गजल
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सर सब्ज नजारे जन्नत के
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बारिश में सर सब्ज नजारे जन्नत के।
दिन आए हैं यार तुम्हारी उल्फत के।
काश्मीर की अब तस्वीर बदलना है।
खत्म कर दिए मौके सारे दहशत के।
जीवन की इस दौड़धूप में उलझे हम।
मिलते नहीं हैं लम्हे हमको फुरसत के।
हरा भरा खुशियों का मौसम आऐगा।
हम भी कायल होंगे तेरी रहमत के।
अना बेच के अपनी दौलत मंद हुआ।
उखड़ गए हैं परचम सारे इज्जत के।
गद्दारों से उनकी अब है नजदीकी।
दोस्त हमारे जो थे गहरे मुद्दत के।
कश्यप रोज बहाते खून पसीना हम।
फिर भी नहीं बदलते दिन ये गुरबत के।
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प्रदीप कश्यप
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