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व्यंग्य: किसी की मौत पर ख़ुशी मनाने वाले संवेदना विहीन लोग

वैसे तो किसी के यहाँ अगर किसी की मौत हो जाए तो उनके दुखों को देखकर पत्थर दिल वाला भी पिघल जाता है दुश्मन भी अपनी दुश्मनी भुलाकर संवेदना प्रगट करने लगता है पर ऐसे लोगों को क्या कहोगे जो किसी की मौत से मन ही मन खुश होते हैं और ऊपर से घड़ियाली आँसू बहाते हैं ऐसे लोगों में अगर खास अपने रिश्तेदार भी शामिल हों तो आप उन्हें क्या कहोगे । आपको शायद विश्वास न हो पर ये सच है । अगर आप मालूम करोगे तो ऐसे उदाहरण आपके आस पास ही बहुत सारे मिल जाएँगे। कुछ ऐसे उदाहरण है जिनका यहाँ उल्लेख करना उचित होगा। दो सगे भाई हैं। एक भाई को तीन लड़कियों के बाद पुत्र की प्राप्ति हुई उसकी उसे खुशी तो हुई पर जब कुछ दिन बाद उसके सगे भाई के यहाँ दूसरे पुत्र का जन्म हुआ तो उसकी दुगुनी खुशी ने इसको दुख में डुबा दिया । लेकिन जब कुछ दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र की अकस्मात मौत हो गई तो इसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा अपने बेटे की मौत से दुखी माँ को जब किसी ने बताया कि तुम्हारा सगा देवर यह कह रहा था कि अच्छा हुआ इसका बेटा मर गया। इसे अपने दो बेटों के होने पर बड़ा गर्व था इसका वो गर्व चूर चूर हो गया। यह सुनकर मृत बेटे की म...

व्यंग्य: क्या वाकई शराफ़त का ज़माना नहीं है

कई लोग अक्सर यह कहते नजर आते हैं कि आजकल शराफत का ज़माना नहीं है वे गुजरे हुए जमाने की बातें हैं जब लोग सब भले थे नेकदिल थे एक दूसरे के सुख दुख में काम आते थे आज का जमाना तो मतलबियों का है बिना मतलब के कोई किसी से वास्ता नहीं रखता लोग रिश्तों का भी लिहाज नहीं रखते सब एक दूसरे के हकों पर डाका डाल रहे हैं। विश्वास डगमगा गया है सब एक दूसरे को संदेह की नजरों से देख रहे हैं बुरे लोगों का महिमा मंडन हो रहा है उन्हें खूब सम्मान मिल रहा है। जो भले हैं उन्हें दबाया जा रहा है कुचला जा रहा है उनके साथ सरासर अन्याय हो रहा है उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही लेकिन जब इस पर गंभीरता से विचार करें तो बात इतनी बिगड़ी नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही जैसे कोरोना काल में एक ओर जहाँ कुछ लोग लोगों की मजबूरी का फायदा उठाते रहे थे कुछ ने चार पाँच गुना तक मुनाफा कमाया। दूसरी ओर अनेक भले लोग ऐसे भी थे जिन्होंने भूखों को निशुल्क भोजन कराया उन्हें कपड़े तथा दवाइयाँ दी और उनकी हर संभव मदद की आज भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मन से समाज सेवा कर रहे हैं निशुल्क भोजन करा रहे हैं गरीबों को कपड़े बाँट रह...

व्यंग्य: पेन्शन के भरोसे

सामान्य मध्यम वर्गीय ऐसे बहुत से परिवार हैं जिनके परिवार की गुजर बसर सेवानिवृत्त दादाजी की पेंशन पर चल रही है। ऐसे रिटायर्ड कर्मचारियों के पास फंड भी नहीं बचा है जो पेंशन मिल रही है उससे बहू बेटों तथा पोते पोतियों का खर्च भी उठा रहे हैं और विवाहित बेटी की भी आर्थिक रंप से मदद कर रहे हैं । ऐसे बुजुर्ग इस बात से भी दुखी हैं कि जब वो इस दुनिया से चले जाएँगे और उनकी पेंशन मिलना बंद हो जाएगी तब इन बच्चों का क्या होगा इनकी गुजर बसर कैसे होगी बच्चे अपनी जिम्मेदारी समझ ही नहीं रहे हैं इस बात का भी उन्हें टुख है। रामलाल जी चार साल पहले सेवानिवृत्त हुए थे तब उन्हें पैंतालीस लाख रूपये फंड के मिले थे उन पैसों से उन्होंने बेटी की शादी की मकान में तीन कमरे और बनवाए बड़े लड़के की दुकान खुलवाई छोटे लड़के ने दस लाख रुपये किसी दलाल को दे दिए जिसने उसकी सरकारी नौकरी लगवाने का आश्वासन दिया था वो उसके पैसे लेकर भाग गया छोटे लड़के की सरकारी नौकरी नहीं लग सकी उसको उन्होंने एम बी ए कराया था वो बारह हजार रुपये महीने पर प्राइवेट में नौकरी कर रहा था जहाँ कार्यरत एक लड़की से उसने शादी कर ली रामलाल ज...

व्यंग्य: अपनों के साथ धोखाधड़ी और ठगी

समाज में उन लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। जो अपनों के साथ धोखा धड़ी और ठगी करने में बिल्कुल संकोच नहीं करते ऐसे लोग विश्वास घाती होते हैं जुबान के बहुत मीठे होते हैं ओर बडी सफाई से धोखा दे देते हैं । अपना समझकर जब लोग इन पर भरोसा करते हैं। तो यह उसका लाभ उठाकर अपना मतलब हल कर लेते हैं।      रामकिशोर जी को अपने नव निर्मित मकान में बिजली की फिटिंग करानी थी ये बात उनके सगे साले संतोष को पता चली तो उसने रामकिशोर जी से कहा मेरी पहचान का एक दुकानदार है उससे बाजार से कम दाम में सामान दिलवा दूँगा रामकिशोर जी ने उस पर विश्वास कर उसकी बात मान ली । जो सामान संतोष ने जिस भाव में दिलवाया वो उन्होंने खरीद लिया । और उनका भुगतान कर दिया। जीजाजी को सामान दिलवाने के बाद संतोष दुकान पर पहुँच गया और अपना कमीशन माँगा दुकानदार ने उसके मजे लेने के लिए कहा कि अरे भाई वो अपने जीजाजी हैं यही सोचकर मैंने उन्हें भाव से सामान दिया। पर संतोष अड़ गया बोला मुझे इससे कोई मतलब नहीं मेरा कमीशन दो । तब दुकानदार बोला मुझे मालूम है तुम्हारी फितरत इसलिए मैंने पहले ही तुम्हारा कमीशन निकाल लिया ...

व्यंग्य : प्रतिभाओं का गला घोंटने वाले प्रतिभाहीन

कुछ चालाक चतुर चपल शातिर टाइप के तिकड़म बाज लोग जिनमें प्रतिभा तो होती नहीं है फिर भी अपने इन दुर्गुणों के कारण प्रतिभाशाली लोगों के हकों पर डाका डालने में सफल हो जाते हैं और उनके स्थान को हथियाकार मान प्रतिष्ठा हासिल करने में भी सफल हो जाते हैं ळुई बार तो ये बड़े सम्मान और पुरुस्कार भी हथिया लेते हैं। ऐसे ही एक जुगाड़ू दरबारीलाल हैं जो हिन्दी में एम ए प्रथम श्रेणी में जुगाड़ से करने के बाद जुगाड़ से ही पी एच डी करके तिकड़म भिड़ा के पहले तो प्रोफेसर बने फिर युनी वर्सिटी में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं। लगभग साहित्य के सारे सम्मान हासिल कर चुके हैं शहर की सारी साहित्यिक संस्थाओं पर उनका दब दबा है। ज्यादा पढ़ना लिखना उन्हें नहीं आता । एक नकल कराकर पैसे लेकर डिग्री दिलाने वाले व्यक्ति के माध्यम से उन्हों ने प्रथम श्रेणी में एम ए की उपाधि हथिया ली थी । इसके बाद किसी की थीसिस चुराकर पी एच डी प्राप्त कर ली इसके बाद प्रभाव तथा तिकड़म लगाकर प्रोफेसर बने और अब विश्व विद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष के पद को कलंकित कर रहे हैं। वे जाने कितने फर्जियों को पी एच डी की उपाध...

व्यंग्य: बिना मतलम के बुरा चाहने वाले

अक्सर हम जिनके बीच रहते हैं । जिन्हें हम अपना समझकर हर बात बताते हैं उनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो मन में ईर्ष्या पालकर बैठे रहते हैं यह लोग ऊपर से तो शुभचिंतक होने का दिखावा करते हैं पर भीतर भीतर हमारा बुरा चाहते हैं। और अगर संयोग से हमारा बुरा हो जाए तो यह झूठी सहानुभूति दिखलाते हुए हमारी परेशानियों को देखकर मन ही मन आनंदित होते हैं। अशोक जी नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आर्थिक रूप से संपन्न भी हैं। वे गरीबी से उठकर अमीर बने हैं। उनसे सबसे अधिक जलने वाला नरेश उनका बचपन का दोस्त है जो अभी भी गरीब है । अशोक जी के दो लाख रुपये हजम कर के बैठा है। वो इस बात से सबसे ज्यादा दुखी रहता है कि अशोक जी इतने धनवान क्यों हैं । अशोक जी को उसको ईर्ष्या की आग में जलता हुआ देखकर अच्छा लगता है। अशोक जी की प्रतिष्ठा उसकी जलन का सबसे बड़ा कारण है। वो यह जानता है कि वो अशोक जी की बराबरी ज़िदगी में कभी नहीं कर पाएगा इसलिए वो उनसे हर समय जलन रखता है उन्हें दिन रात कोसता है बिना मतलब के बददुआएँ देता है जब उसकी बददुआओं का अशोक जी पर कुछ असर नहीं होता तो दुखी हो जाता है।। एक कहावत है हाथी अपनी चाल से अ...

पढ़े लिखों की कमाई (व्यंग्य)

आज के इस दौर में जब शिक्षित बेरोजगारों की अच्छी संख्या है। तब जो पढ़े लिखे उच्च शिक्षित युवा हैं वे बहुत कम वेतन में प्राइवेट में नौकरी करने को विवश हैं। उनसे ज्यादा रुपया तो कम पढ़े लिखे लोग छोटा मोटा काम कर के कमा रहे हैं। शर्मा जी का ऐ सी खराब हो गया था जो मेकेनिक उसे सुधारने आया वो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। एक घंटे में उसने ऐ सी सुधार दिया। कुछ सामान भी अपनी तरफ से लगाया जिसका चार हजार रुपये उसे मिला। तभी शर्मा जी का लड़का रोहित आया उसने एम बी ए किया था और बारह हजार रुपये महीने के वेतन पर नौकरी कर रहा था। उसकी तनख्वाह जानकर मैकेनिक को बड़ी हैरत हुई। क्योंकि दो हजार रुपये तो उसने शर्मा जी का ऐ सी सुधारने में कमा लिए थे। सामान तो दो हजार का ही लगा था। पूरे दिन में उसने आठ हजार रुपये कमाए थे। शर्मा जी का लड़का एम बी ए करने के बाद जितने रुपये महीने भर में कमा रहा था उतना पैसा तो वो मैकेनिक मात्र डेढ़ दिन में ही कमा लेता था। यही हाल प्रताप चंद के लड़के का था। उसने सिविल इंजीनियरिंग में बी ई की थी तथा सोलह हजार रुपये के मासिक वेतन में एक बिल्डर के यहाँ साईट इंजीनियर था। प्र...