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गजल
बुरा बदला निकाला है
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हमारी हर भलाई का बुरा बदला निकाला है।
जहां मलहम लगाना था वहां तेजाब डाला है।

हवा की साजिशें उसने सभी नाकाम कर डालीं।
जला तूफान में दीपक उसी का ये उजाला है।

महज सपने दिखाने से नहीं बदलाव आएगा।
जमा जो खून है उसको किसी ने कब उबाला है।

भरे उम्मीद आंखों में बहुत से लोग आए थे।
उन्हें झूठे दिखा सपने बनाकर बात टाला है।

जहर मुंह में रखे घूमे चले बिन हाथ पैरों के।
समझकर के भला तुमने कुटिल फिर सांप पाला है।

धवल कपड़े पहनकर के अकेले आप आए हैं।
सभी कालिख लपेटे हैं वहां हर हाथ काला है।

उन्हें मजबूरियां कश्यप संभलने ही नहीं देतीं।
तुम्हारे पांव के नीचे दबा जिनका निवाला है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश

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