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व्यंग्य: छोड़कर जाने के बाद

अक्सर ऐसा होता है । कि हम जिसके साथ रहते हैं उसके महत्व का हम आँकलन नहीं कर पाते हमे उससे उकताहट होने लगती है फिर हमारे उससे संबंध खराब होने लगते हैं। अगर वो हमारा आश्रित तो हम उसे बोझ समझने लगते हैं। कुछ तो यह तक कह देते हैं कि हराम की खा रहा है । जब खुद कमाकर खाएगा तब पता चलेगा कि कितनी मुश्किल से पैसा कमाया जाता है। डससे संबंध अधिक कटु हो जाते हैं तो इनका अंत तभी होता है जब कोई छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के बाद उसकी अहमियत का पता चलता है। तब उसकी कमी खूब खलती है लेकिन फिर वो हमारी पहुँच से बहुत दूर हो जाता है। रश्मि ने जब बी एस सी कर ली तो बी एड करने के लिए वो अपने भाई भाभी के पास बड़े शहर में आ गई। भैया भाभी और उनका एक वर्ष का बैटा था रिंकं भाई का थ्री बी एच के फ्लेट था। एक कमरा उसे रहने के लिए दे दिया गया। रश्मि पढ़ाई के अलावा घर के कामों में भी सहयोग करती थी उसकी पढ़ाई का सारा खर्च उसके पापा उठा रहे थे भाई के यहाँ तो वो भोजन करती थी और रहती थी। बाजार से सामान भी खरीद कर वो लाती थी रिंकू की देखभाल भी करती थी। कभी कभी रसोई में भी हाथ बँटाती थी । फिर भी रश्मि की भाभी को ...

व्यंग्य: जानबूझकर अवसर गँवाने वाले

जीवन में अच्छे अवसर बड़ी मुश्किल से मिलते है। और जो लोग ऐसा अवसर यह सोचकर गँवा देते हैं कि आगे चलकर इससे अच्छा अवसर मिलेगा उसका लाभ उठा लेंगे ।फिर ऐसा अवसर कभी नहीं आता । और अवसर गँवाने वाले के पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं बचता। कई बार ऐसा होता है । जिसे हम छोटा अवसर समझकर छोड़ देते बाद में वही बेहतर अवसर साबित होता है। जो फिर हमें कभी नहीं मिलता। आलोक और सुरेश कामर्स विषय से हायर सेकेण्डरी में पढ़ रहे थे। बारहवीं की परीक्षा देने के बाद सुरेश को एक अवसर मिला गल्ला व्यापारी लाभमल जी को एक लिखापड़ी करने वाले की जरूरत थी । वे सुरेश को जानते थे। उन्होंने उससे अपने यहाँ काम करने को कहा वेतन कम था । इसलिए उसने मना कर दिया लाभमल जी बोले । कोई ओर काम करने का इच्छुक हो तो बताना सुरेश ने यह बात आलोक से कहते हुए कहा कि बी कॉम करेंगे तो अच्छा रहेगा किसी दुकान पर लिखा पढ़ी का काम कर के क्यों अपना भविष्य बिगाड़ें। मगर आलोक की सोच ऐसी नहीं थी। वो लाभमल जी के पास पहुँचा और काम करने की इच्छा प्रकट की। लाभमल जी ने उसे काम पर रख लिया। दिनभर की लिखापढ़ी का काम तीन घंटे में पूरा हो जाता था। ...

व्यंग्य: विश्वासघाती

कहते हैं कि विश्वास को बड़ी मुश्किल से कायम किया जाता हैं। आज के दौर में आसानी से विश्वास नहीं जमाया जा सकता जबकि विश्वास को तोड़ना आसान हैं लेकिन फिर टूटे हुए विश्वास को जोड़ना मुमकिन नहीं है। जो विश्वास तोड़ देते हैं । वे विश्वासघाती कहलाते हैं। जिन पर दुबारा कोई कभी विश्वास नहीं करता। जो चतुर चालाक चपल अवसरवादी टाइप के लोग होते हैं वे जरा से लोभ में विश्वास तोड़ने में देरी नहीं करते। ऐसे लोग बहुत बड़ी गलती कर बैठते हैं जिसके परिणाम का उनको भी अंदाज नहीं होता। पुरुषोत्तम दास जी एक ईमानदार नेक दिल और भले इंसान थे । उनकी बाजार में दुकान थी कुछ लेनदेन का काम भी करते थे। कुल मिलाकर वे सुखी जीवन जी रहे थे । लोग भी उनसे खुश थे और उन्हें भी किसी से कोई शिकायत नहीं थे। आज तक उन्होंने किसी का विश्वास नहीं तोड़ा था। न ही उनका किसी ने भरोसा तोड़ा था। इसिलिए उनका कारोबार आराम से चल रहा था उनकी जुबान से निकली बात पत्थर पर लिखी लकीर की तरह मानी जाती थी। उनका इकलौता लड़का था। हरीश उसके अपने पिताजी से गहरे मतभेद थे। वो अपने पिताजी की कार्य प्रणाली से संतुषट नहीं था। वो अति महत्वाकाँक्षी था। वो ...

व्यंग्य: सामंती सोच

वैसे तो सामंतवाद दुनिया से कब का खत्म हो चुका है लेकिन सामंती सोच अभी तक खत्म नहीं हुई है। यह अभी भी कायम है। शहरी क्षेत्र में ये अलग रूप में है और ग्रामीण क्षेत्रों में अलग रूप में है। जो सामंती सोच वाले हैं वे अक्सर संपन्न और प्रभावशाली वर्ग के होते हैं इनके क्षेत्र में कोई भी गतिविधा इनकी सहमति के बिना नहीं हो सकती कोई कितना ही सक्षम क्यों न हो पर इनकी बराबरी करने की सोच भी नहीं सकता। ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन सामंतवादी सोच रखने वालों ने लोगों का जीना मुश्किल कर रखा है। एक गाँव के त्रिभुवन सिंह का रौब भी ऐसा ही था। गाँव में उनसे बड़ा किसी का मकान नहीं था । कोई उनसे आँख से आँख मिलाकर बात नहीं कर सकता था बाहर से जो भी अतिथि या कोई और किसी काम से आता तो उसे सबसे पहले उनके दरबार में उपस्थित होना पढ़ता था। कोई मँहगे और अच्छे कपड़े भी नहीं पहन सकता था भले ही वो कितना ही संपन्न क्यों न हो कोई अगर मेहमानी करने गाँव से बाहर जाता तो वो अच्छे कपड़े गाँव की सीमा के बाहर पहनता था। और जब वापस आता तो कपड़े बदल कर गाँव की सीमा में प्रेवेश करता था एक बार की बात हैं एक ग्रामीण कुंजीलाल ने एक...

व्यंग्य: चाहत के रूप

किसी के दिल में किसी के प्रति जो चाहत उत्पन्न होती है उसके कई कारण हो सकते हैं ठीक उसी प्रकार नफरत भी कई कारणों से हो सकती है। चाहत का मतलब प्रेम ही नहीं होता। ये चाहत कभी स्लार्थ के कारण भी हो सकती है। जिससे काम निकालना हो उसके प्रति भी चाहत होती है।  जो संबंध स्वार्थ के आधार पर बनते हैं उनमें प्रेम का अभाव होता है । ऐसे संबंध स्वार्थ पूरा होने पर टूट भी जाते हैं।  जिस तरह प्रेम किसी से भी हो सकता है । उसी तरफ नफरत भी किसी से भी हो सकती है प्रेम विवाह करने वाले भी शादी के कुछ साल बाद यह कहते नजर आते हैं कि तुमसे शादी के बाद पछता रहे हैं। जब पति पत्नी के बीच संबंध कटु हो जाते हैं तो बच्चों का मोह उन संबंधों को बनाए रखता है। सच्चा प्रेम इन सबसे हटकर होता है। सच्चे प्रेम त्याग समर्पण और बलिदान का जज्बा रहता है इस में प्रेमी प्रेमिका एक दूसदरे की चाहत में अपनी जान तक भी दे सकते है। यदि हम संबंधों को प्रेम का आधार बना लें तो स्वार्थ का भाव ही तिरोहित हो जाएगा। दिल में प्रेम रखकर हम यदि किसी का काम करेंगे तो उस काम को करने से खुशी मिलेगी । न उकताहट झुँझलाहट और बैचेनी। होगी...

व्यंग्य: सुख के सपने

जिनके पास दुखों की भरमार है वे सुख के सपने सजाकर अपनी जिंदगी जीते रहते हैं । वे सोचते हैं कि कभी वो दिन भी आएगा जब हमें भी खूब सुख मिलेंगे हमारी भी सारी कामनाएँ पूरी होंगी। दिन गुजरते चले जाते हैं इच्छित सुख भी मिलते हैं फिर भी इंसान सुखी नही दिखता । क्योंकि फिर वो नए सुख के सपने देखने लगता है। नई कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और वो इनकी पूर्ति में जुटा रहता है। यह सब करते हुए वो उम्र की गिनती भी भूल जाता है समय के साथ व्यक्ति तो बूढ़ा हो जाता है लेकिन मन जवान रहता है। जब शरीर साथ नहीं देता कार्यक्षमता घट जाती है । तब उसे पुराने दिन याद आते हैं। फिर वो सोचता है कि पुराने दिन कितने अच्छे थे सब कुख कितना बेहतर था। आज की तुलना में तो कई गुना बेहतर था । बुढ़ापे में अक्सर लोग पुराने दिनों की यादों को तरोताजा करने लगते हैं। क्योंकि भविष्य से उनकी आस खत्म हो जाती है वे समझ जाते हैं कि बुढ़ापे का भविष्य मौत है । वे इस मौत के डर को भुलाना चाहते हैं इसिलिए अतीत में खोए रहते हैं।     नरेन्द्र जी एक सरकारी विभाग में अधिकारी थे खूब रुतबा था मोटी तनखा मिलती थी। ऑफिस में सब उन से डरते थे हर...

व्यंग्य: आगे निकलने की होड़

एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने आदमी का सुख चैन छीन लिया हैं अच्छा मकान है अच्छी नौकरी है सारे सुख साधन है। फिर भी व्यक्ति को संतोष नहीं है वो अपने सुखों से इतना सुखी नहीं होता जितना दूसरों के सुखों को देखकर दुखी होता है। किसी के पास सात लाख की कार है और कोई उसका परिचित पन्द्रह लाख की कार ले आया तो उसे अपने सात लाख की कार बुरी लगने लगेगी ऐसा रोहन के साथ हुआ जैसे ही उसके प्रतिद्वंदी रितिक ने पन्द्रह लाख की कार खरीदी वैसे ही रोहन की सात लाख की कार की खुशी दुख में बदल गई । उसकी पत्नी उससे ज्यादा दुखी रहने लगी उनका इम्प्रेशन डाउन हो रहा था। वे खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे। रोहन की इतनी आमदनी भी नहीं थी। फिर भी वे बैचेन थे ये कार खरीदे उन्हें छ़ महीने ही हुए थे। और अंततः यह हुआ कि वो कार उन्होंने चार लाख रुपये में बेच दी और बाइस लाख की कार वे ले आए अब रोहन का परिवार खुशी से फूला नहीं समा रहा था जबकि रितिक के यहाँ मातम पसरा हुआ था उन्हें अब अपनी पन्द्रह लाख की कार बुरी लगने लगी थी। इस प्रतियोगिता ने उन्हें गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया था। हम भौतिक वस्तुओं पर गर्व कर रहे हैं ...