खेत से पैंसठ क्विंवटल गेहूँ का उत्पादन हुआ था जिसमें से उसने पचास क्विंटल गेंहू बेच दिए थे जिसके उसे एक लाख रुपये मिले थे पाँच महीने की लगातार मेहनत का ये नतीजा देछकर वो बहुत दुखी हुआ था उसके सारे सपने चूर चूर ह गए थे गत वर्ष उसकी दस बोरी यूरिया भी चोरी हो गया था जिससे उसे दस हज़ार की चपत लग गई थी उसकी भरपाई करने में उसे कई दिन लग गए थे।  पिछले साल उसने फसल आने पर एन्ड्राइड मोबाइल खरीदने ...

कहानी: जिम्मेदारी

नरेश के पिताजी उमाशंकर के सड़क दुर्घटना में दुखद मृत्यु के बाद नरेश के कंधे पर परिवार की पूरी जिम्मेदारी आ गई थी दो महीने पहले ही उसका ड्राइविंग लायसेन्स बना था । अभी वो लोडिंग ऑटो चलाना सीखा ही था कि पिताजी का अचानक निधन हो गया वे भी लोडिंग ऑटो चलाते थे ऑटो उनका ही था जो कुछ दिन पहले उन्होंने शोरूम से नया खरीदा था पुराना लोडिंग ऑटो चार साल पुराना जिससे नरेश ने ऑटो चलाना सीखा था। दुर्घटना में नया ऑटो चकनाचंर हो गया था और उमाशंकर जी की दर्दनाक मौत हो गई थी। इसका सदमा पूरे परिवार को था। सबसे बुरी हालत उनकी पत्नी दीपिका की थी । पति के निधन के बाद नरेश लोडिंग ऑटो चलाकर परिवार के भरण पोषण कर रहा था। आज जब रात के बारह बजे वो ऑटो लेकर आया तब तक उसकी माँ दीपिका का घबराहट के मारे बुरा हाल हो गया था। उमाशंकर की शादी जब वे इक्कीस वर्ष के थे तभी दीपिका से हो गई थी दीपिका की उम्र शादी के समय अठारह वर्ष थी। दोनों का वैवाहिक जीवन बीस वर्ष रहा था निधन के समय, वो अड़तीस वर्ष की ही थी शादी के छः महीने तक वे संयुक्त परिवार में ही रहे थे । उमाशंकर सातवीं तक पढ़े हुए थे और मजदूरी कर गुजर कर रहे थे ...

कहानी: बेबस शाला प्रभारी को सहारा

बिसनपुर माध्यमिक शाला के प्रभारी हेमराज जी पिछले छः माह से काफी खुश और संतुष्ट नज़र आ रहे थे। उसका कारण पंचायत की नवनिर्वाचित सरपंच गीता थीं। वे पढ़ी लिखी दलित महिला थीं और दबंग भी। उनके सरपंच चुने जाने के पहले छः शिक्षक के सटॉफ वाले विद्यालय में मात्र दो शिक्षक ही नियमित रूप से स्कूल आते थे। बाकी चार मुफ्त की तनख्वाह ले रहे थे। लेकिन सरपंच गीता जाँगड़े जी ने विशेष रुचि लेकर विद्यालय की व्यवस्था सुधार दी थी। जो चार शिक्षक स्कूल से नदारद थे उन्होंने सख्ती के बाद खुद ही स्वेच्छा से अपना तबादला करा लिया था। उनके स्थान पर जो नए शिक्षक आए थे वे कर्मठ और ईमानदार थे। जिसके कारण छात्रों के स्तर में काफी सुधार आया था। यही हेमराज की खुशी का अहम कारण था। छः महीने पहले तक एक मेडम सुमन तो कभी स्कूल आती हीं नहीं थीं। वे पहले के सरपंच की रिश्ते में भाभी लगती थीं। दूसरे सर अनिल ने अपना अटेचमेंट डी पी सी कार्यालय में करा रखा था वे भी स्कूल नहीं आते थे। दो मेडम रीना तथा रूचि भी स्कूल बहुत कम आती थीं इससे शाला प्रभारी हेमराज जी काफी परेशान रहते थे। स्कूल उनके तथा उनके जैसे शिक्षक ओमवीर के कारण ही चल रहा ...

कहानी: बगीचा

सोनपुर के छोटे से कस्बे में रह रही काशीबाई के घर से लगा एक छोटा सा बगीचा था जिसको आय से काशीबाई की गुजर बसर आराभ से चल रही थी। उनके दो बेटे बहू पोते पोती थे पर उनके साथ कोई भी नहीं रहता था बड़ा बेटा रमेश कलकत्ता में रह रहा था एवं छोटा बेटा दिनेश अहमदाबाद में । दोनों बेटे उनकी कभी सुध नहीं लेते थे न उनकी कभी रुपये पैसे से मदद करते थे । आज काशीबाई को बगीचे से छः सौ रुपये की आय,हुई थी जो उनके लिए पर्याप्त थी। काशी देवी के पति देवीप्रसाद जी का निधन हुए दस वर्ष हो गए थे । वे जोड़ पर छोटी सी गुमटी लगाकार सामान बेचते थे। इसके पहले वे मंडी में हम्माली का काम करते थे इसके बाद भी उन्होंने अपने दोनों बेटों को खूब पढ़ाया लिखाया मगर दोनों ही उन्हें छोड़कर चले गए । देवी प्रसाद ने बीस साल पहले चालीस डिस्मिल जगह सोहन साहू से पच्चीस हजार रुपये में खरीदी थी आज उसकी कीमत पूरे डेढ़ करोड़ रुपये हो गई थी। देवी प्रसाद जी को बगीचे लगाने का शौक था उन्होंने पहले तो उस पर मकान बनवाया फिर बाउण्ड्री कराकर उसमें आम जामुन अमरूद नींबू और बेर के पैड़ लगाए थे कुछ केले के पेड भी उसमें लगे थे। एक बेल पत्री...

कहानी: सुखद आश्चर्य

शिक्षक दीनदयाल जी को रिटायर हुए पूरे आठ माह हो गए थे लेकिन उनकी ग्रेच्यूटी, जी पी एफ सहित अन्य कई क्लेम उन्हें नहीं मिले थे। वे परेशान थे कई बार डी ई ओ ऑफिस के चक्कर काटने के बाद भी कुछ लाभ नहीं हुआ था। परेशान होकर आज वे कलेक्टर से मिलने आए थे लेकिन कलेक्टर से मिलते ही वे सुखद आश्चर्य में डूब गए थे। कलेक्टर उनकी स्टूडेन्ट रही सलोनी मीना थीं। उन्होंने अपने सर को बहुत सम्मान दिया, वे दबंग कलेक्टर थीं जब उन्हें दीन दयाल जी ने अपनी समस्या बताई तब उन्होंने तुरंत डी ई ओ और अन्य संबंधित अधिकारियों को बुलवाया तथा एक हफ्ते में सर के पूरे प्रकरणों को निपटाने के सख्त आदेश दिए और कहा कि यदि काम पूरा नहीं हुआ तो उसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना। कलेक्टर सलोनी ने सर को इतना मान दिया था कि उनके सामने वो कलेक्टर की कुर्सी पर भी नहीं बैठी थीं। कांफ्रेन्स हॉल में बैठकर उनसे बात की थी। सलोनी से मिलकर आज वे बहुत खुश थे। दीनदयाल जी घर आने के बाद सलोनी के विषय में ही सोच रहे थे। सलोनी के पिता शिवलाल से उनकी बात पन्द्रह साल पहले हुई थी। शिवलाल जी अपने बेटे नितिन का ...

कहानी: संघर्ष

रोशनी ने अपने जीवन के पूरे पैंतालीस वर्ष संघर्ष करते हुए बिताए थे। उसकी उम्र पचास वर्ष की थी। पाँच वर्ष की उम्र से ही उसका जीवन संघर्ष करते हुए गुजरने लगा था। आज वे सुखी एवं समृद्ध जीवन जी रही थी। उसका बेटा विवेक आइ ए एस अफिसर था तथा दोनों बेटियाँ रीति व नीति डॉक्टर थीं। रोशनी अब काम नहीं करतीं थी। उसके तीनों बच्चे उसका बहुत ख्याल रखते थे। रोशनी जब पाँच वर्ष की थी तब उसके माता पिता दोनों ही बस दुर्घटना में मारे गए थे। रोशनी को कभी नाना के यहाँ तो कभी दादाजी के यहाँ रहकर अपने दिन गुजारने पड़ रहे थे वो पाँचवीं तक पढ़ी थी। इसके बाद उसकी पढ़ाई छुड़ाकर उसे घर के कामों में लगा दिया था। जब वो अठारह साल की हुई तब उसकी शादी स्वरूप सिंह से कर दी गई। स्वरूप सिंह किसान तो था पर खेती ठीक से नहीं करता था। जिससे वो हमेशा कर्ज में डूबा रहता था। रोशनी ने खेती पर ध्यान देना शुरू किया तो स्वरूप सिंह ने खेती का काम पूरी तरह छोड़ दिया। स्वरूप सिंह को शराब पीने की लत लग चुकी थी। कमाता कुछ नहीं था रोशनी से पैसे छीन लेता था। पैसे नहीं देने पर रोशनी की बुरी तरह से पिटाई क...

कहानी: शादी

रघुवीर की उम्र अभी मात्र उन्चालीस साल की थी और वो अपनी बेटी निर्मला की शादी करने जा रसा था । शादी का निमंत्रण देने जब वह अपने बचपन के मित्र उमेश के यहाँ गया था उमेश को यह सुनकर बड़ी हैरानी हुई की रघुवीर,अपनी बेटी का विवाह कर रहा है। वो ससुर बनने वाला है और यह भी हो सकता है कि वो चालीस इकतालीस साल की आयु में नाना बन जाए। उमेश निमंत्रण पत्र लेने के साथ ही अपनी शादी का निमंत्रण देते हुए कहा कि अगले माह उसकी भी शादी है।यह सुनकर रघुवीर बहुत खुश हुआ तथा उसे बधाई दी। रघुवीर की शादी उनके पिताजी ओमवीर ने जब कर दी तब रघुवीर की उम्र मात्र इक्कीस वर्ष की ही थी। उसका कारण यह था कि ओमवीर जी की आयु अस्सी वर्ष हो चुकी थी रघुवीर उनका इकलौता जीवित लड़का था। जब वे साठ वर्ष के थे तब उसका जन्म हुआ था जबकि रघुवीर की मम्मी सिया कुमारी की उम्र पैंतालीस साल थी। सिया रघुवीर जी की दूसरी पत्नी थी पहली पत्नी रमा का निथन हो गया था । उसके पाँच बच्चे हुए थे पर एक भी जीवित नहीं बचा था और छटवें बच्चे का जन्म देते समय रमा का निधन हो गया था । इसके बाद उन्होंने सियाकुमारी से शादी की थी। सिया कुमारी से...

कहानी: एकाकी

श्री राम दादा का आज नब्बे वर्ष की आयु में निधन हो गया था वे पिछले बीस वर्षों से गोविंद नगर में एक छोटे से कमरे में रह रहे थे उन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं थी अच्छे भले चलते फिरते इंसान थे । ज्यादा किसी से घुलते मिलते नहीं थे उनके गिने चुने मित्र थे वे अपने में ही खोए रहते उनकी अंतिम यात्रा में बहुत कम लोग शामिल हुए थे वे कौन थे कहाँ से आए थे उनके घर में कौन कौन है ये किसी को नहीं मालूम था जब उनकी अंतिम यात्रा निकल रही थी तब उनके पड़ोस मे सहारनपुर के एक बुजुर्ग दयाशंकर जी अतिथि बनकर आए थे उन्होंने श्रीराम दादा को पहचान लिया था। तब लोगों को पता चला था कि वे सहारनपुर के रहने वाले हैं। अंतिम संस्कार के बाद लोगों में श्रीराम दादा के विषय में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई तब दयाशंकर जी ने उनके विषय में बताते हुए कहा कि श्रीराम दादा का भरापूरा परिवार था उन्होंने मजदूरी करके पाई पाई जोड़कर कुछ पूँजी इकठ्ठी की थी उससे ठेला खरीदकर उस पर रेहड़ी लगाई थी इसके बाद उन्होंने बाजार में दुकान खोल ली थी। फिर उन्होंने व्यापार में खूब उन्नति की शहर में उनके पाँच मकान थे दस एकड़ जमीन,थी तीन दु...

कहानी: निसंतान

दीनदयाल और करूणा निसंतान दंपति होने के बाद भी भरे पूरे घर में रह रहे थे। दीनदयाल की उम्र बहत्तर वर्ष और करुणा की उम्र सत्तर वर्ष हो गई थी। आज सुबह की सैर के समय उनकी तीन वर्ष पुराने मित्र आलोक और उनकी पत्नी नमिता से भेंट हुई थी। उनसे भेंट के बाद वे बहुत व्यथित थे। आलोक उनकी हम उम्र थे फिर भी उनसे अधिक बूढ़े तथा पस्त दिखाई दे रहे थे। आलोक ने बताया की अपनी दो संतान होने के बाद भी हम दोनों अकेले ही रह रहे हैं। इस शहर में हमारा अपना कोई नहीं है। दीनदयाल आलोक जी की बात सुनकर अत्यंत दुखी हो गए थे। चालीस साल पहले वे कानपुर में उनके पड़ोसी थे। उनके दो बच्चे थे, बेटी का नाम अनीता तथा बेटे का नाम अनिल था। दोनों बच्चे उस समय स्कूल में पढ़ रहे थे। दोनों बच्चे अपनी क्लास के टॉपर स्टूडेन्ट थे। आलोक जी को अपने दोनों बच्चों पर बड़ा नाज था। बच्चे पढ़ लिखकर बड़े हुए थे। आगे पढ़ने के लिए विदेश चले गए थे। पढ़ाई खत्म करने के बाद वे वहीं पर नौकरी भी करने लगे। वहीं उन्होंने अपनी पसंद की शादी भी कर ली तथा वहीं के होकर रह गए। आलोक जी इस बात से बड़े दुखी रहते थे। बेटा-बहू, बेटी-दामाद, नाती-पोते होने के बाद भी व...

कहानी: गृहप्रवेश

आज रवीन्द्र बाबू ने छत्तीस साल सरकारी मकान में बिताने के बाद अपने मकान में गृह प्रवेश किया था इस अवसर पर,दिन में पूजा एवं अनुष्ठान के बाद रात्रि में स्नेह भोज का आयोडन किये गया था अपने मकान में आकर रवीन्द्र बाबू तथा उनका परिवार असीम सुख का अनुभव कर रहे थे। रवीन्द्र बाबू शिक्षा विभाग में एकाउण्टेन्ट के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने छत्तीस साल तक अपनी सेवाएँ दीं थीं ।गत वर्ष वे अपने पद से सेवानिवृत्त हुए थे उनका शहर में कहीं निजी मकान नहीं था । सरकारी मकान में रहकर उन्होंने पूरी नौकरी की थी दस साल पहले उन्होंने बारह सौ वर्गफुट का एक आवासीय,भूखंड साढ़े चार लाख रुपये में खरीदा था जिसकी वर्तमान में कीमत बीस लाख रुपये थी उसमें उन्होंने थोड़ा सा निर्माण कार्य कराया था। उनका बेटा बेटी बहु तथा दामाद दवाब डाल रहे थे कि वे रिटायरमेन्ट के पहले अपना मकान बनवा लें पर उनकी गुंजाइश इतनी कभी नहीं हुई कि वे मकान बनवा पाते एक दिन उनके बेटे अजय ने कहा कि पापा रिटायर मेन्ट के बाद आपको कितने रुपये मिलेंगे रवीन्द्र बाबू बोले ग्रेच्यूटी कम्यूटेशन जीपी एफ जी आई सी अरन लीव का पैसा मिलाकर यहो कोई...

कहानी: आत्मग्लानि

सरला पिछले दस दिनों की आत्मग्लानि से आज उबर पाई थी जब डॉक्टरों ने उसे बताया कि अब उसकी भतीजी रुचि तथा उसका सद्यजात सतमासा बच्चे की हालत खतरे से बाहर है । अभी बच्चे को विशेष देखरेख में रखा छया था। पर सरला को इसी से बहुत संतोष हो रहा था।          आज से छः वर्ष पूर्व सरला की बेटी रूबी तथा उसके भाई की बेटी रूचि की शादी एक ही दिन हुई थी । लेकिन रूबी की शादी सफल नहीं हुई थी रूबी को जो ससुराल मिली थी वो अच्छी नहीं थी उसकी सास ननद खराब थी हीं उसका पति सोमेश भी ठीक नहीं था वे सबके सब लोभी लालची थे रूबी को खूब प्रताड़ित करते थे जरा सो बात पर उसे मानसिक प्रताड़ना दी जाती थी दःख की बात तो यह थी कि रूबी का पति भी उसका साथ नहीं देता था रूबी के मन में आत्महत्या करने का विचार आता था पर फिर वो अपने आपको सम्हाल लेती थी। रूबी का कमरा चौथी मंजिल पर था । एक दिन की बात है रूबी की सास उसके ससुर उसकी ननद और उसके पति ने उसे सारी रात प्रताड़ित किया बाद में सभी ने प्लान बनाया कि रूबी को छत से धक्का दे दिया जाए जिससे इसका काम ही तमाम हो जाए यह बात पड़ोसी प्रकाश जी की पोती सिम...