गजल
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फिर से नए लगने लगे।
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वो बिछड़कर जो मिले फिर से नए लगने लगे।
भाव मन में प्रेम के फिर से वही उठने लगे।
दूर रहके वो कभी सुख चैन से रह पाए ना।
बात दिल की खोलकर हमसे सहज कहने लगे।
साथ हम चलते रहे थे राह जब तक एक थी।
हो गए रस्ते अलग तो दायरे बढ़ने लगे।
जो सितम करते रहे मजबूर लोगों पे बहुत।
बन गए मुंसिफ वही फिर फैसले करने लगे।
हम सभी अपना लुटाकर खूब खुश थे दोस्तों।
वो दुखी तबसे हुए जबसे हमें ठगने लगे।
प्रेम की बातें करेंगे ये किया वादा मगर।
बाद में दुश्मन हमारे बन गए लड़ने लगे।
वे उड़े आकाश में कश्यप भरोसे पंख के।
झड़ गए जब पंख तो फिर छटपटा गिरने लगे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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