गजल
मुखौटा वो बदलकर आ गए।
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देखकर मौका मुखौटा वो बदलकर आ गए।
सामने सबके कसम झूठी सरासर खा गए।
देख ली निष्ठा बदलते एक पल में दोस्त की।
रंग बदले देखकर गिरगिट सभी शरमा गए।
थी दिखावे की लड़ाई आपसी में मेल था।
मतलबी ये लोग अपनों को बुरा लड़वा गए।
साफ सुथरे लोग थे उनसे बनाई दूरियां।
छल कपट से जो भरे वो खूब उनको भा गए।
गांठते थे रौब सब पर बोलकर के झूठ वे।
आ गया सच सामने तो देखकर घबरा गए।
बोल थे कड़वे मगर थीं बात सारी काम की।
उलझने सबकी जरा सी देर में सुलझा गए।
हो गई कश्यप अकड़ ढीली चला ना दांव कुछ।
काम जो उल्टे किए उसका नतीजा पा गए।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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