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व्यंग्य : कोई चहेता कोई उपेक्षित

वेसे तो कायदे की बात यह है कि माता पिता को अपनी सभी संतानों से एक सा बर्ताव करना चाहिए उनमें से किसी को कम नहीं समझना चाहिए सबको समान लाड़ प्यार देना चाहिए। परंतु अक्सर ऐसा होता नहीं है कोई संतान तो माता पिता की चहेती होती है और कोई उपेक्षा की शिकार। जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता फिर भी ऐसा होता है और ऐसा कोई सौतेला नहीं करता बल्कि सगे माँ बाप ही ऐसा करते हैं जिसकी किसी से शिकायत भी नहीं की जा सकती । जैसे किसी के तीन बच्चे हैं जिसमें दो बेटे और एक बेटी बेटी तो पिता की लाड़ली है और एक बेटा माँ का लाड़ला और जो सीधा सरल सबसे सज्जन बेटा है वो दोनों की उपेक्षा का शिकार है। जबकि उसका जब जन्म हुआ तब पूरा घर ख़शियों से भर गया था लेकिन दूसरे बेटे के जन्म के बाद उसे पूरी तरह उपैक्षित कर दिया गया उसे प्रताड़ना भी दी जाने लगी और जो चपल चालाक स्वार्थी है वो माँ का लाड़ला बन गया। जो माँ बाप की उपेक्षा के शिकार होते हैं वे बाहर बड़े लोकप्रिय होते हैं । और,अपने जीवन में सफल भी होते हुए देखे गए हैं। कुछ इसी तरह का हाल रवि का भी हुआ उसके अपने ही भाई मोहित ने उसका हक छीन लिया वो माँ बाप का लाड़ला थ...

व्यंग्य : अंत भला सो भला

जो जीवन में कोई कष्ट उठाना नहीं चाहते न ही संघर्ष करना उन्हें अच्छा लगता है वे जैसे तैसे अपनी जिंदगी बसर करते हैं । इसके विपरीत जो साहसी होते हैं जिनकी कुछ बड़ा करने की इच्छा होती है । जो परिश्रम करने से नहीं घबराते वे हर हाल में अपना लक्ष्य हासिल करने में जुटे रहते हैं। और अंत में वे सफल हो ही जाते हैं इसके बाद वे सफल होकर अपना जीवन गुजारते हैं इसिलिए कहा गया है कि अंत भला सो सब भला। संघर्ष हर क्षेत्र में करना जरूरी होता है जो सफलता एक अण में मिल जाती है उसके पीछे कई वर्षों का संघर्ष होता है। बहुत से लोग ऊँचे लक्ष्य को पाना चाहते हैं शुरू में इसको पाने वालों की भीड़ लगी रहती है जो समय बीतने के बाद छँटती चली जाती है । आखिरी में कोई अकेला ही बचता है जो हर,आँधी तूफान का सामना करते हुए अविचला रहता है ।सफलता उसके ही कदम चूमती है। तखत पुर गाँव का नीरज अपने कठोर परिश्रम और लगन के कारण आज एस डी एम के पद पर कार्यरत था। उसके ऑफिस में चपरासी की जगह खाली थी। उसके लिए आवेदन आए थे। आवेदकों में उसे एक चेहरा जाना पहचाना लगा वो उसके गाँव के सबसे संपन्न व्यक्ति का सबसे छोटा लड़का सोम प्रकाश ...

व्यंग्य : अपनों का दंश

अधिकाँश लोगों का यह अनुभव है कि जो जहर अपनों के दिए दंश में होता है उतना हज़ारों बिच्छुओं में भी नहीं होता यह जहर इंसान को मारता नहीं है बल्कि जिंदगी भर तड़फाता है इसकी पीर कभी भी कम नहीं होती है। कुछ, लोग अपनों का शोषण करते हैं उसके हकों को छीन कर खा जाते हैं। उसे कई तरह से परेशान करते हैं उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं और उसे उस वक्त छोड़ देते हैं जिस वक्त उसे इनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। राजेश की उम्र चौदह साल की रही होगी तब उसका भाई रोहित एक व्र्ष का था तब उसके माता पिता की सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मृत्यु हो गई थी उससे छोटी दो बहन और थीं। राजेश ने आठवीं पास की ही थी और वो नौवी में एडमीशन की तैयारी कर रहा था। पर उसके ऊपर,मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। अंत्येष्टि में बहुत लोग शामिल हुए सब उसके सिर पर हाथ फेरकर यह कहकर गए की हम माँ बाप की कमी का अहसास नहीं होने देंगे। लेकिन तेरहवीं के बाद किसी ने मुड़कर भी नहीं देखा राजेश ने पढ़ाई छोड़कर ढाबे पर काम करना शुरू किया और अपने बहन भाईयों की परवरिश करने लगा जब भाई स्कूल जाने लायक हुआ। तब उसको एस डी एम साहब ने कं टजेन्सी ...

व्यंग्य : गढ़ा धन

धन कमाने की अंधी दौड़ ने इंसान का पूरी तरह से नैतिक पतन कर दिया है। धन और पद को पाने के लिए लोग किसी भी हद से गुजरने में जरा भी संकोच नहीं करते इसका फायदा वे लोग उठाते हैं जो खुद को बड़ा तांत्रिक होने का दावा करते हैं ये ऐसे धन लोलुप व्यक्ति से संपर्क करते हैं। फिर उस पर अपना प्रभाव जमाते हैं इसके बाद कहते हैं कि मैं रातों रात तुम्हें संसार का सबसे अधिक धनवान व्यक्ति बना सकता हूँ । और फिर किसी खंडहर के पास ले जाकर कहेंगे कि यहाँ इतना खजाना दबा है कि सोने चाँदी हीरे जवाहरत से कई ट्रक भर जाएँ । और फिर पूजा अनुष्ठान के नाम पर वो कथित तात्रिक धन हडपना शुरू कर देता है। जब तक उसे होश आता है तब तक वो बर्बाद हो चुका होता है और यह फिर किसी दूसरे शिकार को पकड़ लेते हैं इस तरह उनकी दुकानदारी चलती रहती है। और लुटा पिटा व्यक्ति कई वर्षों तक सम्हल नहीं पाता।   अनिल और सुनील दोनों बचपन के दोस्त थे अनिल कर्मठ था और सुनील भाग्यवादी अनिल अपनी कर्मठता और जुझारूपन तथा कठोर,परिश्रम से धनवान हो गया और सुनील गढ़े धन को पाने के फेर में कथित तांत्रिकों के फेर,में पड़ गया जिसमें उसकी जमा पूँजी स...

व्यंग्य : भूलने की कला

कुछ समय पहले तक भूलने को बीमारी माना जाता था बीमारी तो यह आज भी है मगर अब भूलना एक कला भी हो गई है। जिसके काम नहीं करना हो या टालना हो तब इस कला का उपयोग किया जाता है । और तब तक इसका उपयोग करना होता है जब तक कुछ भेंट पूजा नहीं हो जाए। शिक्षक रामदास जी की बेटी की शादी थी उन्हें दस लाख रुपये जीपी एफ से निकालने थे। उन्होंने संबंधित बाबू से संपर्क किया तो वे बोले आप प्रकरण प्रस्तुत करें तीन दिन में आपका पैसा निकलवा दूँगा। रामदास जी ने तुरंत, प्रकरण प्रस्तुत कर दिया लेन देन की भी बात हो गई । रामदास जी ने विचार किया कि जब पैसे निकल जाएँगे तब इनको भी कुछ भेंट कर देंगे। यही सोच उनकी गलत थी जिसके कारण पूरे एक महीने तक उन्हे पैसा नहीं मिला बेटी की शादी सिर पर आ गई थी और बाबूजी उनकी फाइल रखकर भूल गए थे। रामदास जी ने कहा दुबारा प्रकरण प्रस्तुत कर दूँ तब बाबूजी ने कहा नहीं उस पर साहब की टीप लगी है। साहब ने बिल पास कर दिया उसकी नोटशीट भी लगी है। तब उनके साथी गौतम सर ने कहा आपने इनकी भेंट पूजा की क्या वे बोले नहीं तो फाइल कैसे मिलीगो। तब रामदास जी ने दस हजार रुपये बाबूजी को अर्पण किए तभी च...

व्यंग्य : मन के गुलाम

वैसे तो सबके लिए अवसरों की समानता है। फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो उपलब्ध अवसरों का लाभ उठा लेते हैं। जिसका लाभ उन्हें जीवन भर मिलता रहता है। और कुछ लोग अवसरों को गँवा देते हैं जिसका पछतावा उन्हैं जिंदगी भर रहता है।अवसर का लाभ वे इसलिए भी नहीं उठा पाते क्योंकि वे मन के गुलाम होते हैं। व्यक्ति जब किसी कार्य की शुरूआत करता है तो इसके पहले उसके मन में विचार उठते हैं । कुछ विचार ऐसे हैं जो आते हैं और बिना कुछ प्रभाव जोड़े चले भी जाते हैं इनकी संख्या सैंकड़ों में हो सकती है। लेकिन कुछ विचार बार बार आते हैं जिनमें तीव्रता होती है। जिनसे विवश होकर व्यक्ति विचार के अनुरूप काम करना शुरू करता है योजना बनाता है लोगों से मिलता है। साधन सुविधा जुटाता है। और कार्य प्रारम्भ करता है तथा सफलता प्राप्त कर जीवन भर इसका लाभ उठाता है।  दिनेश और,राकेश ने एक साथ बी कॉम किया था तब वे बिजनेसमेन बनने के सपने देखा करते थे। दोनों के पिता नौकरी करते थे। पास होने के बाद उनके सामने बेरोजगारी की समस्या थी। दिनेश ने पिता के कहने पर एक प्राइवेट सकूल में नौकरी कर ली थी।मगर राकेश व्यापार करना चाहता था उसके पिताजी...

व्यंग्य: आम आदमी का गणतंत्र दिवस

आम आदमी का देश भक्ति का जज्बा हमारे देश के गणतंत्र के सशक्त होने का परिचायक है । आम आदमी जब गणतंत्र,दिवस समारोह मनाता है तो इसकी उसे कोई छुट्टी नहीं मिलती इसके लिए उसकी एक दिन की दिहाड़ी का नुक्सान होता है। इसके बाद भी अगर वो समारोह मनाता है तो उसके इस जज्बे को सलाम । । गणतंत्र दिवस समारोह में,आम आदममी की भागीदारी बढ़ती जा रही है । इसे देखकर हर देश भक्त खुशी से भर जाता है। गणतंत्र दिवस पर नगर की पिछड़ी बस्ती विकास नगर के लोगों ने आपस में तय कर लिया था कि इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह उत्साह से मनाएँगे। वहाँ के रहवासी ठेकेदार के यहाँ मजदूरी करते थे सबने उस दिन दिहाढ़ी पर जाने से इंकार कर दिया था यह जानकर ठेकेदार गुस्से से लाल पीला हो रहा था। उसका कहना था कि समारोह तो सुब्ह होना है। उसके लिए दिहाड़ी पर नहीं आना ठीक नहीं है। उसके सारे प्रयास विफल हो गए थे सभी ने एक दिन की दिहाड़ी छोड़कर गणतंत्र दिवस हर्ष उल्लास के साथ मनाया था। उनके कार्यक्रम में अचानक विधायक जी भी शामिल हो गए थे। जब उन्हें यह बात मालूम हुई तो उन्होंने बिल्डर को फोन लगाकर छुट्टी की दिहाड़ी देने पर जोर दिया जिस...