गजल****सामने सबके भले बनते रहे हैं।पीठ पीछे वो बुरा करते रहे हैं।सामना कैसे करेंगे शेर का वे । गीदड़ों को देख जो डरते रहे हैं।दोस्तों से हार बैठे मानकर जो।दुश्मनों से खूब वो लड़ते रहे हैं।बिल्डिंगे बनने लगी हैं खूब ऊंची।पेड़ कितने ही हरे कटते रहे हैं।खूब था कश्यप हमें जिन पर भरोसा।दोस्त वे ही उम्र भर ठगते रहे हैं।****रचनाकारप्रदीप कश्यप दिसंबर 06, 2020 और पढ़ें