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व्यंग्य: समस्या निवारक

हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएँ आती हैं जिनका सामना उसे करना ही पड़ता है । लेकिन कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जो उसे विचलित कर देती हैं जिसका समाधान उसे सूझता नहीं है। वह बार बार कोशिश करता है फिर भी उसे हल नहीं सूझता। और वो परेशान हो जाता है। ऐसी स्थिति में कुछ इतने सूझबूझवाले और समझदार लोग होते हैं जिनके पास हर समस्या का समाधान होता है । वे भी हमारे आस पास ही होते हैं जब उनके पास समाधान के लिए जाते हैं तो वे हमें ऐसे हल सुझाते हैं कि हम भी चकित रह जाते हैं। वे हमारी समस्या का समाधान कर के हमें चिंतामुक्त कर देते हैं। जबकि उनका तो यह स्वभाव ही होता है कोई भी उनके पास समस्या लेकर आता है तो वे बिना किसी भेदभाव के सच्चे मन से उसकी समस्या का समाधान बताते हैं। और इसी में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। रमेश जी ने पहली बार सरपंच का चुनेव लड़ा था और वे चुनाव जीत गए थे । सरपंच का पदभार भी उन्होंने ग्रहण कर लिया था। इसके बाद उनके ग्राम के स्कूल में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन होना था। उसमें उन्हें ध्वजारोहण करना था तथा भाषण भी देना था भाषण उन्होंने अपने जीवन में कभी दिया नहीं था भाषण कैसे दें यह...

व्यंग्य: हारने वाले की पीड़ा

चुनाव में जिनकी जीत होती है उनके तो जलवे ही निराले होते हैं पर जो चुनाव हार जाते हैं उनकी पीडा का बखान नहीं किया जा सकता है हारने वाला जिस दौर से गुजर रहा होता है इस विषय में सोचते ही दिल?काँप जाता है ।हार का अंतर अगर बहुत कम रहा हो तो हारने वाले की पीड़ा और अधिक बढ़ जाती है । हारने वाला भी चुनाव में खूब खर्च करता है लगभग दीवालिया हो जाता है। जीतने वाला तो अपना खर्च वसूल कर ही लेता है। लेकिन हारने वाले के माथे पर तो सारा खर्च ही मढ़ जाता है। रतन सिंह ने विधायक का चुनाव लड़ा था सुनते हैं कि टिकट के लिए उन्होंने पूरे पाँच करोड़ रुपये खर्च किए थे। इसके बाद पंरे दो महीने उन्होंने अथक परिश्रम किया पानी की तरह पैसा बहाया उनका हाईवे वाला ढाबा बिक गया दो बसें बिक गईं पूरी जमा पूँजी खर्च हो गई । उन्हें अपनी जीत का पूरा भरोसा था ढोल ढमाके मिठाई सबकी व्यवस्था उन्होंने कर ली थी। मतगणना शुरू हुई वे दोपहर तक लीड बनाए हुए थे दोपहर बाद बराबरी पर आ गए आखिरी राउंड में आठ सौ मतों से पीछे रह गए। सारे सपने चकनाचूर हो गए कोई उनके पास नहीं रहा अकेले घर आए । दुख के साथ इस बात की उन्हें कसक थी कि उनका भरो...

व्यंग्य: मोह का टूटना

हर घटना का वक्त निर्धारित होता है। उसी तरह हम भी लंबे समय तक एक ही स्थान पर नहीं रह पाते। अक्सर हम जिस शहर में रहते हैं जिस मोहल्ले में रहते हैं जिस घर में रहते हैं उससे हमें मोह हो जाता है वहाँ रहने वालों से भी हमारा मोह होता है। उनमें से कुछ हमारे बचपन के साथी होते हैं। कुछ दोस्त होते हैं । कुछ रिश्तेदार जिनके बीच हम रहते हैं उनमें जो बिछड़ जाते हैं उनके बिछड़ने का हमें दुख होता है। सबसे ज्यादा पीड़ा हमें तब होती है जब हमारा प्रिय जन इस दुनिया को छोड़कर ही चला जाता है। बेबालाल जी सेवानिवृत्त पोस्टमेन थे वे जिस शहर के रहने वाले थे वहीं उनकी नौकरी लग गई थी वे जिस मोहल्ले में रहते थे वहाँ आपस मे बहुत भाई चारा था वहाँ उनका पैतृक मकान था पूरा परिवार उसमें सुखपूर्वक रहता था बाबूलाल जी भी रिटायर होने के बाद वहाँ खुश रहते थे क्योंकि वहाँ उनके हम उम्र बहुत थे जिनसे उनकी मेल मुलाकात होती रहती थी उनके बच्चे आधुनिच सोच के थे उन्हें वो घर असुविधाजनक लगता था वे शहर की पॉश कॅलोनी में घर लेना चाहते थे पर इतने पैसे उनके पास नहीं थे उन्होंने पिताजी पर दवाब डाल कर वो पुशूतैनी घर बिकवा दिया जिस दिन उन...

व्यंग्य: ख़ुशी और ग़म के अलग अलग हिसाब किताब

दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसके पास ख़ुशी ही ख़ुशी हों ग़म बिल्कुल हों हीं नही। या किसी के पास गम ही गम हो खुशी बिल्कुल हो नही हो । खुशी और गम साथ साथ चला करते हैं पर इनके हिसब किताब अलग अलग होते हैं। किसी से किसी की क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती। वर्मा जी को शराब की लत थी वे सरकारी नौकरी करते थे लडका बेरोजगार था उसे नौकरी मिल नहीं रही थी वर्मा जी के वेतन का बड़ा हिस्सा शराब में खर्च हो जाता था वे किराये के मकान में रह रहे थे अधिक शराब के सेवन से उनका लीवर खराब हो गया किडनी फेल हो गईं। और वे रिटायरमेन्ट के एक साल पहले ही परलोक सिधार गए उनकी मौत से सब दुखी थे। यह दुख तो कभी दूर नहीं हो सकता था पर इस दुख के साथ बहुत सारी खुशियाँ भी आ गई थीं वर्मा जी को फन्ड ग्रेच्यूटी बीमा जीपी एफ के रूप में एक बड़ी रकम उनकी पत्नी को मिली थी इसके अलावा पेंशन भी अच्छी मिल रही थी लड़के को अनुकंपा नौचरी मिल गई थी फंड के पैसों से उन्होंने मकान खरीद लिया था लड़के की शादी हो गऍई थी। यह सब खुशियाँ उन्हें मिली थीं भले ही वे ये खुशियाँ खुलकर नहीं मना सकते थे पर इनकी अनुभूति तो उन्हें हो ही रही थी। जैसे सुब्ह किस...

व्यंग्य: विपरीत स्वभाव के रिश्तेदार

रिश्तेदार अगर एक दूसरे के स्वभाव के विपरीत हों तो रिश्ते भी असहज हो जाते हैं। और यदि पति पत्नी स्वभाव के विपरीत हों तो दाम्पत्य गीवन कष्टदायी हो जाता है। अक्सर बाप बेटे एक दूसरे के स्वभाव के विपरीत देखे जाते हैं। ऐसा होने पर बाप बेटों में मतभेद हमेशा कायम रहते हैं और ये उनकी परेशानी का सबसे बड़ा कारण बनते हैं फिर उनमें जनरेशन गेप तो होता ही है जो उनमें दूरिया पैदा करता है। कई बार देखा जाता है कि पिता जिम्मेदार है ईमानदार है कर्तव्य परायण है सिद्धान्तवादी है नियम का पक्का है । अनुशासन प्रिय है तो उसका बेटा उसके एक दम विपरीत होगा वो लापरवाह होगा उसका रवैया गैर जिम्मेदाराना होगा अनुशासन होगा ही नहीं कोई काम ठीक से नहीं करेगा कोई सिद्धान्त नहीं होंगे जुबान का सच्चा भी नहीं होगा उसके पिता से उसकी कभी नहीं बनेगी। ऐसे ही एक कृषि विभाग में अधिकारी थे संतोष जी उनकी दो बेटियाँ थीं उनकी शादी उन्होंने कर दी थी वे एक सिद्धानूतवादी ईमानदार व्यक्ति थे उनका लड़का था रोहित वो माँ का लाड़ला था उसका स्वभाव उसके पिता से विपरीत था पढ़ाई लिखाई में उसकी रूचि नही थी । वो पिताजी से हमेशा रुष्ट रहता था। उस...

व्यंग्य: मतलबी यार

आज के इस दौर में मतलबियों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। ऐसे मतलबी लोग संवेदना शून्य होते हैं इनमें न दया होती है न सहानुभूति भीतर से यह पूरी तरह भाव शून्य होते हैं।   जब तक इनका किसी से कोई मतलब न निकलता हो तब तक यह उससे कोई वास्ता नहीं रखते जान पहचान के होते हुए भी हालचाल तक नहीं पूछते। लेकिन जैसे ही इनका मतलब निकलता है। वैसे ही यह सकिय हो जाते हैं उसे अपना घनिष्ठ बना लेते हैं ऐसा जाहिर करते हैं जैसा आपका उनसे बड़ा हितैषी कोई और हो ही नहीं सकता। इनका आकर्षण इतना ज्रबर्दस्त होता है कि लोगों की सोच ही गुम हो जाती है यह भतलबी जब तक अपना मतलब पूरी तरह हल नहीं कर?लेते तब तक वे आपको अपने आकर्षण के जाल में फँसाए रखते हैं उनकी सम्मोहिनी से आप बाहर ही नहीं निकल पाते जब उनका मतलब पूरा हो जाता है और सम्मोहन टूटता है तब व्यक्ति अपने आपको ठगा सा महसूस करता हैं उसे बहुत अफसोस होता है तब तक देर हो चुकी होती है। प्रकाश चंद्र इसी तरह के इंसान थे मतलब के आगे उनके रिश्तों की कोई अहमियत नहीं थी। उनका कोई सगा नहीं था वे सिर्फ मतलब से ही वास्ता रखते थे उनकी सगी बहन सरला को मकान खरीदना थ...

व्यंग्य: शंका और दुविधा

शंका और दविधा हर व्यक्ति के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर सामने आती है। जो लोग शंकाओं से घिरे रहते हैं दुविधाओं में पड़े रहते हैं। वे चाहकर भी कोई काम नहीं कर पाते और बाद में सिवाय पछतावे के उनके पास और कुछ नहीं बचता । कहने वाले कहते हैं कि बुरे काम करने से पहले हज़ार बार सोचना चाहिए । और उसे टालने की सूरत निकालना चाहिए अगर टल जाए तो खुश होना चाहिए । इसके विपरीत अगर भला काम करना हो तो उसे करने में देरी नहीं करना चाहिए भला काम करने में सोच विचार की अधिक जरूरत?नहीं होना चाहिए भला काम करने से खुशी होती है साथ ही अदभुत आनंद की प्राप्ति भी। यह बात हर क्षेत्र में लागू होती है। हमारी सूझबूझ और समझ हमारे अंदर शंका उतूपन्न नहीं होने देती और जब शंका नहीं रहती तो विश्वास का जन्म होता यह विश्वास ही हमें सफल बनाता है। दुविधा में पड़े हौए लोग विश्वास को खो बैठते हैं। जिससे वे आगे नहीं बढ़ पाते और अपने विकास को अवरुद्ध कर लेते हैं। एक व्यापारी ने प्याज और लहसुन के वूयापार में चार महीने में चालीस लाख रुपये कमाए और दूसरे व्यापारी ने उसी व्यापार में बीस लाख का घाटा उठाया इसमें शंका तथा दुविधा प्...